मत हिलाओ इस नींव को

  • 2016-10-21 03:30:29.0
  • राकेश कुमार आर्य

मत हिलाओ इस नींव को

माता-पिता हमारे जीवन की नींव है। हम अपने जीवन में जो कुछ भी होते हैं उसमें माता-पिता का बहुत महत्वपूर्ण योगदान होता है। पर आजकल हम देख रहे हैं कि माता-पिता अर्थात हमारे जीवन की नींव ही हमारे लिए बोझ बन गयी है। माता-पिता अपने कई बच्चों का पालन-पोषण एक ही छत के नीचे कर देते हैं, पर वही छत एक दिन उन्हीं माता-पिता के लिए छोटी पड़ जाती है और उनसे अपना साया देने तक के लिए मना कर देती है। वड़ी पीड़ा का विषय है कि जिन बच्चों को माता-पिता बोलना सिखाते हैं वे एक दिन इतना अधिक बोलने लगते हैं कि माता-पिता का बोलना ही बंद करा देते हैं। गले का हार ही जब नाग बन जाए या बाढ़ ही जब खेत को खाने लगे तो उस स्थिति पर सिवाय आंसू बहाने के और क्या कहा जा सकता है?


बड़ी छोटी-छोटी चीजें हैं-जिन्हें यदि व्यवस्थित कर लिया जाए तो सामाजिक मूल्यों के हृास की इस दुखदायी स्थिति से मुक्ति मिल सकती है। एक बेटी एक परिवार से निकलकर जब दूसरे घर जाती है तो उसकी दहलीज पर जाते ही वह 'बहू' हो जाती है। परिभाषा बदल जाती है-संदर्भ बदल जाते हैं-बातों के अर्थ बदल जाते हैं। उस बेटी को कई बार अगले वाले तो बेटी नही मानते, बहू मानते हैं और इसी बात को ध्यान में रखकर उस पर आदेश झाड़ते रहते हैं, बड़ों की बात तो छोडिय़े छोटों की ओर से भी उसके साथ ऐसा ही व्यवहार किया जाता है। इसके अतिरिक्त कई बार ऐसा भी होता है कि वह बेटी आगे जाकर बहू बनकर रहने को तैयार नही होती वह आदेशात्मक शैली में बात करती है और ससुराल के किसी व्यक्ति की बात को सुनने में अपना अपमान समझती है। पतिदेव को अपने नियंत्रण में रखकर उस पर दबाव डालती है कि जैसे भी हो अपने परिवार से संबंध विच्छेद कीजिए और इनसे दूर रहने की तैयारी कीजिए। पतिदेव फंस जाते हैं -दो पाटों के बीच में। एक ओर अपने जीवन के लिए कुर्बानी देने वाले माता-पिता का चेहरा उसकी आंखों में कुछ कहता है तो दूसरी ओर पत्नी का रोज-रोज का रोना पीटना, कलह करना और अनुचित दबाव डालना उसकी नजरों में होता है। पति दु:खी रहने लगता है। कई बार ऐसा होता है कि पति पिछले जीवन की बलि देकर भविष्य के दृष्टिगत पत्नी से समझौता कर लेता है और माता-पिता या परिवार से दूरी बना लेता है। तब उसके दुराव से माता-पिता की मानसिकता पर नकारात्मक प्रभाव पड़ता है और उधर वे दुखी रहने लगते हैं।

सारी परिस्थितियों में एक 'नारी' खड़ी है, किसी की बेटी के रूप में तो किसी की 'बहू' के रूप में। दबाव डाल रही है कि-मुझ नारी को पाने के लिए एक नारी (माता) को छोड़। कोर्ट कह रहा है कि पहले वाली नारी 'बहू' को सशक्त करना है, कानून कह रहा है कि मैं उसे संरक्षण दूंगा, सरकार कह रही है कि मैं उसे हथियार (मां के विरूद्घ) दूंगी, और समाज कह रहा है कि हम उसे अपना समर्थन देंगे। जबकि वे माता-पिता जो उस नारी के अत्याचारों का सामना कर रहे हैं, उसकी जिद के सामने सिर झुकाते-झुकाते हार लिए-नित्य पिसते जा रहे हैं, अधिकतर पतिदेवों की भी स्थिति दयनीय है। नारी सशक्तिकरण के नाम पर हमने घर बिगाड़ लिये, कितने ही माता-पिता को असमय ही दिल की बीमारी के कारण या बढ़ते तनाव से हुई शुगर या अन्य प्राणलेवा बीमारियों के कारण संसार छोड़ते देख लिया या संस्सार छोडऩे के लिए मजबूर कर दिया। हमने ये हिसाब रखना उचित ही नही माना कि उजडऩे वाले परिवारों की संख्या कितनी हो चुकी है या नारी सशक्तिकरण की प्रक्रिया के कारण कितने निरपराध माता-पिताओं को या लडक़ों को हमने मार लिया है? ''मानवता तेरे टुकड़े होंगे-इंशा अल्लाह इंशा अल्लाह''-बस अब तो ये ही कहने को मन करता है, सारा समाज मौन! सारी व्यवस्था मौन!!
मैंने यह क्यों लिखा? मुझे बताया गया कि अभी कस्बा दादरी में एक लडऩे ने आत्महत्या कर ली। कारण था कि पत्नी माता-पिता से ना बोलने के लिए दबाव बनाती थी। लडक़ा माता-पिता से बोलना नही छोड़ता था। अंत में रोज-रोज के कलह से दुखी होकर उसने दुनिया छोड़ दी। अब क्या होगा? कानून सचमुच उन माता-पिता को कोई न्याय नही दे पाएगा, जिनका इकलौता लाल संसार से चला गया है। शिक्षा=यदि नारी वास्तव में सशक्तिकरण चाहती है तो उसे मर्यादित होना पड़ेगा। उसके ऊपर समाज की बड़ी जिम्मेदारी है, पहले वह बेटी रहकर कुल की लाज बढ़ाती है तो फिर उसे बहू रहकर दूसरे कुल की लाज बढ़ाने के लिए प्रयासरत रहना चाहिए। माता-पिता हमारी नींव हैं-उन्हें उठाकर यदि घर से फेंकने का प्रयास करोगे तो समझ लो कि तुम भी सूख जाओगे, क्योंकि जड़ के बिना कोई हरा नही रह पाता। समाज में जितने भी संगठन नारी सशक्तिकरण के कार्य में लगे हैं-वे 'सामाजिक स्वच्छता अभियान' को सफल बनाने के लिए नारी द्वारा जड़ खोदने की इस प्रक्रिया पर अंकुश लगाने के लिए आगे आयें। समाज की व्यवस्था बिगड़ रही है। यदि यह व्यवस्था ही नहीं रहेगी तो ना हम रहेंगे ना तुम रहोगे-रह जाएगी एक अनकही-अनसुनी कहानी। महल की नींव मत हिलाओ, अन्यथा कहानी लिखने वाला भी नहीं मिलेगा।

राकेश कुमार आर्य ( 1580 )

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