कश्मीर की कशिश के राजदार -3

  • 2016-07-29 09:30:30.0
  • राकेश कुमार आर्य

कश्मीर की कशिश के राजदार -3

अवन्तिपुर में स्थित 'अवन्तीश्वर' और अवन्तिवर्मन के मंदिर के खण्डहर आज भी उसकी कला के प्रति अनुराग का परिचय दे रहे हैं। श्री जगमोहन जी ने लिखा था-

''सभी दृष्टिकोणों से अवन्तिवर्मन का काल कश्मीर के इतिहास का वैभवपूर्ण समय था। वहां तब शांति, विकास और न्याय था, राजा और उसके मंत्रियों में परस्पर समन्वय था।''

इसके पश्चात इसके वंश में भावुक पर आधिपत्य जमाने वाला राजा शंकरवर्मन हुआ। जिसके बाद गोपालवर्मन जैसा व्यवहार कुशल और बुद्घिमान शासक कश्मीर को मिला। इस समय काबुल पर हिंदू राजाओं का राज्य था। अलबरूनी ने भी इस बात की साक्षी दी है। उन हिंदू शासकों से इस सुयोग्य शासक गोपालवर्मन ने मित्रतापूर्ण संबंध स्थापित किये।

लोहरवंश और कश्मीर

इस वंश का केन्द्र 'लोहरिन' कश्मीर के पुंछ जिले में आज भी स्थित है। इसवंश की कुशल शासिका रानी 'दिद्दा' ने अपनी प्रतिभा से आधी शताब्दी तक कश्मीर पर शासन किया और इतिहास पर अपनी अमिट छाप छोड़ी।

सन 950 ई. से सम्राट क्षेमगुप्त का शासन आरंभ होता है। इसी की रानी का नाम दिद्दा था। जिसने कुछ उसी प्रकार सम्राट पर अपना जादू चढ़ा रखा था जिस प्रकार नूरजहां ने जहांगीर पर अपना जादू चढ़ा लिया था।

सन 958 ई. में सम्राट क्षेमगुप्त का देहांत हो गया तो उसका पुत्र 'अभिमन्यु' बाल्यावस्था में अपनी माता के संरक्षण में शासक बना। इस प्रकार रानी का राजकीय कार्यों से हस्तक्षेप यथावत बना रहा। किं तु सन

972 में अभिमन्यु का भी देहांत हो गया। तब उसके अवयस्क पुत्रों को राजगद्दी पर बिठाया गया।

कुछ समय पश्चात सन 980 ई. तक दिद्दा के बेटे-पोते सभी समाप्त हो गये। तब उसने स्वयं राजगद्दी संभाली और अपने प्रेमी, एक साधारण से चरवाहे को अपना प्रधानमंत्री नियुक्त किया। श्रीनगर में दिद्दा मार्ग इसी महत्वाकांक्षी रानी की स्मृति में मौजूद है। इस रानी के जीवन के विलास और व्यभिचार के जीवन से अलग कुशल शासन की सभी इतिहासकारों ने मुक्तकंठ से प्रशंसा की है।

अपनी वृद्घावस्था में उसने अपने भाई (लोहर के शासक) उदयराज के पुत्र 'संग्रामराज' का राज्याभिषेक कर 25 वर्ष स्वयं शासन करके राजकार्य से स्वयं को अलग कर लिया। वह तेजस्वी एवं वर्चस्वी शासक सिद्घ हुआ जिससे महमूद गजनवी दो बार पराजित हुआ था। इसने सन 1003 से सन 1028 ई. तक कश्मीर पर शासन किया। सन 1015 ई. और सन 1021 ई. में महमूद गजनवी ने इस पराक्रमी शासक से मुंह की खाई थी और वह इतना भयभीत हो गया था कि फिर तीसरी बार उसने इस राज्य की ओर मुंह करके भी नही देखा। मुस्लिम इतिहासकार नजीम ने अपनी पुस्तक

'महमूद ऑफ गजनवी' में लिखा है-

''बर्बादी की संभावना से डरकर महमूद ने दुम दबाकर भाग जाने में ही अपनी कुशलता समझी। इस पराजय से उसे कश्मीर की अजेय शक्ति का आभास हो गया और कश्मीर को हस्तगत कारतूसों के कारण हुए प्रथम स्वातंत्रय समर का यह इतिहास भी बोल रहा था। किंतु स्वतंत्रता के उपरांत हमने गाय को स्वयं ही मारना और खाना आरंभ कर दिया। क्योंकि स्वतंत्रता मिलते ही हम

'धर्मनिरपेक्ष' हो गये।''

गाय की महिमा

गाय हमारे लिए कितना उपयोगी पशु है? आज हम पैसे के लालच में सभी कुछ भुला बैठे हैं, देखिये-

-गाय के सूखे गोबर पर एक चम्मच गाय का घी डालकर धुंआ करने से 9 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र का पर्यावरण शुद्घ होता है।

-गाय के गोबर से लिपे मकान पर रेडियोधर्मिता का कोई प्रभाव नही पड़ता।

-गाय के घी से यज्ञ करने पर एक तोला घी से दो टन ऑक्सीजन बनता है।

-मात्र एक गाय के गोबर से प्रतिवर्ष 450 लीटर बायो गैस मिलता है जिसके उपयोग से 6 करोड़ 80 लाख टन लकड़ी बचेगी। जिससे 15 करोड़ वृक्ष कटने से बचेंगे और पर्यावरण का संरक्षण होगा। गैस के आयात के कारण होने वाले करोड़ों रूपये बचेंगे।

-चिकित्सकों के शोध प्रबंध बता रहे हैं कि गाय का दूध कोलेस्ट्रोल नही बनाता है। जिससे हार्ट अटैक का खतरा नही रहता।

किंतु दुर्भाग्य से आज भारत में चार हजार से भी अधिक कत्लखाने चल रहे हैं, जिनकी संख्या स्वतंत्रता के पूर्व मात्र 300 थी। अब जबकि गाय को गाय माता के रूप में पूजने का समय आया तो हमने उसे कटने और बे-मौत मरने के लिए विवश कर दिया क्योंकि हम 'शिक्षित' हो गये हैं। उधर हमारे वे अशिक्षित पूर्वज थे जिन्होंने विदेशी शासकों के समय में रहते हुए भी पशुधन और गोधन का संरक्षण और संवर्धन किया था। आप अनुमान लगायें फिर महान कौन रहा हम शिक्षित या वे अशिक्षित हमारे पूर्वज

?

मानवभक्षी शिक्षा

भला ऐसी शिक्षा भ्ी किस काम की जो व्यक्ति की मानवता को ही समाप्त करा दे? वे शिक्षित किस काम के जो शिक्षा का अर्थ तक न जानते हों। जो आंकड़े हैं वे न केवल इन शिक्षितों की पोल खोलते हैं अपितु इतने भयानक हैं कि रोंगटे खड़े कर देते हैं-जैसे-

-संसद में दिये गये सरकारी आंकड़ों के अनुसार लगभग तीस हजार गोवंश प्रतिदिन कट रहा है।

-भारत में गायों की लगभग आधा दर्जन नस्लें पूरी तरह समाप्त हो चुकी हैं जबकि कई समाप्ति के कगार पर हैं।

-पाकिस्तान, बांग्लादेश में तस्करी से प्रतिदिन बीस हजार गोवंश जाता है। बकरीद पर तो यह पांच लाख से ऊपर की संख्या में वहां पहुंचता है।

-यदि गोवंश समाप्ति की स्थिति और गति यही रही तो आगामी दशकों में भारत के गोवंश पूरी तरह समाप्त हो चुका होगा।

इस दर्दनाक और भयानक स्थिति को हम भारत का उजडऩा और इंडिया का बसना मानते हैं। वास्तव में हमारे देश में स्वतंत्रता के पश्चात जितनी गिरावट हर क्षेत्र में अनुभव की जा रही है उतनी अंग्रेजों के समय में भी नही की गयी थी।

क्रमश:

राकेश कुमार आर्य ( 1580 )

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