आर्कबिशप की चिंता और भारत

  • 2018-06-30 10:00:00.0
  • राकेश कुमार आर्य

आर्कबिशप की चिंता और भारत

आर्कबिशप रोमन कैथोलिक दिल्ली के अनिल कुटो द्वारा पादरियों को एक पत्र लिखा गया है। जिसमें आर्कबिशप ने देश की वर्तमान राजनीतिक परिस्थितियों को अशांत और लोकतंत्र के लिए खतरा माना है। आर्कबिशप ने 2019 के लोकसभा चुनावों के लिए दुआ मांगने की बात भी उक्त पत्र में कही है। उनका आशय है कि 2019 में ऐसी सरकार भारत में बने जो उनकी फिर से 'दाल गलवा' सके और उनका 'भारत मिटाओ अभियान' फलीभूत हो सके। इसका अभिप्राय है कि आर्कबिशप 2019 में केंद्र में श्री नरेंद्र मोदी की सरकार को देखने के इच्छुक नहीं है।

पत्र में आर्कबिशप ने चिन्ता व्यक्त की है कि हम लोग इस समय भारत में अशांत राजनीतिक परिस्थितियों और परिवेश के साक्षी हैं। इस प्रकार की परिस्थितियों और परिवेश ने अपने देश के लोकतांत्रिक सिद्धांतों और देश की धर्मनिरपेक्ष पहचान के लिए खतरा उत्पन्न कर दिया है, राजनेताओं के लिए प्रार्थना करना हमारी पवित्र परंपरा है (कि भगवान नेताओं को सदबुद्धि दे और वह उनके 'भारत मिटाओ अभियान' में किसी प्रकार की बाधा उत्पन्न न करें)। आर्कबिशप का मानना है कि 2019 में देश में नई सरकार बनेगी, इसके लिए उन्होंने ईसाइयों को सलाह दी है कि वे भारत में नई सरकार बनाने के लिए प्रत्येक शुक्रवार को उपवास करें। जिससे कि देश में शांति, भाईचारा, लोकतंत्र, समानता और स्वतंत्रता बनी रहे।

देश में इस समय जो परिस्थितियां हैं वह सचमुच चिंताजनक हैं। पर हमारा आर्कबिशप से पूर्णत: 36 का आंकड़ा है। वह पूरब की ओर सोच रहे हैं तो हम उसके एकदम विपरीत दिशा में अर्थात पश्चिम दिशा में सोच रहे हैं। देश की इन राजनीतिक परिस्थितियों के लिए देश के राजनीतिक दल उत्तरदायी हैं। ये सारे के सारे देश की उन्नति के लिए और देश में शांति व भाईचारा की स्थापना के लिए संकल्पबद्ध न होकर अपने- अपने राजनीतिक हित साधने में लगे हैं। वास्तव में यह तो मुग़ल, फ्रांसीसी, डच, अंग्रेज आदि के ही अवतार हैं, और नाम बदलकर देश में 'फूट डालो और राज करो' की नीति पर कार्य कर रहे हैं। इनका उद्देश्य भी अपने पूर्ववर्तियों की भांति देश को लूटना ही है। इन्हें भारत से कोई लेना-देना नहीं है, भारत की संस्कृति से कोई लेना -देना नहीं है, ऐसे में इन राजनीतिक दलों को यदि 'तुर्कदल', 'मुगलदल', 'फ्रांसीसीदल', 'डचदल' और 'अंग्रेजदल' कहा जाए तो कोई अतिशयोक्ति नहीं होगी। इनके कार्यकर्ता इनके सैनिक हैं ,और पार्टी पदाधिकारी इनके छोटे-छोटे सिपहसालार हैं। यह अपने -अपने राज्य (राज्यों में सरकार) स्थापित करने की युक्तियों में लगे रहते हैं, जैसे ही कहीं दाव लगता है वैसे ही यह अपने शिकार पर टूट पड़ते हैं। तब यह आर्कबिशप और इनके चेले चपाटे भी सत्ता में भागीदारी मांगते हैं, मलाई मिलती रहे तो समझो देश की राजनीतिक परिस्थितियां बड़ी अच्छी हैं और मलाई ना मिले, भारत सावधान हो जाए या बैठकर अपने माल की रखवाली करने लगे तो यह कहते हैं कि देश के राजनीतिक हालात बड़े ही खतरनाक हैं, यहां पर लोकतंत्र खतरे में है। इनके लिए लोकतंत्र का अभिप्राय ही यह है कि भारत सोता रहे और यह उसके कलेजे को खाते रहें। यह इसी बात की प्रार्थना करते हैं कि भारत पर से भारतीयों का वर्चस्व समाप्त हो जाए और हमारी दाल आराम से गलने लगे।

सारी मुगल-तुगल पार्टियां धर्मनिरपेक्ष बनकर कहती हंै कि भारत सबका है- अर्थात् भारत को लूटने का अधिकार सबको समान है। इस लूट में भारत वाले चुप रहें। वह इस लूट के शिकार तो बनें पर भागीदार ना बनें। यदि ऐसी परिस्थितियां बनी रहती हैं तो इन लोगों को लगता है कि देश के राजनीतिक हालात बड़े अनुकूल है। कहने का अभिप्राय है कि इन्हें 'रोगी वेंटिलेटर' पर अचेत पड़ा हुआ ही अच्छा लगता है। इनकी राष्ट्रभक्ति भी यही है। यह नहीं चाहते कि कश्मीर में कश्मीरी पंडितों का पुनर्वास हो, या उनके पुनर्वास की कोई योजना सरकार बनाएं, या उन्हें अपना छूटा हुआ वतन पुन: दिलाया जाए। यदि सरकार ऐसा कोई उपाय खोजती है तो यह 'मुगल-तुगल दल' मिलकर कश्मीर के युवाओं को पत्थरबाज बना देते हैं। सरकार उन पत्थरबाजों से निपटती है,तो यह भारत की सेना को भी निर्मम कहने लगते हैं और सरकार की नीतियों को पक्षपाती तथा अन्याय पूर्ण कहकर उसकी आलोचना करते हैं। यह नहीं चाहते कि कश्मीर की क्यारियों से केसर की सुगंध आए- इसके विपरीत यह तो यही चाहते हैं कि कश्मीर की क्यारियां बारूद पैदा करती रहें और जहां से कभी वेदमंत्रों की गूंज हुआ करती थी उस कश्मीर में 'भारत तेरे टुकड़े होंगे' के राष्ट्र विरोधी नारे गूंजने लगे। इनकी अपेक्षा है कि सारा देश सोता रहे और ये डकैती मारते रहें।

वाट्सएप पर एक मित्र ने लिखकर भेजा है कि यदि कहीं भाजपा जीतती है तो उसकी खुशियां भाजपा के लोगों द्वारा ही मनाई जाती हैं, और यदि कांग्रेस जीतती है तो उसकी खुशियां भारत की सभी राजनीतिक पार्टियों समेत पाकिस्तान तक में भी मनाई जाती हैं। यह मजाक नहीं है अपितु वर्तमान का सच है, ऐसा क्यों है?- इस पर पूरी गंभीरता से चिंतन करने की आवश्यकता है कि क्यों इन 'मुगल-तुगल पार्टियों' को बाहरी शत्रु देशों का समर्थन मिल रहा है? क्या यह भारत में वही परिस्थितियां बनाए रखने के षडय़ंत्र के भागीदार नहीं है- जिनके चलते देश में मौलिक धर्म को, मौलिक चिंतन को, मौलिक संस्कृति को और मौलिक स्वरूप को मिटाने की खुली गतिविधियां चलती रहीं और लोग देश के विभिन्न अंचलों में अपने-अपने विदेशी मजहबों को फैलाने का काम करते रहे हैं? तब देश में ठेके छोड़े जा रहे थे कि यह प्रांत तुझे दिया तू खुलकर खेल और अपना मजहब यहां फैला। बस, इतना ध्यान रखना कि इस उपकार के बदले में अपने चेले-चपाटों के वोट हमें दिला देना। वास्तव में देश में लोकतंत्र को खतरा इस प्रकार की प्रवृत्ति और गुप्त षड्यंत्रों से झलकने वाली इस सौदेबाजी से ही रहा है और आज भी है।

'भारत मिटाओं' का घातक षड्यंत्र एक वायरस की भांति देश के सत्ता प्रतिष्ठानों में ही नहीं अन्य क्षेत्रों में भी फैलता गया। सरकारी कार्यालयों में गीता के स्थान पर बाइबल की बातें करना धर्मनिरपेक्षता मान ली गई, न्यायालय में ऐसे लोगों को स्थापित करने का प्रयास किया गया जो भारत को न समझ कर भारत को उल्टा समझाने का काम कर सकें, और प्रगतिशीलता व आधुनिकता के नाम पर भारत को उजाड़ सकें। जहां भारत जीवित था- वहां उसे बलात चुप रहने के लिए विवश किया गया, और जहां वह चुप था वहां उसकी छाती पर उगे झाड़-झंखाड़ को ही धर्मनिरपेक्ष भारत कहा जाने लगा। जब झाड़ झंखाड़ गहराये तो उन्होंने 'भारत' को वहां से भगाना आरंभ कर दिया, जिससे यह कहकर परिभाषित किया गया कि यह 'भारत' किसी के साथ मिलकर रहने में विश्वास नहीं करता। आज भारत में थोड़ा सा कहीं परिवर्तन आ गया है कि वह कहीं-कहीं खुलकर सांस ले रहा है और भागने या स्थान छोडऩे से मना कर रहा है, तो इससे भारत की राजनीतिक परिस्थितियां लोकतंत्र के लिए खतरा पैदा करने वाली कहीं जा रही हैं।

2019 में भारत को फिर सावधानी बरतनी होगी। 2019 में भारत उसी को दिया जाए जो भारत के लिए काम करें, और शपथ पत्र दे कि वह भारत में 'लूट धर्म' को नहीं अपितु छूट (मुक्ति: सबको साथ लेकर चलने की भावना) धर्म का विस्तार करेगा। याद रहे किहमें भारत चाहिए, उसके लिए काम करने वाला चाहिए।

राकेश कुमार आर्य ( 1596 )

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