भारत के बौद्धिक नेतृत्व की दिशा

  • 2018-04-16 07:30:36.0
  • राकेश कुमार आर्य

भारत के बौद्धिक नेतृत्व की दिशा

किसी भी देश का, समाज का, राष्ट्र और संगठन या परिवार का नेतृत्व वास्तव में उसके बौद्धिक मार्गदर्शकों के पास होता है। जिस देश का बौद्धिक नेतृत्व दिग्भ्रमित हो जाता है, वह देश भी दिग्भ्रमित हो जाता है। भारत के साथ इस समय सबसे बड़ी समस्या ही ये है कि इसका बौद्धिक नेतृत्व दिग्भ्रमित है। बौद्धिक नेतृत्व के विषय में यह ध्यान रखना चाहिए कि यह नेताओं के पास कम और समाज के उन बुद्धि सम्पन्न लोगों के पास अधिक मिलता है जो अपनी रचनात्मक बौद्धिक क्षमताओं से देश और समाज को दिशा दे सकते हैं। हमारे लिए यह सौभाग्य की बात है कि हमारे ऋषियों ने प्राचीन काल से बौद्धिक नेतृत्व और राजकीय नेतृत्व दोनों की अनिवार्यता को अपनी स्वीकृति प्रदान की। इसे उन्होंने ब्रहम बल या शास्त्रबल और क्षात्रबल या शस्त्रबल कहकर अभिहित किया था। आज हमारा यह ब्रहमबल या शास्त्रबल या बौद्धिक नेतृत्व ही दिग्भ्रमित है। वर्तमान लोकतंत्र की व्याख्या और रचना इस प्रकार की गयी है कि वह स्वयं को ब्रहमबल के हस्तक्षेप से मुक्त रखने के लिए लालायित दिखाई पड़ता है। वह स्वतंत्र रह कर कार्य करना चाहता है। स्वतंत्र रहकर कार्य करने की नेताओं में क्षमता नहीं है। उनकी इस अक्षमता का लाभ उच्चाधिकारी उठाते हैं और वे उन्हें अपने ढंग से आवश्यकतानुसार छुपा लेते हैं। इस प्रकार लोकतंत्र लोकाभिव्यक्ति का माध्यम न बनकर कुछ उच्चाधिकारियों की चेरी बनकर रह जाता है। एक ऋषि अर्थात संसार के मायामोह और रागद्वेष से मुक्त व्यक्ति ही लोक और तंत्र के लिए नि:स्वार्थ परामर्श दे सकता है ना कि मायामोह और रागद्वेष में आकण्ठ डूबा हुआ कोई अधिकारी ऐसा परामर्श दे सकता है। मायामोह और रागद्वेष में आकण्ठ डूबे हुए अधिकारी और नेता तो मिलकर देश को लूटने की ही योजना बना देंगे, और वे यही कर भी रहे हैं। इसका अभिप्राय है कि वर्तमान लोकतंत्र की रचना और व्याख्या में मौलिक दोष हैं। इस में देश के लिए समर्पित मायामोह और रागद्वेष से ऊपर उठे हुए व्यक्तियों के लिए कोई स्थान नहीं है।
देश के षडयंत्रकारियों ने शस्त्रबल अथवा राजकीय सत्ता को अपने लिए हथिया लिया है और हम जिस लोकतंत्र में रहते हुए जीवनयापन कर रहे हैं वह लोकतंत्र 'छलिया लोकतंत्र' बनकर रह गया है। देश की नि:स्वार्थ ऋषि परंपरा का स्थान लेने के लिए इस समय देश में भारी मारा मारी चल रही है। इसमें मीडिया के कुछ ऐसे पत्रकार और कथित सम्पादक भी सम्मिलित हैं जो अपने लिए दूसरों से लिखवाते हैं और जिन्हें देश की संस्कृति का और देश के लोकतांत्रिक मूल्यों का कोई मौलिक ज्ञान नहीं होता। पर उन्हें अहंकार इतना होता है कि उसमें सड़े मरते हैं। ये बौद्धिक अहंकार में जीते हैं और इसके उपरान्त भी ऋषि परम्परा के दावेदार बनते हैं। स्पष्ट है कि ये लोग ऋषि परम्परा के दावेदार नहीं हो सकते। ऐसी ही चेष्टा करते हुए कुछ 'बाबा' दिखायी देते हैं कुछ मौलवी दिखायी देते हैं तो कुछ दूसरे धार्मिक नेता दिखायी देते हैं। ये सारे के सारे ऐश्वयपूर्ण और वासनात्मक जीवन शैली में रह रहे हैं, कोई भी झोंपड़ी में रहने वाला विदुर या चाणक्य इनमें से नहीं है। फिर भी कहते हैं कि देश के ब्रहमबल के दावेदार हम हैं। इनका चिन्तन लोकोपकारी नहीं है, पक्षपात शून्य नहीं है, महाश्रवणशक्तिसम्पन्न अर्थात सबकी सुनकर न्याय देने वाला नहीं है। इनके चिन्तन में अपने सम्प्रदाय का चिन्तन है। अत: इनकी सोच साम्प्रदायिक है, मानवतावादी और राष्ट्रपरक नहीं है, विश्वजनीन नहीं है, सर्वकल्याणकारी नहीं है, इन्हें साम्प्रदायिक नेता कहा जाना चाहिए ना कि धार्मिक नेता। क्योंकि धर्म तो मानवता को जोड़ता है, सम्प्रदाय उसे तोड़ता है। दुर्भाग्य है देश के लोकतंत्र का कि तोडऩे वालों को जोडऩे वाला माना जा रहा है। जब भी कोई तथाकथित धर्माधीश अपने सम्प्रदाय के लोगों की बातों को उठाता है तो उसके चिन्तन से उदभूत उसकी वाणी से प्रसृत होने वाले शब्द साम्प्रदायिकता की दुर्गन्ध से दुर्गन्धित होते हैं। वे नीरस होते हैं, रसहीन होते हैं। ऐसे धर्माधीश गर्जन तर्जन के साथ सत्ताधीशों को और न्यायाधीशों को धमकाते हैं और बुद्धिशून्य तथा वोटों के लालची सत्ताधीश कई बार इन धर्माधीशों की धमक में आकर न्यायाधीशों को भी इनके अनुकूल चलने की प्रेरणा देने लगते हैं। इसी प्रकार साम्प्रदायिक धर्माधीश अप्रत्यक्ष रूप से सत्ताधीशों को अपनी धमक में ले लेते हैं। इससे इन धर्माधीशों की पौ बारह होती है। उनके अनुयायी बढ़ते हैं। चुनाव के समय देश के नेता इनके तलवे चाटते हैं। इनका आशीर्वाद लेते हैं और ये धर्माधीश इस समय अपने स्वार्थ साध जाते हैं। जनता समझ ही नहीं पाती कि तुम्हारा कहां, कब और कैसे मूर्ख बना दिया गया है। इस अन्धेरनगरी में राजा भी बिक रहा है और जनता भी बिक रही है।
टी.वी. पर चर्चाएं चलती हैं। सारे के सारे पैनल वाले लोग अपने-अपने मत पर हठ करके बैठते हैं। पहले से ही मन बनाकर आते हैं कि मुझे क्या बोलना है? और उससे अलग जाकर बोलने को वे तैयार ही नहीं होते। टी.वी. एन्कर को देखें तो वह अपने आपको सबसे अधिक बुद्धिमान मानता है। उसे धर्म की परिभाषा का पता नहीं होता, संस्कृति का पता नहीं होता, पर वह कहता है कि मेरी बुद्धि के सामने सब बौने हैं। साधना उसकी भी नहीं होती। सात्विक व दार्शनिक ज्ञान से वह भी वंचित होता है। मायामोह और रागद्वेष में वह भी बंधा होता है, पर अपने आपको ऐसे दिखाता या प्रस्तुत करता है जैसे कि उससे अधिक विवेकशील कोई नहीं है। सारी टी.वी. चर्चाएं निरर्थक होकर रह जाती हैं। कांगे्रसी अपनी बात कहकर चला जाता है और भाजपा, सपा, बसपा वाला अपनी बात कह कर चला जाता है। राष्ट्रहित गौण हो जाता है और दलहित ऊपर आ जाता है। सारे के सारे साधनाविहीन लोग चैनलों पर बैठकर लोगों का समय नष्ट करते हैं। हमारा मानना है कि देश की संसद में दलीय आधार पर सीटों का आवंटन बन्द किया जाये। सत्तापक्ष और विपक्ष की अवधारणा भी समाप्त की जाये। देश में सरकार को किसी पार्टी की सरकार न कहकर राष्ट्रीय सरकार कहा जाये। संसद में जाकर सब के सब सांसद राष्ट्रीय हो जाएं। राष्ट्रहित में बोलने के लिए उन्हें प्रेरित किया जाये। सरकार को परामर्श और सहयोग देकर राष्ट्रहित की साधना करना इनका सामूहिक उद्देश्य होना चाहिए। हम इन्हें सरकार के कामों में अड़ंगा डालने के लिए नहीं भेजते हैंं, अपितु राष्ट्र साधना के लिए भेजते हैं और ये वहां जाकर बैठे बैठे या तो ऊंघते हैं या फिर अश्लील वीडियो देखते हैं या फिर अनावश्यक शोर में सम्मिलित होकर अपनी उपस्थिति प्रकट कराते हैं।
देश के लिए इस समय राष्ट्रहित को साधने वाली नि:स्वार्थी और मायामोह व रागद्वेष से मुक्त लोगों की एक धर्म संसद, शास्त्र संसद, ब्रहमसंसद- लोकोपकारी लोगों की ध्यानशाला की आवश्कता है। इसके लिए देश के लिए समर्पित राष्ट्रभक्तों को आगे आना होगा। देश को लूटने वाली मानसिकता के भंवरजाल से अपने आपको मुक्त करे और देश के लिए समर्पित, नि:स्वार्थी लोगों का साथ देने के लिए आगे आयें। समझना होगा और संकल्प लेना होगा:-
'कुछ लिखके सो कुछ पढक़े सो
तू जिस जगह जागा सवेरे
उस जगह से बढ़ के सो
बिना समझे बिना बूझे खेलते जाना
एक जिद को जकडक़र ठेलते जाना
गलत है, बेसूद है,
कुछ रच के सो, कुछ गढ़ के सो
तू जिस जगह जागा सवेरे
उस जगह से बढ़ के सो।'

राकेश कुमार आर्य ( 1577 )

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