ऐसे होगी गाय की रक्षा

  • 2016-07-16 02:30:53.0
  • राकेश कुमार आर्य

ऐसे होगी गाय की रक्षा

द्रोपदी का चीर हरण हो रहा है और भीष्म पितामह व गुरू द्रोण जैसे लोग नीची दृष्टि किये बैठे हैं। यह मुखमुद्रा निश्चित रूप से महाभारत के सजने वाले साज की ओर हमारा ध्यान आकृष्ट कर रही है।

गाय का मौन 'धर्मक्षेत्रे कुरूक्षेत्रे' की ओर हमें धकेल रहा है। नेतागण इस मौन के चीत्कार को सुनकर भी अनसुना कर रहे हैं।द्रोपदी का चीर हरण हो रहा है और भीष्म पितामह व गुरू द्रोण जैसे लोग नीची दृष्टि किये बैठे हैं। यह मुखमुद्रा निश्चित रूप से महाभारत के सजने वाले साज की ओर हमारा ध्यान आकृष्ट

कर रही है।

गाय का मौन 'धर्मक्षेत्रे कुरूक्षेत्रे' की ओर हमें धकेल रहा है। नेतागण इस मौन के चीत्कार को सुनकर भी अनसुना कर रहे हैं। इन्हें नही पता कि जो लोग मां, के दूध का अपमान करते हैं वे नीच और अधर्मी होते हैं। इन्हें यह भी नही पता कि- इटली के प्रसिद्घ वैज्ञानिक प्रो. जी.ई. ब्रिगेड के अनुसार-

''गाय के ताजा गोबर में तपेदिक और मलेरिया के कीटाणु मारने की क्षमता होती है। इसलिए गाय अधिक पालना मानव जीवन के लिए उपयोगी है।

''

गाय के सांस और रंभाने से निकलने वाली हवा से बहुत से रोगों के कीटाणु मर जाते हैं। 'पंचगव्य चिकित्सा प्रणाली' से कैंसर, किडनी रोग, एड्स, हृदयाघात से लेकर मधुमेह, सांप जहर, तपेदिक, सफेद दाग, अन्य चर्मरोग, पित्त विकार, दंत रोग, पेट के कीड़े, खुजली, आलस्य व अरूचि, गठिया, पीलिया, कफ व खांसी, क्षयरोग तथा मलेरिया सहित कई रोगों से लडऩे की औषधियां खोज निकाली गयी हैं। गाय का गोबर रासायनिक खादों से विषैली होती फसलों को बचाने के लिए एक प्रभावी विकल्प के रूप में सामने आया है। अत: यही कारण था कि हमारे पूर्वज गाय को माता के रूप में सम्मान देते थे

, और यही कारण है कि इस बहु-उपयोगी पशु को संसार के हर महामानव ने पूजनीय और वंदनीय माना है।

राजनीतिक इच्छाशक्ति से हीन भारत की सरकारें और नेतागण महामानवों की वाणियों को सुनकर उनके अनुसार मानव समाज का निर्माण करने को प्राथमिकता न देकर स्वार्थमयी राजनीति कर रहे हैं। इसलिए मानवता अंधकारमयी भविष्य की ओर बढ़ रही है। आज राष्ट्रहित गौण हो गया है।

अभी पिछले दिनों छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री डा. रमणसिंह द्वारा गाय के वध पर रोक लगाने का कानून बनाकर इस दिशा में देश के भीतर उत्तम निर्णय लिया गया है, जो प्रशंसनीय कार्य है तथा अंधकार में एक प्रकाश की किरण के समान है। अच्छा होगा कि इसका अनुकरण देश के अन्य राज्य भी करें।

हमारे सभी देशवासी साम्प्रदायिक पूर्वाग्रहों से ऊपर उठकर राष्ट्रहित, मानवहित और प्राणिमात्र के हित में सोचें, यही मानव धर्म है। इस धर्म से विमुख होना संसार के सभी झगड़ों और विवादों को अपने यहां आमंत्रित करना है। गाय जैसे बहु-उपयोगी पशु को राजनीति का केन्द्र बनाना तो अति निंदनीय है। साम्प्रदायिक पूवाग्रहों से नही अपितु उपयोगिता के दृष्टिकोण से हमें गाय का मूल्यांकन करना ही चाहिए।

अभी पिछले दिनों गाय के मूत्र में सोना होने का समाचार समाचार पत्रों में छाया रहा था। विदेशी लोग और वैज्ञानिक भारत के सांस्कृति मूल्यों को लेकर सदा से जिज्ञासु रहे हैं। हमारे पूर्वजों ने सदियों नही अपितु युगों पूर्व जिन सांस्कृति मूल्यों की स्थापना कर उन्हें हमारे लिए अनिवार्य रूप से स्वीकार करना घोषित किया था, उन्हें विदेशी विद्वान और वैज्ञानिक उलट-पुलट कर देखने का प्रयास करते हैं। उन्हें तब घोर आश्चर्य होता है

, जब हमारे पूर्वजों की मान्यताएं उन्हें पूर्णत: वैज्ञानिक सिद्घ होती दिखाई देने लगती हैं। गाय के मूत्र में सोना होने की बात सिद्घ हुई तो इससे हमारे पूर्वजों की युगों पूर्व स्थापित की गयी यह मान्यता भी स्वत: सिद्घ हो गयी कि गाय के पेट में सवा किलो सोना होता है। गाय के पेट में सवा किलो सोना होना-हमारा एक सांस्कृतिक मूल्य है। जिसे वैज्ञानिकों ने परीक्षित कर अब पूर्णत: वैज्ञानिक मान लिया है। इसलिए भारत की संस्कृति और भारत का धर्म वैज्ञानिक सिद्घ होते हैं।

गाय की उपयोगिता को सर्वप्रथम महर्षि दयानंद ने समझा था। उन्होंने अपने समय में देशवासियों से गाय की रक्षा करने के लिए 'गोकरूणानिधि' नामक पुस्तक लिखी। इस पुस्तक के माध्यम से उन्होंने गाय के प्रति मनुष्य धर्म की बड़ी सटीक, वैज्ञानिक और तार्किक व्याख्या की। महर्षि दयानंद ने भारतवासियों को गाय के प्रति तो जागरूक किया ही साथ ही उन्होंने तत्कालीन ब्रिटिश सत्ताधीशों और ब्रिटेन की रानी तक को भी पत्र लिखकर यह समझाने का प्रयत्न किया था कि गौ रक्षा से ही विश्वशांति आ सकती है

, और मनुष्य का सर्वांगीण विकास हो पाना संभव है। उनकी बात को ब्रिटिश सत्ताधीशों ने चाहे अनसुना कर दिया हो-परंतु देशवासियों ने महर्षि की बात को स्वीकार करते हुए गौरक्षा पर विशेष अभियान चलाया।

हम आज गौरक्षा के संदर्भ में महर्षि दयानंद की नीति को न अपनाकर कुछ दूसरे रास्ते पर जा रहे हैं। महर्षि दयानंद जहां जनजागरण के साथ-साथ राजनीतिज्ञों को भी गौरक्षा के लिए झकझोरते थे, वहीं आज हम गौरक्षा के कार्य को केवल राजनीतिज्ञों के भरोसे छोड़ देना चाहते हैं। हमारे देशवासी यह मानते हैं कि गौरक्षा का कार्य सरकार करे-यह सोच सर्वथा त्याज्य है। हमें जनजागरण करना होगा। इसके लिए हमारे संतों और धार्मिक उपदेशकों को अपने प्रभाव का प्रयोग करना चाहिए। एक अनुमान के अनुसार हमारे जितने भी धार्मिक नेता इस समय हैं उनमें से प्रमुख चार

, पांच संतों के ही करोड़ों अनुयायी अथवा शिष्य हैं। यदि ये संत लोग अपने अनुयायियों या शिष्यों को इस बात के लिए प्रेरित करें कि उनमें से प्रत्येक को एक गाय अवश्य पालनी है-तो समस्या का समाधान हो सकता है। देश की बड़ी जनसंख्या ऐसी है जो अपने गुरूओं के कहने पर उनके अनुसार कार्य करने लगती है। यदि ऐसी जनसंख्या को तीस करोड़ भी मान लिया जाए तो आज गली मोहल्लों या खेत क्यारों में आवारा घूमती गायों को पकड़-पकडक़र लोग पालने के लिए ले जाएंगे। तब न तो गौशालाओं की आवश्यकता होगी और गौमाता लोगों को बोझ नजर आएगी। इस प्रकार गाय की रक्षा का ये एक व्यावहारिक ढंग हो सकता है।

(लेखक की पुस्तक 'वर्तमान भारत में भयानक राजनीतिक षडयंत्र : दोषी कौन?' से)

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राकेश कुमार आर्य ( 1580 )

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