डा. मनमोहन सिंह बोले

  • 2016-12-07 03:30:25.0
  • राकेश कुमार आर्य

डा. मनमोहन सिंह बोले

पिछले दिनों नोटबंदी के प्रकरण को लेकर पूर्व प्रधानमंत्री और कांग्रेस के वयोवृद्घ नेता मनमोहन सिंह संसद के ऊपरी सदन में कुछ बोले। लोगों ने उनकी बात को सुना, पर अधिकतर लोगों ने कांग्रेस विरोधी माहौल देश में होने के कारण पूर्व प्रधानमंत्री की बात को सुनकर भी अनसुना कर दिया। ऐसा होना कोई बड़ी बात नहीं है, जब आप किसी के प्रति पहले से ही कोई बात मन में माने होते हैं-तो आप उसके प्रति अपने पूर्वाग्रह या अपनी धारणा से बाहर नहीं निकल पाते हैं। फिर चाहे आगे वाला कितना ही उचित क्यों ना बोल ले।


पूर्व प्रधानमंत्री डा. मनमोहन सिंह एक विनम्र व्यक्ति हैं। उनका देश सम्मान करता है, पूर्व प्रधानमंत्री के रूप में वह देश की एक शख्सियत हैं। बस उनके साथ गलत ही ये है कि वे एक गलत मंच पर बैठे हैं। इस गलत मंच पर भी वह कई बार गलत भूमिकाएं निभा चुके हैं क्योंकि इस गलत मंच का संचालन गलत लोग कर रहे थे। गलत मंच पर अच्छे लोगों का जाना उस समय उचित और सार्थक होता है, जब वे अच्छे लोग गलत मंच को अपने रंग में रंग लें, विनम्र मनमोहन सिंह ऐसा नहीं कर पाये। इसके विपरीत वह गलत लोगों के साथ गलत राजनीतिक नाच करने लगे। इस विनम्र व्यक्ति को यह पता ही नहीं था कि राजनीतिक नृत्य क्या होता है, उसके लिए कपड़े कौन से पहने जाते हैं, और इसमें चेहरे की या हाथ, पांव या कूल्हे आदि की भाव भंगिमा क्या रखनी होती है? उन्हें अचानक कोई कपड़े पहनाता और उन्हें मंच पर नाचने वालों के साथ लगा देता। निश्चित रूप से मनमोहन सिंह इस नृत्य में असफल रहे। पर असफलता का एक ही पैमाना नहीं होता है। व्यक्ति की विचारशक्ति, कार्यशैली, व्यक्तिगत चरित्र, देश के प्रति समर्पण आदि भी देखना होता है। मनमोहन सिंह के पास उनकी असफलताओं के पीछे सफलताओं की भी एक लंबी सूची है -जिसे हम अनदेखा कर जाते हैं। उनकी कार्यशैली 'निष्काम भाव' से कर्म करने वाले कर्मयोगी की है, जिसे भुलाना या अनदेखा करना उनके साथ एक अन्याय होगा।
डा. मनमोहन सिंह एक मात्र ऐसे सांसद हैं जो राज्यसभा में सबसे अधिक उपस्थित रहे हैं। उनकी उपस्थिति का औसत 97 प्रतिशत है। इतनी अवस्था में राज्यसभा के प्रति इतना समर्पण उनका एक अनुकरणीय गुण है। जबकि एक सांसद की औसत उपस्थिति 77 प्रतिशत होती है।

उन्होंने नोटबंदी पर बोलते हुए कहा कि मुद्रा नियमन या परिवर्तन देश के कानून के अनुसार हो सकता है, अर्थात आप नोट बदल सकते हैं, किसी के कालेधन को जब्त भी कर सकते हैं। मुद्रानीति में कोई बदलाव करने का अधिकार सरकार को है, आप कोई भी नया नोट चला सकते हैं, बंद भी कर सकते हैं। मगर आप लोकतंत्र में चुनी हुई सरकार द्वारा किसी भी हालत में किसी व्यक्ति के खुद के एक नंबर के जमा पैस को, जिस पर वह व्यक्ति टैक्स दे चुका है, बैंक से निकालने से नहीं रोक सकते। अगर आप किसी व्यक्ति को उसकी खुद की कमाई से जमा पैसे को भी नहीं निकलने देते तो ये उस व्यक्ति के कमाने, खर्च करने और अपनी जीविका चलाने के मूलभूत अधिकार का हनन है।

डा. मनमोहन सिंह ने कहा कि ऐसा आज तक किसी देश में नहीं हुआ। डा. मनमोहन सिंह के अनुसार नोटबंदी से निपटने के आरबीआई के लोगों के ढंग को लेकर उनसे जवाब पूछने चाहिएं। उन्होंने कहा कि भारतवर्ष में लोगों के पास नकद धन या सोना घर पर सफेद एक नंबर की कमाई का ही हो चाहे, वह कितना होगा, इसका अंदाजा दुनिया का कोई अर्थशास्त्री नहीं लगा सकता। यही वजह है कि सरकार पर्याप्त मुद्रा उपलब्ध नहीं करा पा रही है। उन्होंने स्थिति संभालने के सुझाव भी दिये। उनके दिये गये सुझाव ही उनके वक्तव्य की गरिमा को बढ़ा गये। यद्यपि कांग्रेस ने उन्हें बोलने के लिए खड़ा इसलिए नहीं किया था कि वे सरकार को सुझाव देने लगें। पर डा. मनमोहन सिंह ने लोकतंत्र में विपक्ष की सकारात्मक भूमिका का निर्वाह किया और सरकार को उचित सलाह व सुझाव देकर यह स्पष्ट किया कि लोकतंत्र में मतभिन्नता का होना जितना आवश्यक है उतना ही राष्ट्रहित में मतैक्यता भी आवश्यक है, और संसद में जितनी भर भी बहस होती हैं उनका अंतिम उद्देश्य राष्ट्रहित में मतभिन्नताओं को मतैक्यता में परिवर्तित करना ही होता है।

डा. मनमोहन सिंह ने अपने सधे हुए गंभीर भाषण में सरकार को फटकार लगायी, उसकी कमियां, लोगों की तकलीफ, लोकतंत्र के अधिकार, सुझाव इत्यादि देकर सिद्घ किया कि वे सोचने, समझने और राष्ट्रहित में उचित निर्णय लेने में आज भी सक्षम हैं। इसके बाद बारी आई थी-प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की। उन्होंने भी पूर्व प्रधानमंत्री के भाषण को पूरी गंभीरता से सुना। सुनने के पश्चात अपनी सीट से उठे और पूर्व प्रधानमंत्री से जाकर हाथ मिलाया। यह भी एक अच्छी बात थी। मानो पी.एम. मोदी ने स्पष्ट कर दिया कि वे पूर्व प्रधानमंत्री के विचारों का सम्मान करते हैं।
दोनों बड़े नेताओं ने लोकतंत्र का सम्मान किया। किसी भी सभ्य समाज में ऐसे लोकतांत्रिक आचरण का स्वागत किया ही जाना चाहिए, लोकतंत्र के पावन मंदिर संसद को राजनीति का अखाड़ा ना बनाकर राष्ट्रनीति का मार्गदर्शक राष्ट्रमंदिर बनाना देश की अपेक्षा है। यह तभी संभव होगा जब राष्ट्रहित में विपक्ष सरकार को उचित मार्गदर्शन देना सीखे और सरकार विपक्ष के ऐसे उचित मार्गदर्शन का सम्मान करना सीखे। महाभारत में आया है :-
गहर्यान निगर्हयेदेवं पूज्यान् सम्पूजयेत् तथा।
दण्डयांश्च दण्डयेद् देविनात्र कार्या विचारणा।।
(अ. 145)
''देवि! शासक निंदनीय मनुष्यों की निंदा ही करे पूजनीय पुरूषों का सम्मान करे, तथा दण्डनीय अपराधियों को दण्ड दे। इसमें कोई अन्यथा विचार नही करना चाहिए।'' जिस समाज में या देश में या जिस शासन व्यवस्था में ऐसी सोच लोगों की बन जाती है वह समाज या देश या शासन व्यवस्था ही लोकतांत्रिक होती है।

राकेश कुमार आर्य ( 1586 )

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