भारत और 'इंडिया' का संघर्ष

  • 2016-07-19 03:30:53.0
  • राकेश कुमार आर्य

भारत और इंडिया का संघर्ष

भारत को 'इंडिया' बनाने की दिशा में 'कार्य प्रगति पर' है। देश में अनेकों स्थानों से इसे अपनाने के संकेत आने भी लगे हैं। 'इंडिया' बनाने में वही लोग रूचि ले रहे हैं, जिनका भारतीयता से कोई संबंध नही है, या जो स्वतंत्रता संग्राम के काल में अंग्रेजों की चाटुकारिता करने में लगे रहे और पाश्चात्य संस्कृति व सभ्यता को इस देश के लिए वरदान मानते रहे।

हमारा आशय यह है कि विदेशियों को हम कोई ऐसा संकेत ही नही देना चाहते जिससे उन्हें लगे कि भारत का अपना सब कुछ उसके पास है

, और भारत इसलिए भारत है कि वह संस्कृति जैसी भाषा की संस्कृति का उपासक देश है। हमारे देश में स्वतंत्रता के उपरांत जिस धर्मनिरपेक्षता का आवरण पहना है उसने भारतीय संस्कृति का सर्वनाश करने में महत्वपूर्ण योगदान दिया है।

इस छद्म धर्मनिरपेक्षता के आवरण में लिपटे सेक्युलर संस्कृत से डरते हैं। वह जानते हैं कि न्यूटन से पहले हजारों, लाखों नही अपितु असंख्य सेव धरती पर गिर चुके थे

, जिन्हें देख-देखकर हमारे ऋषियों ने बहुत पहले यह स्पष्टï कर दिया था कि पृथ्वी में गुरूत्वाकर्षण बल है। पर आज हमें पढ़ाया जाता है कि गुरुत्वाकर्षण का सिद्धान्त न्यूटन (1642 -1726) ने दिया। यदि विद्यार्थी संस्कृत पढेंगे तो जान जाएंगे कि यह असत्य है।

प्राचीन भारत के एक प्रसिद्ध गणितज्ञ भास्कराचार्य (1114 - 1185) के द्वारा रचित एक मुख्य ग्रन्थ 'सिद्धान्त शिरोमणि

' है हैं। भास्कराचार्य ने अपने 'सिद्धान्त शिरोमणि' में यह कहा है- 'आकृष्टिशक्तिश्चमहि तया यत् खस्थं गुरूं स्वाभिमुखं स्वशक्त्या ।

आकृष्यते तत् पततीव भाति समे समन्तात् पतत्वियं खे ।।'

- सिद्धान्त0 भुवन0 16

अर्थात-पृथ्वी में आकर्षण शक्ति है जिसके कारण वह ऊपर की भारी वस्तु को अपनी ओर खींच लेती है। वह वस्तु पृथ्वी पर गिरती हुई सी लगती है। पृथ्वी स्वयं सूर्य आदि के आकर्षण से रुकी हुई है

, अत: वह निराधार आकाश में स्थित है तथा अपने स्थान से हटती नहीं है और न गिरती है । वह अपनी कीली पर घूमती है।

इसी प्रकार वराहमिहिर (57 ईसा पूर्व) ने अपने ग्रन्थ 'पञ्चसिद्धान्तिका' में कहा है-

पंचभमहाभूतमयस्तारा गण पंजरे महीगोल:।

खेयस्कान्तान्त:स्थो लोह इवावस्थितो वृत्त: ।।

- पञ्चसिद्धान्तिका पृ

031

अर्थात- तारासमूहरूपी पंजर में गोल पृथ्वी इसी प्रकार रुकी हुई है जैसे दो बड़े चुम्बकों के बीच में लोहा ।

अपने ग्रन्थ सिद्धान्तशेखर में आचार्य श्रीपति ने कहा है -

उष्णत्वमर्कशिखिनो: शिशिरत्वमिन्दौ,.. निर्हतुरेवमवने: स्थितिरन्तरिक्षे ।। - सिद्धान्तशेखर 15/21 )

नभस्ययस्कान्तमहामणीनां मध्ये स्थितो लोहगुणो यथास्ते ।

आधारशून्यो पि तथैव सर्वधारो धरित्र्या ध्रुवमेव गोल: ।।

-सिद्धान्तशेखर 15/22

अर्थात-पृथ्वी की अन्तरिक्ष में स्थिति उसी प्रकार स्वाभाविक है, जैसे सूय्र्य में गर्मी, चन्द्र में शीतलता और वायु में गतिशीलता। दो बड़े चुम्बकों के बीच में लोहे का गोला स्थिर रहता है, उसी प्रकार पृथ्वी भी अपनी धुरी पर रुकी हुई है ।

सारा विश्व और हमारा नवयुवक भारत की अच्छी मान्यताओं को भी अपनाने के लिए तैयार इसीलिए नही है कि वह भारत की सांस्कृतिक और सामाजिक मान्यताओं को सड़ी गली मानने लगता है। अत: ईसाई मान्यताओं के प्रति भारत के पढ़े लिखे लोगों का स्वाभाविक आकर्षण बढ़ रहा है।

इस आकर्षण के पीछे हमारे महान-कर्णधारों की भारत के सांस्कृतिक मूल्यों के प्रति उपेक्षावृत्ति जब तक यहां पर लागू रहेगी तब तक आर्यसमाज जैसी पावन संस्थायें कितना ही प्रयास कर लें, आशानुरूप सफलता मिलना संदिग्ध है।

अत: दूर क्षितिज पर उभरते भारत के बचपन और यौवन से इस लेखनी की यही अपील है :-

  • कवि कुछ ऐसा राग सुनाओ।
  • जो हृदय को आंदोलित कर डाले।।
  • वीणा के सुर ऐसे निकले।
  • जो समाज को आंदोलित कर डालें।।
  • व्यवस्था बनी है गले की फांस।
  • अवरूद्घ हुआ जाता है श्वांस।।
  • दूर क्षितिज पर उभरी बदरी।
  • क्या बुझा सकेगी मेरी प्यास?
  • हे बदरी बरसो और मेरी प्यास बुझाओ,
  • कवि कुछ ऐसा रगा सुनाओ।।

सन 1914 ई. में ब्रिटेन के तत्कालीन प्रधानमंत्री रैमजे मैक्डोनाल्ड भारत आये थे। तब उन्हें गुरूकुल कांगड़ी में जाकर स्वामी श्रद्घानंद जी का आतिथ्य भाव प्राप्त करने का सौभाग्य मिला था। इसके लिए उन्होंने लिखा :-

'एक सेवक ने हमारे हाथों पर पानी डाला तौलिया से हाथ पौंछा, जूता निकालकर हमने खुले स्थान पर, चटाईयों पर बैठकर शाकाहारी भोजन से पूर्व प्रार्थना की, ऐसी प्रार्थना मैंने अपने जीवन में पहले कभी नही सुनी थी।'

यह था भारत की संस्कृति का आदर्श प्रभाव जिसने उस समय के सर्वाधिक शक्तिशंपन्न देश के प्रधानमंत्री से भी यह लिखवा लिया। दुर्भाग्य से यह परंपरा आज के नेतागण के द्वारा विस्मृत कर दी गयी है। यदि यह विस्मृति का भाव निरंतर बना रहा तो-

  1. न तो भारत विश्वगुरू बनेगा,
  2. वसुधा को परिवार बनाने का सपना भी पूरा नही होगा
  3. ईसाइयत के दंश से भारत का धर्म भी नही बचेगा
  4. ना ही बचेगी मानवीय गरिमा
  5. ना ही बचेगी नारी की अस्मिता

-क्रांति का नाद अब चहुं ओर बज चुका है, इन धूत्र्तों के काले कारनामे अब ज्यादा दिन चलने वाले नही हैं। अत: आप निश्चित रहें, इन तारांकित महत्वपूर्ण तथ्यों का उत्तर खोजने के लिए आज के भारत में मचलन उत्पन्न हो चुकी है, युवा जाग रहा है और भारत बदल रहा है। शुभ संकेत है

(लेखक की पुस्तक 'वर्तमान भारत में भयानक राजनीतिक षडयंत्र : दोषी कौन?' से)

राकेश कुमार आर्य ( 1580 )

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