आर्य समाज और हिन्दी भाषा

  • 2016-12-09 03:30:13.0
  • राकेश कुमार आर्य

आर्य समाज और हिन्दी भाषा

बात सन् 1925 की है। महर्षि दयानंद जी महाराज का जन्म शताब्दी समारोह मथुरा में बड़ी धूमधाम से मनाया गया था। उस समय तक आर्य समाज देश की एक ऐसी प्रमुख संस्था बन चुका था जो अपनी भाषा (संस्कृत-हिन्दी) में सोचता था, उसी में बोलता था और उसी में लिखता था। देश में हिंदी आंदोलन को बढ़ावा देने में इस संस्था का विशेष योगदान रहा। महर्षि दयानंद जी महाराज ने अपना अमर गं्रथ 'सत्यार्थप्रकाश' हिंदी में लिखकर हिंदी की अप्रतिम सेवा की थी। उनके सद्प्रयासों से तथा उनके पश्चात की आर्य समाज की पीढ़ी के अथक परिश्रम से देश के बहुत बड़े वर्ग ने अपनी भाषा के महत्व को समझना आरंभ कर दिया था। जिसके परिणामस्वरूप देश में गुरूकुलीय परंपरा पुन: विकसित होने लगी थी। भारतीय सांस्कृतिक राष्ट्रवाद बलवती हो रहा था और लोग अपनी भाषा, अपनी भूषा, अपने वेश और अपने गणवेश के प्रति समर्पित हो रहे थे। अपनी भाषा के प्रति सम्मान व्यक्त करना लोगों के लिए अपनी देशभक्ति के प्रदर्शन का एक माध्यम बन गया था।


महर्षि दयानंद के जन्मशती समारोह का कार्यकर्ता प्रधान महात्मा नारायण स्वामी जी को नियुक्त किया गया था। यह समारोह मथुरा शहर और मथुरा जंक्शन के मध्य स्थित डेम्पियर नगर नामक स्थान पर लगभग डेढ़ मील लंबे और एक मील चौड़े विशाल मैदान में रखा गया था। यज्ञ का प्रारंभ 15 फरवरी से रखा गया, इस दिन तक ही लगभग ढाई लाख लोग ऋषि को अपनी भावांजलि देने पहुंच गये थे। मुख्य व्याख्यान मंडप में लगभग 25000 श्रोताओं के एक साथ बैठने की व्यवस्था की गयी थी।

इस समारोह में आर्य सम्मेलन, आर्य विद्वत परिषद, कवि सम्मेलन आदि में देशभक्ति और अपनी भाषा के प्रति लोगों में असीम अनुराग का पुट स्पष्ट परिलक्षित होता था। 1875 ई. में अपने जन्मकाल से लेकर अब तक आर्य समाज ने निजभाषा की उन्नति के लिए तथा देश की स्वतंत्रता के लिए कितना कार्य किया है और भविष्य में उसकी कार्य योजना क्या है? यह सब भी इस समारोह में स्पष्ट दिखायी दे रहा था। आर्य कुमार सम्मेलन, दलितोद्वार सम्मेलन, शुद्घि कांफ्रेंस, आर्य स्वराज्य सम्मेलन इस समारोह की ऐसी झांकियां थी जो बता रही थीं कि देश अपनी भाषा को अपनाकर समग्रक्रांति की भावना को हृदय से अपना चुका था। 'आर्य स्वराज्य सम्मेलन' हिंदू महासभा के बड़े नेता राजा सर रामपालसिंह की अध्यक्षता में संपन्न हुआ था। शुद्घि सम्मेलन में तिरवा, सरनौ, शिवगढ़ और अमेठी राज के नरेशों ने भी भाग लिया था। 'दलितोद्वार सम्मेलन' महात्मा हंसराज जी की अध्यक्षता में और 'आर्यकुमार सम्मेलन' शाहपुराधीश श्री नाहर सिंह वर्मा की अध्यक्षता में संपन्न हुआ। 20 फरवरी को 'जात पांत तोडक़ सम्मेलन' बम्बई के डा. कल्याण दास देसाई के सभापतित्व में व 'महिला सम्मेलन' श्रीमती ठाकुर देवी की अध्यक्षता में संपन्न हुआ। सर्वत्र हिंदी का डंका बजता रहा। लोगों को अपनी भाषा के प्रयोग ने जगा दिया था और स्वराज्य, स्वदेश, स्वभाषा, स्वतंत्रता और स्वशासन की सर्वत्र चर्चा थी। यह तब और भी अधिक महत्वपूर्ण था जब कांग्रेस अभी तक भी विदेशी भाषा अंग्रेजी में सोच रही थी और अंग्रेजी को इस देश के लिए एक वरदान मान रही थी। वह 'स्वभाषा' हिंदी के उन्नयन के लिए ना तो एक ठोस नीति बना सकी थी और ना ही उसे अपनाने की स्थिति में थी उसे अंग्रेजी उर्दू का अनुराग सता रहा था और इन दोनों भाषाओं के तुष्टिकरण के खेल में कांग्रेस स्वदेशी भाषा का ध्यान रखना तक भूल गयी थी। यही कारण था कि कांग्रेसी मंचों पर उस समय तक अंग्रेजी के वक्ताओं की तूती बोलती थी। इस संगठन के अधिकांश लोग अंग्रेजों से पूर्ण स्वराज्य की मांग न करके 'डोमिनियन स्टेट्स' लेने की बात करते थे। वह अंग्रेजों और अंग्रेजी को इस देश के लिए एक वरदान मानते थे। उधर आर्य समाज का आंदोलन था जो अंग्रेजों और अंग्रेजी को इस देश के सर्वनाश का एकमात्र कारण मानता था और लार्ड मैकाले द्वारा स्थापित की गयी अंग्रेजी भाषा की शिक्षा प्रणाली को इस देश के लिए एक अभिशाप मानता था। आर्य समाज के इस चिंतन का ही परिणाम था कि देश में सर्वत्र 'गुरूकुलीय शिक्षा प्रणाली' के प्रति लोगों में पुन: चेतना आयी और सारा देश निजभाषा के संस्कारों को अपनाकर अंग्रेजों के विरूद्घ उठ खड़ा हुआ। कांग्रेस अंग्रेजों की चाटुकारिता करती रही और अपनी इस तुच्छ एवं राष्ट्रविरोधी नीति से देश का अहित करती रही, जबकि आर्य समाज संस्कृत और हिंदी का डंका लेकर सडक़ों पर उतर पड़ा। लोग उससे जुड़ते गये और कारवां बनता गया। उसी का परिणाम था कि 'महर्षि जन्म शताब्दी समारोह' में लाखों लोग एकत्र हो गये। इतने लोगों का एक साथ एक स्थान पर एकत्रित हो जाना उस समय की बड़ी घटना थी, क्योंकिकांग्रेस अभी तक ऐसा कोई सम्मेलन नहीं कर पायी थी-जिसमें एक साथ कई लाख लोग आ पाये हों। इसका कारण यही था कि देश के लोग कांग्रेस की तुष्टिकरण की नीति और अंग्रेजों के प्रति उसकी चाटुकारिता के भाव को देशघाती मानते थे, जबकि आर्य नेताओं के देशभक्ति पूर्ण विचार उन्हें कहीं अधिक प्रेरित करते थे।

स्वामी श्रद्घानंद एक ऐसे संन्यासी थे जो देश की नब्ज पर हाथ रखकर बोलते थे। उनके भीतर निजभाषा के प्रति और संस्कृत के संस्कारों के प्रति अनुराग पूर्ण भक्ति कूट-कूटकर भरी थी। वह अत्यंत स्वाभिमानी और उत्कृष्ट कोटि के राष्ट्रभक्त थे। महर्षि जन्म शताब्दी समारोह में उनके देशभक्ति पूर्ण व्याख्यान ने सभी को हृदय से प्रभावित किया था। हिंदू महासभा के नेता राजा सर रामपाल सिंह जैसे देशभक्तों की उपस्थिति भी इस सम्मेलन में स्वामी श्रद्घानंद के कारण ही संभव हुई थी, एक साथ एक मंच पर कई राजाओं का आना और देश के लिए व देश की भाषा के लिए उनके विद्वत्तापूर्ण व्याख्यानों का होना भी अपने आप में बड़ी बात थी। जिसे पूर्ण कराने में स्वामी श्रद्घानंद जी का बड़ा योगदान था।

इस महासम्मेलन में राव राजा तेजसिंह जी जोधपुर, स्वामी विश्वेश्वरानंद जी महाराज, स्वामी अच्युतानंद जी महाराज, पं. आर्यमुनि जी, रायसाहब हरविलास शारदा, लाला देवराज जी, लाला लक्ष्मणानंद जी, मा. अलखधारी जी (अम्बाला) म. गणेश प्रसाद जी (जलालपुर) लाला गंगाराम जी (लाहौर) जैसी अनेकों ऐसी विभूतियां भी उपस्थित रहीं थीं, जिन्होंने स्वदेश और स्वभाषा के लिए महर्षि दयानंद जी महाराज के साथ रहकर भी कार्य किया था। इस समारोह में धर्म सम्मेलन का सभापतित्व 'धर्म का मूलस्रोत' के लेखक पं. गंगा प्रसाद एम.ए. ने किया था। इस सम्मेलन में वैदिक धर्म, वैदिक दर्शनों में आत्मा, परमात्मा, सृष्टि उत्पत्ति सहित जैन धर्म के मूल सिद्घांत, बहाई धर्म का संदेश, ईसाइयत के उपदेश आदि पर भी ठोस चर्चा हुई और लोगों ने अपने-अपने निबंध पढ़े थे। अपनी भाषा के प्रति जब लोगों में भक्ति भावना जन्मती है और जब वह विदेशी भाषा में सोचना बोलना छोड़ देते हैं तभी वह किसी विदेशी धर्म की समीक्षा करने का साहस कर पाते हैं-यह धर्म सम्मेलन इसी बात का प्रमाण था। इसमें प्रस्तुत किये गये हिंदी के उत्कृष्ट लेखों ने हिंदी की अनुपम सेवा की और लोगों में उन हिंदी लेखों ने देशभक्ति का ज्वार उत्पन्न कर दिया।