'दिग्विजयसिंह एण्ड वृन्दा करात कम्पनी'

  • 2016-11-02 04:45:22.0
  • राकेश कुमार आर्य

दिग्विजयसिंह एण्ड वृन्दा करात कम्पनी

भोपाल सेंट्रल जेल से फरार सिमी के सभी 8 आतंकियों को पुलिस ने एनकाउंटर में मार दिया है। पुलिस की इस कार्यवाही को उचित ही कहा जाना चाहिए क्योंकि जेल से फरार होकर गलती आतंकवादी कर रहे थे ना कि उन्हें मारकर पुलिस कोई गलती कर रही थी। इसके उपरांत भी अपने अधिक बोलने के कारण अपना सम्मान गंवा बैठे दिग्विजयसिंह को कुछ बोलने के लिए मसाला मिल ही गया और उन्होंने कह दिया है कि आतंकियों का इस प्रकार से भागना और फिर उनका इस प्रकार एनकाउंटर कर देना शक पैदा करता है। इसी प्रकार का मिलता जुलता बयान कम्युनिस्ट नेता वृन्दा करात का आया है। जिन्होंने हमारे पुलिस बल की निष्ठा पर ही संदेह व्यक्त किया है और अप्रत्यक्ष रूप से आतंकियों का समर्थन किया है।


हमारे देश के नेताओं की ऐसी बयानबाजी को देखकर लगता है कि ये लोग भारत के नेता न होकर किसी विदेशी शत्रु देश के नेता हैं, जिन्हें भारत सरकार की हर कार्यवाही का या हमारे पुलिस बल अथवा अन्य सुरक्षाबलों की किसी भी कार्यवाही का विरोध करना ही करना है। आज जबकि सारा विश्व आतंकवाद के विरूद्घ लामबंद होकर खड़ा है और एक देश दूसरे देश के साथ सुर में सुर मिलाकर बोल रहा है तब भारत के इन नेताओं के ऐसे बयान सचमुच आश्चर्य जनक लगते हैं। लगता है कि इन्होंने अपने अतीत से कोई शिक्षा नही ली है, और ना ही हम शेष विश्व की आतंकियों के विरूद्घ तेजी से बढ़ती जा रही लामबंदी से कुछ सीखने को तैयार हैं।

अपने बेसुरे रागों के लिए प्रसिद्घ कांग्रेस के दिग्विजयसिंह को उल्टा बोलने में शर्म न आकर आनंद आता है। इससे उनकी समाचार पत्रों की सुर्खियों में बने रहने की इच्छा तृप्त हो जाती है। क्योंकि हमारी मीडिया भी उन लोगों को अधिक दिखाती है जिन्हें नही दिखाना चाहिए। उल्टा बोलकर और गांधी को अपशब्दों से संबोधित करके मायावती नेता बन गयीं, यदि ऐसे शब्द किसी हिंदू महासभाई ने गांधी के प्रति अपना लिए होते तो कोहराम मच जाता। परंतु मायावती को 'सैक्युलर' होने का लाभ मिला और उस लाभ के 'आरक्षण' से वह आगे बढ़ गयीं। इसी प्रकार की लाइन को दिग्विजयसिंह जैसे कई नेता पकड़े रहते हैं, जो उल्टा बोलकर मीडिया में कागजी नेता बने रहते हैं। ऐसा करने से चाहे जनता इन्हें नकारती रहे पर इनकी पार्टियां इन्हें कई बार अपेक्षा से अधिक महत्व देती रहती हैं और उसी से इनका काम चल जाता है।

अब इनसे कौन पूछे कि दर्जनों और सैकड़ों लोगों के खून से होली खेल चुके आतंकी तुम्हारे क्या लगते हैं? और क्या उनके मानवाधिकार हैं? मानवाधिकार तो मानव के होते हैं, जिनको वे मार चुके हैं और मारने के लिए ही जेल से फरार हो रहे हैं। जिनको पहले मार चुके हैं उनके परिवार वालों से तो दिग्विजयसिंह कभी नहीं मिले होंगे, क्योंकि वे मानव हैं और इस देश के कानून में उनकी पूर्णनिष्ठा है। इस देश का दुर्भाग्य ही यह है कि यहां जो व्यक्ति कानून का पालन करता है उसका दर्द किसी को नही दिखता और जो कानून तोड़ता है उसके दर्द से हमदर्दी व्यक्त करने के लिए अनेकों मानवाधिकारवादी और सैक्यूलर बिलों से बाहर आकर बैठकर रोने लगते हैं जैसे इनके घर में कोई जवान मौत हो गयी हो। बेशर्मी की सीमाएं तब तोड़ दी जाती हैं जब आतंकियों को लेकर सहानुभूति व्यक्त की जाती है और हमारे सुरक्षाबलों की सत्यनिष्ठा पर अनावश्यक ही प्रश्न खड़े किये जाते हैं।

आज पूरे देश का मुसलमान अपनी निष्ठा को संदिग्ध मान रहा है। वह इस बात से दुखी है कि देश में मुसलमान को आतंकवादी क्यों माना जाता है? जबकि हर मुसलमान आतंकवादी नहीं है, पर हर आतंकवादी के मुसलमान होने के कारण देशभक्त मुसलमान शर्म महसूस कर रहा है। इसलिए अधिकांश मुसलमान आतंकवाद और आतंकियों के विरूद्घ है। वह चाहता है कि उसके सम्प्रदाय को लेाग संदेह से ना देखें और आतंकियों को इस्लाम के साथ जोडक़र इस्लाम को अपयश का भागी ना बनाएं। यही कारण है कि हर राष्ट्रवादी मुसलमान देश में यथाशीघ्र आतंकवाद के विनाश करने में देश की सरकार के साथ खड़ा दिखाई देता है। तब भी दिग्विजयसिंह और वृन्दा करात जैसे नेता आतंकियों का समर्थन करें या उनके मानवाधिकारों की चिंता करें, तो दुख होता है।

आज आतंकवाद को लेकर राष्ट्रीय नीति बनाने की आवश्यकता है, और जिन आतंकियों को सरकारी दामाद बनाकर अब तक खिलाया पिलाया जाता रहा उनके विरूद्घ कड़ी कार्रवाई करने की आवश्यकता है। अब कश्मीरी आतंकियों के नेताओं को वीआईपी सुविधाएं देकर उन्हें देश विदेश में हवाई यात्राएं कराने का समय लद गया है और जेएनयू में सरकारी संरक्षण में पल रहे नागों को दूध पिलाने के दिन भी अब नहीं रहे, अब देश की जनता जाग चुकी है। देश का राष्ट्रीय नेतृत्व सजग है, इसलिए 'दिग्विजयसिंह एण्ड वृन्दा करात कंपनी' के प्रबंधकों को भी अपनी जुबान सुधारनी ही होगी, अन्यथा इस देश की जनता उनकी जुबान बंद करके उन्हें घर में बैठाने का प्रबंध कर देगी। जब न्यायाधीश पूरा-बूरा तोलने का मन बना लेता है तब अपराधी घबराने लगते हैं हो सकता है अपने अंतिम समय को गर्दिश में देखकर ही अब आतंकियों के संरक्षक घबराहट में अनाप-शनाप बकने लगे हों?