आर्य समाज और हिन्दी भाषा-भाग-दो

  • 2016-12-09 11:00:40.0
  • राकेश कुमार आर्य

आर्य समाज और हिन्दी भाषा-भाग-दो

'महर्षि दयानंद जन्मशती समारोह' में अंतिम दिन एक सामूहिक प्रार्थना की गयी। जिसमें लोगों ने परमात्मा से कहा कि-''आज अर्वाचीन आर्यावत्र्त के सबसे बड़े सुधारक ऋषि दयानंद का जन्मदिवस है। प्रभो! आप ही की प्रेरणा से देश में महर्षि दयानंद का प्रादुर्भाव हुआ था। आर्यजाति की दुरावस्था, अनाथों की पुकार विधवाओं का विलाप, वैदिक धर्म की दुर्दशा, वैदिक सभ्यता का मरणोन्मुख होना सदाचार का मूल्य घटना, देश का विदेशियों द्वारा पददलित होना आदि ऐसी बातें नही थीं जो दयानंद के जन्म की प्रेरणा का कारण न बनती। प्रभो! दयानंद ने जन्म लेकर आपकी प्रेरणा का उद्देश्य समझा। मुनि विरजानंद उस उद्देश्य को समझाने का निमित्त बने। दयानंद ने इसी उद्देश्य की पूर्ति के लिए यज्ञ में अपनी जीवन आहुति दी। यज्ञ से सुगंधि निकली, कहीं वह अनाथालयों के रूप में दिखाई दी, कहीं स्कूल तथा कालेज, कहीं संस्कृत पाठशाला और गुरूकुल कहीं दलितोद्घार सभा और शुद्घि सभा, कहीं मुफ्त चिकित्सा और दरिद्रालयों, कहीं कुरीति निवारिणी और स्वराज्य सभाओं, कहीं मद्य निवारिणी और व्यायाम प्रचारिणी सभाओं आदि के रूपों में प्रकट हुई। प्रभो! आज जो हन्म यह शताब्दी जन्म समारोह मना रहे हैं, यह भी उसी आहुति की एक तुच्छ सुगंधि है।'


इस सामूहिक प्रार्थना के शब्दों पर ध्यान देने की आवश्यकता है। भारत के विषय में यदि निष्पक्ष आंकलन किया जाए तो कभी अरबी, फारसी या उर्दू ने या फिर अंग्रेजी ने यह नही सोचा कि यहां पर अनाथालयों का निर्माण किया जाए, संस्कृत पाठशाला या गुरूकुल खोले जायें, या दलितोद्घार सभा, शुद्घि सभा आदि का गठन किया जाए, या दरिद्रालय, मुफ्त चिकित्सालय, कुरीति निवारिणी सभाएं स्थापित की जाएं या कुरीति निवारिणी सभाएं, मद्य निवारिणी सभाएं, व्यायाम प्रचारिणी सभाएं आदि स्थापित कर भारत के लोगों का कल्याण किया जाए? इन विदेशी भाषाओं ने हिंदी को जड़ से समाप्त करने का बीड़ा उठाया और संस्कृत की तो कब्र ही खोद डाली। एक प्रकार से इन शासकीय भाषाओं का हिंदी से या संस्कृत से जन्मजात वैर था। यह कितना दुखद है कि जिन विदेशी भाषाओं ने भारत की संस्कृत व हिंदी भाषा से जन्मजात वैर माना आज यदि उनकी तानाशाही प्रवृत्ति के चंगुल से बचाकर हिंदी को सम्मान दिलाने की भी बातें की जाती हैं तो ऐसा करने वालों को भाषाई उपद्रवी या साम्प्रदायिक माना जाता है। जबकि यह प्रवृत्ति बहुत ही खतरनाक है।

हमने इस खतरनाक प्रवृत्ति को गले लगाया और गले लगाकर अंग्रेजी के व्यामोह में जीते हुए आजादी के 70 वर्ष पूर्ण कर लिये, तब जाकर पता चला कि निजभाषा में सोचने-समझने की प्रवृत्ति से बचकर चलने से हमने अपना स्वास्थ्य खो दिया-क्योंकि चिकित्सा विदेशी और महंगी हो गयी। हमने शिक्षा से संस्कार निकाल दिये-क्योंकि शिक्षा विदेशी हो गयी। हमने परिवारों में घुटन घुसा ली-क्योंकि परिवार नाम की संस्था का हमने विदेशीकरण या अंग्रेजीकरण कर दिया। स्वामी रामदेव जी जैसी प्रतिभाएं आज फिर स्वदेशी, स्वभाषा, स्वराज्य, स्वशासन की बात कर रही हंै, गुरूकुलीय शिक्षा प्रणाली और भारतीय चिकित्सा प्रणाली को अपनाने की बातें कर रही हैं तो हम देख रहे हैं कि भारत फिर उन्नति कर रहा है। 'स्व' को अपनाने और 'स्व' को खोजने के लाभ यदि आज हमें सही दिशा का बोध करा सकते हैं तो अब से सौ वर्ष पूर्व ऐसा क्यों नहीं करा सकते थे? वास्तव में उपरोक्त प्रार्थना में ईश्वर के प्रति कृतज्ञता प्रकट की गयी कि तुमने अच्छा ही किया कि हमारे भीतर 'स्वबोध' करा दिया और हमें अपनी भाषा में सोचने व समझने की शक्ति प्रदान की अन्यथा हम कभी भी उन्नति नहीं कर पाते।

उक्त प्रार्थना को आगे बढ़ाते हुए कहा गया था-''ऐसे पवित्र अवसर पर प्रभो! यहां एकत्रित हुए हम लक्षों नर-नारी, इस सारे चमत्कार को आपकी अपार दया की, एक विभूति समझते हुए कृतज्ञता का प्रकाश करने के लिए श्रद्घा, भक्ति और प्रेम के साथ आपके सम्मुख अपने सिरों को झुकाते हैं। (तब सभी उपस्थित लोगों ने अपने सिर झुका लिये थे) और प्राणिमात्र के उपकार के लिए जो आर्य समाज का मुख्य उद्देश्य है-आपके दिये हुए वेदों के शब्दों में आपसे प्रार्थना करते हैं :-
''आ ब्रह्मन् ब्राह्मणो ब्रह्मवर्चसी जायताम् आ राष्ट्रे राजन्य: शूर इषव्यो अति व्याधी महारथो जायताम् दोग्ध्रींधेनुर्वोढा अनड्वानाशु: सप्ति: पुरन्धिर्येषा जिष्णु रथेष्ठा:। सभेयोयुवास्य यजमानास्य वीरो जायताम्। निकामे-निकामे न: पर्जन्यो वर्षतु, फलवस्त्रो न ओषधय: पच्यन्ताम् योगक्षेमो न: कल्पताम्।''

अर्थात हे प्रभो! इस बृहद राष्ट्र में तेजस्वी वेदवित् ब्राह्मण उत्पन्न हों। शस्त्रास्त्र विद्या में निपुण दुष्टों का (विदेशी आततायी शासकों का) दमन करने वाले, महाबलवान, निर्भय और वीर क्षत्रिय उत्पन्न हों, दूध देने वाली गायें उत्पन्न हों, भार ले जाने वाले बैल, शीघ्रगामी घोड़े व्यवहारकुशल स्त्रियां महारथी शत्रुओं के विजेता पुरूष उत्पन्न हों। यजमान का घर वीर पुत्रों से (जिससे कि विदेशी शासकों को देश से शीघ्रातिशीघ्र भगाया जा सके) भरा हो। समय पर वर्षा हो, हमारे लिए उत्तम फलों को देने वाली औषधियां पकें तथा हमारा योगक्षेम हो।''

कितना पवित्र चिंतन है-अपनी संस्कृत और हिंदी का? माना कि ये दोनों भाषाएं आक्रामकों की भाषाएं नही रहीं, क्योंकि भारत ने कभी दूसरों की संप्रभुता को नष्ट करने का प्रयास नहीं किया। अत: जो लोग भाषाओं के प्रचार-प्रसार के लिए उसके माने वालों का आक्रामक होना भी आवश्यक मानते हैं-उन्हें यह पता होना चाहिए कि ऐसी भाषाएं जो आक्रामकों की भाषाएं होने का दम्भ भरती हैं, कभी भी सभ्यता और शालीनता का प्रचार-प्रसार करने में सफल नहीं हो सकतीं। इसके विपरीत वे अत्याचार और अनाचार को बढ़ावा देने वाली ही होती हैं। जैसा कि हमने तुर्कों, मुगलों और अंग्रेजों की भाषाओं को देखा है। भारत की भाषा की विशेषता रही कि वह 'सर्वे भवन्तु सुखिन: सर्वेसन्तु निरामया' कहने वाली रही। उसने विश्व को बताया कि 'आत्मन: प्रतिकूलानि परेषां न समाचरेत्' अर्थात आपको जो व्यवहार अपने लिए उचित ना लगे उसे दूसरों के साथ मत करो।

बात साफ है कि संस्कृत और हिंदी में सोचकर व्यक्ति कभी भी किसी की संप्रभुता का या उसके सम्मान का अतिक्रमण करने की सोच भी नहीं सकता। परंतु ऐसा भी नहीं है कि संस्कृत और हिंदी में सोचकर व्यक्ति 'गालों पर चांटा खाने वाला' ही बन जाएगा। संस्कृत और हिन्ंदी में सोचने वाला व्यक्ति स्वाभिमानी होगा। वह दूसरों को कष्ट नहीं देगा, पर स्वयं कष्ट सहेगा भी नहीं। इसके लिए वह कहेगा कि 'षठे षाठयम् समाचरेत' अर्थात दुष्ट के साथ दुष्टता का व्यवहार करो। आर्य समाज ने यही तो किया था कि सारे देश को एक साथ दुष्ट के साथ दुष्टता का व्यवहार करने के लिए जगा दिया, सबको एक साथ बता दिया कि अपनी भाषा क्या कहती है? उसके दर्द को सुनो और टूट पड़ो विदेशियों पर। आर्य समाज की इस पुकार को सारे देशवासियों ने सुना और अपना भरपूर समर्थन दिया। यही कारण था कि स्वतंत्रता आंदोलन में सबसे अधिक संख्या आर्य समाजियों की थी। अब यह आर्य अनुमान लगायें कि इन आर्य समाजियों का निर्माण संस्कृत व हिंदी ने किया या आर्य समाजियों ने अपनी भाषा संस्कृत और हिंदी को अपनाकर उनका सम्मान किया? कुछ भी हो एक बात तो स्पष्ट है कि अपनी भाषा का सम्मान करने से ही हमें स्वतंत्रता मिली। 'जय हिन्दी-जय हिन्दू रह्वाष्ट्र'।

राकेश कुमार आर्य ( 1580 )

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