डा. महेश शर्मा का बड़बोलापन

  • 2016-08-31 05:00:07.0
  • राकेश कुमार आर्य

डा. महेश शर्मा का बड़बोलापन

डा. महेश शर्मा बार-बार अपने बड़बोलेपन के कारण विवादों में आ जाते हैं। कुछ समय पहले उन्होंने एक जाति विशेष के लिए कुछ ऐसे शब्द कहे जो उनके जी का जंजाल बन गये। उससे पहले भी हमने उन्हें कई ऐसे बयान देते सुना है जो उनके जैसे मंत्रालय के किसी मंत्री के लिए उचित नही कहे जा सकते। अब उन्होंने फिर एक बयान दिया है जिसमें उन्होंने विदेशी पर्यटकों को छोटे कपड़े या स्कर्ट जैसे परिधान न पहनने की सलाह दी है। श्री शर्मा के इस बयान की भी आलोचना हुई है। वास्तव में विदेशी लोग भारत आयें और भारत आने पर उनके परिधान बदलने की अनिवार्यता उन पर थोपी जाए, इसे उचित नही कहा जा सकता। हर देश का पर्यटक अपनी विशेष भेष-भूषा और परिधान से ही पहचाना जाता है, साथ ही इसे अपने ही परिधान में रहकर खुशी और अपनी स्वतंत्रता की अनुभूति होती है कि वह यहां आकर पूरी तरह स्वतंत्र है। प्रत्येक देश की सरकार के लिए यह अनिवार्य होता है कि वह विदेशी पर्यटकों की निजता और उनकी स्वतंत्रता का सम्मान करे। ऐसा न हो कि विदेशी पर्यटक भारत-भूमि पर आएं और वे यहां आकर हमारे पर्यटन मंत्री के किसी ड्रेस कोड में फंसकर रह जाएं, और उन्हें लगे कि यहां आकर हम अपनी स्वतंत्रता ही गंवा बैठे हैं।
वैसे अपने देश भारत में भी ऐसे बहुत से आंचल हैं जहां पर महिलाएं बहुत कम कपड़े पहनती हैं, और इसके बावजूद भी उनका सम्मान सुरक्षित रहता है। ऐसे कई आदिवासी क्षेत्र हैं जहां पर महिलाएं कम कपड़े पहनकर भी स्वतंत्र हैं। वास्तव में नारी की स्वतंत्रता की रक्षा व्यक्ति के चारित्रिक गुणों से होती है, जिस व्यक्ति का चरित्र जितना ऊंचा होता है उतना ही वह नारी के प्रति सम्मानभाव से भरा रहता है। यदि ऐसा न होता तो भारत में नारी की पूजा का प्रचलन न होता। हमारे पर्यटन मंत्री को तनिक दुर्गादास राठौड़ के जीवन के प्रसंग को याद करना चाहिए, जिनके जीवन में एक बार नही कई बार ऐसे अवसर आए जब उन्होंने अपने उच्च चरित्र का परिचय दिया। जब औरंगजेब के भाई अकबर ने दक्षिण में बादशाह औरंगजेब के खिलाफ विद्रोह का झण्डा बुलंद किया तो उस विद्रोह को कुचलने के लिए बादशाह स्वयं अपनी बेगम गुलनार के साथ वहां पहुंचा। अकबर के साथ उस समय दुर्गादास राठौड़ और चित्तौड़ के तत्कालीन महाराणा राजसिंह की शक्ति लगी थी। इस विद्रोह को कुचलने में औरंगजेब सफल हो गया और उसने दुर्गादास राठौड़ को अपनी जेल में डाल दिया। तब रात्रि में दुर्गादास राठौड़ के पास बेगम गुलनार पहुंच जाती हैं, बेगम ने दुर्गादास राठौड़ को मुक्त कर भाग निकलने का प्रस्ताव इस शर्त पर रखा कि तुम्हें मुझसे शादी करनी पड़ेगी। परंतु हमारे इस महान सेनानायक ने मल्लिका का यह प्रस्ताव उसी प्रकार अस्वीकार कर दिया था जैसे कभी रामचंद्रजी ने सूपर्णखा के विवाह प्रस्ताव को ठुकराया था। ऐसे ऊंचे चरित्र के महामानवों के जीवन प्रसंगों को यदि हमारे पर्यटनमंत्री इस देश के विद्यालयों में पढ़ाने के लिए अपने सहयोगी मंत्री को प्रेरित कर सकें तो वह जिस समस्या से निजात पाना चाहते हैं उससे निजात तो पा ही जाएंगे, साथ ही भारत को चरित्र में विश्वगुरू बनाने की दिशा में भी आगे बढ़ाने में सहायक हो जाएंगे।

हर देश अपनी वेशभूषा और खान-पान अपने देश की परिस्थितियों के अनुसार बनाया करता है। यूरोपीय देशों में जैसा पहनावा हम देखते हैं, निश्चित रूप से वह पहनावा भी इन देशों के लोगों ने अपने देश की जलवायु और परिस्थितियों के अनुसार अपने लिए निर्धारित किया है। डा. शर्मा को यह बात ध्यान रखनी चाहिए कि यदि वह ऐसे बयान देंगे तो इससे देश के पर्यटन उद्योग पर विपरीत प्रभाव पड़ेगा। अच्छा हो कि वह पर्यटन मंत्री ही रहें अपने आपको परिधानमंत्री न बनायें।

हमें तालिबानी फरमानों और फतवों की संस्कृति को अपनाने के स्थान पर अपनी लोकतांत्रिक, उदार और सर्वग्राही संस्कृति को अपनाने की बात करनी चाहिए। इस देश में पर्यटन उद्योग प्राचीनकाल से फलता-फूलता रहा है, इसके फलने-फूलने के पीछे कारण केवल ये रहा है कि इस देश के निवासी चरित्र में ऊंचे होते है।

राकेश कुमार आर्य ( 1580 )

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