दिल्ली का मौन और पर्यावरण प्रदूषण

  • 2016-11-09 06:45:35.0
  • राकेश कुमार आर्य

दिल्ली का मौन और पर्यावरण प्रदूषण

एक विशेष जानकारी के अनुसार विश्व में बढ़ते पर्यावरण प्रदूषण के कारण 50 से 150 प्रजातियां प्रतिदिन समाप्त होती जा रही हैं। सब जानते हैं कि ईश्वर ने प्रत्येक प्रजाति को एक दूसरे का पूरक बनाकर भेजा है, इसलिए प्रत्येक प्रजाति का अस्तित्व में बने रहना इस संसार चक्र या सृष्टि चक्र को चलाये रखने के लिए बहुत ही आवश्यक है। परंतु इसके उपरान्त भी मानव समझने को तैयार नहीं है। कोई ऐसी सर्वमान्य और सर्व स्वीकृत प्रणाली विकसित करने के लिए भी मानव तैयार नहीं है जिसे अपनाकर पर्यावरण प्रदूषण से मुक्ति मिल सके। वैसे ऐसी एक ही प्रणाली है-यज्ञ की। यज्ञ प्रणाली को अपनाकर पर्यावरण असंतुलन की इस विकट समस्या से मुक्ति मिल सकती है-पर उसे कुछ लोग साम्प्रदायिक मानते हंै, इसलिए उसे विश्व मानने से मना कर देता है। इसी को कहते हैं-'विनाश काले विपरीत बुद्घि' -जिसे अपनाकर हमारे प्राण बच सकते हैं वह प्रणाली भी 'साम्प्रदायिक' हो गयी-इससे अधिक हास्यास्पद स्थिति इस तथाकथित 'सभ्य समाज' के लिए और कोई हो नहीं सकती। इस समाज में सत्य को सत्य कहने और सत्य रूप में उसे स्वीकार करने की क्षमता या साहस नहीं है-इसलिए ही यह मर रहा है।


दीपावली पर आतिशबाजी से बढ़े वायु प्रदूषण ने दिल्ली का दम घोट कर रख दिया है। ब्लड प्रेशर वाले और हृदय रोगियों की समस्याएं अचानक बढ़ गयीं। लोगों को सांस लेने में कष्ट होने लगा और आंखों में जलन होने लगी। दीपावली वालों पर 'ईद' वाले हँसने लगे कि ये कितने गलत ढंग से अपना त्यौहार मनाते हैं, वे भूल गये कि तुम भी एक दिन लाखों-करोड़ों जीवों की हत्या करके इससे भी 'बड़ा पाप' करते हो और दुनिया के लिए अस्तित्व का संकट खड़ा करने में सहायता करते हो। 'दीपावली वाले' कहते हैं कि पहले 'ईद वालों' को सुधारो और 'ईद वाले' कहते हैं कि पहले 'दीपावली वालों' को सुधारो। सरकार चुप रहती है, समाज चुप रहता है और तो और कानून भी चुप रहता है। जब सब चुप रहेंगे तो दम तो घुटेगा ही। 'दिल्ली' को बोलना चाहिए पर वह नहीं बोलती-इसलिए आज इसका दम घुट रहा है। बकरे कटवाएगी और बारूद से खेलेगी तो परिणाम भी ये ही भोगेगी। अपने बच्चों को यदि इतना भी नहीं सिखा सकती कि सब प्राणी जीवित रहने आवश्यक हैं अन्यथा हम भी नहीं बचेंगे और बारूद से खेलना ठीक नहीं तो फिर पटरानी बनने का अधिकार इस दिल्ली को नहीं है? सारी व्यवस्था की जुबान पर ताले पड़े हैं-सर्वोच्च न्यायालय को इन तालों को तोडऩे के लिए न्याय का हथौड़ा मारना पड़ा है। एनजीटी को अपना कत्र्तव्य अब याद आया है-जब पानी सिर के ऊपर से निकल गया है।

क्या हम इसी मूर्खता में फंसे रहेंगे कि पहले अच्छी बात को 'ईद वाले' मानें हम तब मानेंगे और ईद वाले कहें कि इस अच्छी बात को पहले 'दीपावली वालों' से मनवाओ हम तब मानेंगे? कहां गये सारे भारतीय होने के दावे? कहां गये हमारे सर्वप्रथम मानव होने के दावे? और कहां गयी हमारी सभ्य मानव होने की ताल ठोंकती वह झंकार जिसे हम बात-बात पर ठोंकते रहते हैं? लगता है सरकार भी एक पक्ष हो गयी है-तभी तो वह न्यायसंगत निर्णय न लेकर 'दम घोंटू' बीमारी का स्वयं भी शिकार हो गयी है।

एक षडय़ंत्र के अंतर्गत हमारे लिए ऐसे स्मॉग लाने की तैयारी की गयी। इस षडय़ंत्र में हमारी सरकारें भी सम्मिलित रहीं। षडय़ंत्र था-हमारे बीच से गाय और दुधारू पशुओं को हमसे छीन लेना। उन्हें काटते-काटते हमने कितना छोड़ा है? लाखों पशुओं को जल्लाद सुबह के सूर्य की पहली किरण देखने से पहले ही उड़ा देते हैं। जी हां, ये वही पशु कटते हैं जो किसान को पराली को जलाने से रोकते हैं और उसे चारे के रूप में खाकर उसका आपको दूध बनाकर देते हैं और आपके स्वास्थ्य की रक्षा करते हैं। ईश्वर ने उन्हें पराली खाकर प्रकृति की सफाई के लिए भेजा है, उस पराली से वह गोबर की खाद तैयार कराते हैं, जिससे उत्पादन बढ़ता है और हमारे लिए ये पशु दूध देते हैं, जिससे हमारा ओज व तेज बढ़ता है। इस सबसे बढक़र यह बात होती है कि हमारा पर्यावरण संतुलन बना रहता है। यह स्वाभाविक प्रक्रिया है-पर्यावरण संतुलन बनाये रखने की, जिसे मनुष्य ने स्वयं ही गड़बड़ाया है। आज जब पानी सिर से ऊपर से गुजर गया है तो व्यवस्था माथा पकडक़र बैठी है कि यह क्या हो गया? थोड़ी देर के लिए यदि हम सचमुच का इंसान बनकर देख लें तो पता चल जाएगा कि जिसे हम सभ्यता कह रहे हैं वही तो असभ्यता है और वही हमारा दम घोंट रही है। इसी असभ्यता ने हमें ईद वाले या दीपावली वाले बना दिया है। हम पर्व वाले नहीं रहे, अब हम मानव नहीं रहे क्योंकि सही समय पर हमारी दिल्ली मौन रही? इसी इंद्रप्रस्थ में कभी 'भीष्म' भी सही समय पर मौन रह गये थे-तो पता है परिणाम क्या हुआ था? आप सभी जानते हैं-बताने की आवश्यकता नहीं है। दिल्ली के इस आज के मौन का परिणाम भी क्या होगा? यह भी बताने की आवश्यकता नहीं है, पर ईश्वर करे कि वह ना हो। अच्छा हो कि दिल्ली अपने नागरिकों को नागरिक माने और उन पर समान रूप से एक कानून लागू कर दे कि न तो अब कोई पशु कटेगा और न कोई आतिशबाजी होगी, सारी अव्यवस्था ठीक हो जाएगी। देखते हैं दिल्ली इतना साहस कर पाएगी या नहीं?

राकेश कुमार आर्य ( 1582 )

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