'समान नागरिक संहिता' और 'तीन तलाक'

  • 2016-10-18 03:30:34.0
  • राकेश कुमार आर्य

समान नागरिक संहिता और तीन तलाक

भारतीय संविधान के अनुच्छेद 44 में व्यवस्था की गयी है कि राज्य सभी नागरिकों के लिए समान नागरिक संहिता बनाने का प्रयास करे। 10 मई 1995 को भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने भारत के प्रधानमंत्री को इस दिशा में पहल करने का स्पष्ट निर्देश दिया था। साथ ही इस बात पर दु:ख भी व्यक्त किया था कि पिछली सभी सरकारों ने इस दिशा में कोई ठोस कार्य न करके अपने संवैधानिक उत्तरदायित्व का निर्वाह करने में चूक की है।


अब 10 मई 1995 को बीते हुए दो दशक से अधिक का समय हो गया है और देश में संविधान लागू किये हुए लगभग 7 दशक होने को आ रहे हैं। पर हमने देश में 'समान नागरिक संहिता' लागू करने की दिशा में कोई भी ठोस कदम नही उठाया। बात साफ है कि देश में 'समान नागरिक संहिता' की स्थापना की जाए। उस समय के हिंदूवादी राष्ट्रवादी नेताओं की सोच थी कि स्वतंत्र भारत में किसी प्रकार का मजहबी तुष्टिकरण न किया जाए और देश में एक जैसी नागरिक संहिता लागू की जाए। नेहरूजी की यह प्रवृत्ति थी कि जो हिंदूवादी राष्ट्रवादी नेता बोलते थे उसके विपरीत जाकर उन्हें राजनीतिक निर्णय लेने में 'मजा' आता था। अत: नेहरू जी ने देश के संविधान में 'समान नागरिक संहिता' का स्पष्ट उल्लेख होते हुए भी उसे लागू करने की राजनीतिक इच्छाशक्ति का कभी प्रदर्शन नही किया।


फलस्वरूप मामला लटक गया और उदासीनता की टोकरी में फेंक दिया गया। तब से लेकर अब तक जितना ही 'समान नागरिक संहिता' को हिंदूवादी दलों ने देश में लागू करने की मांग की उतना ही इसे कांग्रेस और कम्युनिस्ट दलों ने मुस्लिमों को यह दिखाने का प्रयास करते हुए उनसे उनके वोट लेने का काम किया कि यदि कोई हिंदूवादी दल केन्द्र में सरकार बना गया तो वह 'समान नागरिक संहिता' लागू करके उनके 'मजहब' को खा जाएगा। यह सुनकर मुस्लिमों ने बड़े आराम से अपना 'भयादोहन' कराया और उन्होंने कांग्रेस और उसकी विचारधारा के लोगों का या राजनीतिक दलों का 'वोट बैंक' बनना स्वीकार कर लिया। इस प्रकार एक अच्छी बात राजनीति की दलदल में जाकर फंस गयी और जो कार्य बहुत पहले हो जाना चाहिए था वह राजनीतिक दलों की पारस्परिक मूर्खताओं के कारण हो नही पाया। ऐसे में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी का यह कथन उचित ही है कि अभी तक मुस्लिमों को केवल 'वोट बैंक' के रूप में प्रयोग किया गया। कठमुल्ला और राजनीतिक लोग उन्हें आधुनिकता के साथ जुडऩे नही देना चाहते हैं, क्योंकि इससे उनकी दुकानदारी बंद हो सकती है। ये लोग सारे मुस्लिम समाज को अशिक्षित बनाये रखना चाहते हैं, क्योंकि उनके तुच्छ स्वार्थों की पूत्र्ति होना तभी संभव है जब मुसलमान अशिक्षित हों।


अब एक प्रश्न और भी है कि यदि इस देश का एक साधारण व्यक्ति कानून का पालन नही करता है तो उस पर कोई न कोई कार्यवाही की जाती है, परंतु देश का चुना हुआ तंत्र संवैधानिक व्यवस्था को न अपनाये या उसका उल्लंघन करे तो उनके विरूद्घ कार्यवाही क्यों नही होती? देश का संविधान कह रहा है कि देश में 'समान नागरिक संहिता' बनाओ और देश का सर्वोच्च न्यायालय देश की सरकारों द्वारा इस दिशा में अपनायी गयी उदासीनता को दुख का विषय मान रहा है पर राजनीति है कि वह सुनती ही नही है। लगभग 70 वर्ष से हमारे 'माननीय' सांसद, मंत्री, प्रधानमंत्री और प्रदेशों के मुख्यमंत्री संविधान के अनुसार कार्य करने की वचनबद्घता को बार-बार दोहराते आये हैं, पर किसी ने भी 'समान नागरिक संहिता' को लागू कराने की बात नही की। इसका अभिप्राय है कि उन्होंने देश के संविधान की आत्मा की आवाज के अनुसार कार्य नही किया। जबकि देश में 'समान नागरिक संहिता' लागू की जानी चाहिए थी, यह समय की आवश्यकता थी।


देश में यदि 'समान नागरिक संहिता' लागू होती है तो उससे वास्तविक पंथनिरपेक्षता को अपनाने और देश के नागरिकों के मध्य वास्तविक सदभाव को विकसित करने में सहायता मिलेगी। पंथनिरपेक्ष राज्य का सही अर्थ भी यही है कि वह अपनी ओर से अपनी उक्ति और कृति में ऐसा कोई अंतर नही दिखाएगा कि किसी एक संप्रदाय को ही वह प्राथमिकता दे रहा है, या उसका तुष्टिकरण कर रहा है। इस स्थिति से देश के सभी संप्रदायों की किसी निजी मान्यता को भी संरक्षण मिलता है और सही में तो संप्रदायों की निजी मान्यताओं को सुरक्षित और संरक्षित करने के लिए ही 'समान नागरिक संहिता' की आवश्यकता अनुभव होती है। जैसे कोई हिंदू यदि मुस्लिमों की तीन तलाक की व्यवस्था का उपहास करता है तो मुस्लिमों को हिंदू के विरूद्घ भी कार्यवाही करने का अधिकार होगा और कानून ऐसे हिंदू से अपने ढंग से निपटेगा, साथ ही उसे बताएगा कि देश की एकता और अखण्डता को बनाये रखने और सामाजिक भाईचारे को निर्विघ्न चलाये रखने के दृष्टिगत तुम ऐसा कोई कार्य नहीं करोगे जो तुम्हारे पड़ोसी को बुरा लगे। मुस्लिम समाज को यह बात समझनी होगी कि 'समान नागरिक संहिता' लागू करना और तीन तलाक की उनकी व्यवस्था पर चर्चा होना दोनों विपरीत बातें हैं। 'समान नागरिक संहिता' उनको संरक्षण प्रदान करने वाली व्यवस्था है, जिसे संसार के सभी विकसित और बड़े राष्ट्रों ने अपनाया है, जबकि तीन तलाक की उनकी व्यवस्था उनकी एक सामाजिक बुराई है जो महिलाओं की स्थिति को 21वीं सदी में भी दयनीय बनाये हुए है। तीन तलाक की व्यवस्था में सुधार के लिए आज समय उनकी दहलीज पर एक क्रांति का प्रतीक बनकर आया है, जो कह रहा है कि प्रगतिशील बनो। जबकि 'समान नागरिक संहिता' उन्हें अपने भारत में समान अधिकारों की गारंटी देने वाली संवैधानिक व्यवस्था का प्रतीक है-जो कह रही है कि-आओ!..और समान संरक्षण पाओ। हमें इन दोनों में अंतर करके देखा जाना चाहिए।

राकेश कुमार आर्य ( 1580 )

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