देशोत्थान और अतीत का दर्पण

  • 2016-11-03 03:30:54.0
  • राकेश कुमार आर्य

देशोत्थान और अतीत का दर्पण

आजकल भारतवर्ष में बीमारों की संख्या दिन प्रतिदिन बढ़ती ही जा रही है। अभी पिछले दिनों चिकनगुनिया, डेंगू आदि की बीमारी फैली है, यह बहुत अधिक विस्तार नही ले सकी, परंतु फिर भी हमारे अस्पतालों में रोगियों को भर्ती कराने के लिए बिस्तर की तो बात छोडिय़े धरती पर लिटाकर रखने की भी जगह नहीं थी। तनिक कल्पना कीजिए कि यदि आजादी से पूर्व की सी बीमारियां इस समय फैल जाएं तो स्थिति क्या होगी?

हमारे देश में पुराने समय में लोग अपना वैद्य अपने आप बने रहकर स्वास्थ्य लाभ कराया करते थे, उनकी यह प्रवृत्ति उचित ही थी जिसे हमारे ऋषियों ने उनकी जीवन शैली का एक आवश्यक अंग बना दिया था। जैसे प्रात:काल शीघ्र उठना और सूर्योदय से पूर्व अपनी नित्यक्रियाओं से निवृत्त हो लेना आज भी भारत के देहात में लोगों का नित्य का कार्य है। नित्यक्रियाओं में शौचादि से निवृत्त होना ही सम्मिलित नहीं है, अपितु दंत धावन, स्नान ध्यान (प्रभु भजन) भी इसी में सम्मिलित रहते हैं। प्रात:काल के समय को ब्रह्ममूहूत्र्त कहा जाता है, उसमें सोना पूर्णत: अनुचित माना जाता था। लोगों की मान्यता थी कि प्रात:काल की उस बेला में प्रभु धन बांटते हैं, जो उसमें वंचित रह जाता है, वह अभागा होता है। वास्तव में रामायण आदि सदग्रंथों के माध्यम से हमारे लोगों को यह समझाया गया है कि व्यक्ति को अर्थ चिंतन प्रात:काल ही करना चाहिए। क्योंकि प्रात:काल की बेला में चित्त सर्वाधिक शांत होता है और उस समय किया गया चिंतन या लिया गया निर्णय बहुत ही उत्तम होता है। हमारे किसान प्रात:काल की बेला में अपने खेतों पर जाकर फसल की बुआई का या अन्य प्रकार का चिंतन किया करते थे और खेतों की जुताई सूर्योदय से पूर्व या थोड़ा सूरज चढऩे तक कर डालते थे तो उसका परिणाम यह आता था कि वे आर्थिक रूप से समृद्घ रहते थे। तब इस देश को 'सोने की चिडिय़ा' कहा जाया करता था।

महाभारत में आया है कि प्रात:काल उठना, शौच स्नान करके शुद्घ होना, महात्माओं और ब्राह्मणों में भक्ति रखते हुए गुरूजनों की सेवा करना तथा ब्राह्मणवर्ग (विद्वानों) को प्रणाम करना अतिथियों के सम्मुख होकर उनका उचित आदर सत्कार करना सदगृहस्थ के लक्षण हैं।

बड़े बूढ़ों के उपदेश को मानना और आचरण में लाना, उनके हितकर और लाभदायक वचनों को सुनना भृत्यवर्ग को सांत्वना और अभीष्ट वस्तु का दान देकर अपनाते हुए उसका पालन करना, न्याययुक्त कर्म करना, अन्याय और अहितकर कार्य को त्याग देना, अपनी स्त्री के साथ अच्छा बर्ताव करना और दोषों का निवारण करना, उत्तम व्यवहार के लिए आवश्यक माने गये। क्योंकि ऐसा करने से मनुष्य को किसी प्रकार की अनावश्यक चिंताएं नही घेरती हैं और ना ही किसी प्रकार का तनाव उसके पास फटकता है। जो कि किसी भी बीमारी को बुलाने की पहली और अनिवार्य शर्त है। आज हमारा व्यवहार ही बिगड़ गया है, बड़े बूढ़ों के उपदेश हमें अच्छे नही लगते। भ्रष्टाचार के कारण 'राजा' और उच्चाधिकारी अपने ही अधीनस्थों के साथ अन्याय करते रहते हैं, पति-पत्नी के संबंध भी बोझिल हो गये हैं। जिसका परिणाम यह आया है कि समाज में सर्वत्र अशांति है और अव्यवस्था का बोलबाला है।

महाभारतकार का ही कथन है कि पारिवारिक, सामाजिक और राष्ट्रीय परिवेश को उत्तम बनाने के लिए पुत्रों को विनयशील बनाओ, उन्हें भिन्न-भिन्न आवश्यक कार्यों में लगाये रहो, अशुभ पदार्थों को त्यागते रहने की प्रेरणा देते रहो। शुभ पदार्थों का सेवन करने के लिए उन्हें प्रोत्साहित करो। कुलोचित धर्मों का यथावत रूप से पालन करना और अपने ही पुरूषार्थ से सर्वथा अपने कुल की रक्षा करना इत्यादि सारे शुभ व्यवहारों को जीवन में अपनाना व्यक्ति का पुण्य कार्य है।

जो पराये मांस से अपने मांस को बढऩा चाहता है वह जहां कभी भी जन्म लेता है वही उद्वेग में पड़ा रहता है। इसका अभिप्राय है कि भारत में मांसाहार घृणित माना जाता था। हर जीवधारी को अपने जीवन को जीने का उतना ही अधिकार है जितना हम मानवों को है।

स्वास्थ्य रक्षा के लिए इन छोटी-छोटी बातों का भी अपना महत्व है क्योंकि ये छोटी-छोटी बातें हमारे जीवन को सुखी, तनाव रहित और समृद्घ रखने में सहायक होती हैं। हमारे देश के लोग इन सब बातों का स्वभावत: पालन करते थे, जिससे वे लोग स्वस्थ रहते थे, उनका आचरण और व्यवहार परस्पर भी उत्तम होता था। एक दूसरे के प्रति सदभाव रखना तो उनकी प्रवृत्ति में सम्मिलित था ही साथ ही एक दूसरे का सहयोगी होना भी उनके जीवन का आवश्यक अंग था। उससे परस्पर सहयोग की भावना बनी रहती थी और लोग एक दूसरे के दुख दर्द में सहर्ष काम आते थे। उनकी यह भावना ही वास्तविक समाजवाद की भावना थी। आजकल के समाजवाद को भारत ने अपना तो लिया है परंतु यह केवल कागजों में अपनाया गया है तभी तो हमने वास्तव में यथार्थ के धरातल पर पूंजीवाद का निर्माण कर डाला है। जिसके कारण देश में धनियों की गिनती होती है कि 'टॉप टैन' धनिक अब कौन-कौन हैं? क्या कभी कोई ऐसी प्रतियोगिता भी आयोजित की गयी है जिससे यह जानकारी ली दी गयी हो कि देश के ऐसे दस सर्वाधिक धनी लोग कौन हैं जिन्होंने गरीबों की भलाई का कार्य किया हो? या कुछ गांवों में प्राथमिक विद्यालय स्थापित कर या अस्पताल खुलवाकर अपनी मानवता का परिचय दिया हो? हमारा मानना है कि जब तक 'सबसे बड़े धनी' की प्रतियोगिता आयोजित होती रहेगी या अपने प्राचीन आदर्शों को न अपनाया जाएगा तब तक वास्तविक अर्थों में देशोत्थान हो पाना असंभव है। देशोत्थान के लिए अतीत के दर्पण में झांकना ही पड़ेगा।

राकेश कुमार आर्य ( 1586 )

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