वयस्क मताधिकार....भाग-2

  • 2016-09-15 04:15:14.0
  • राकेश कुमार आर्य

वयस्क मताधिकार....भाग-2

वेद ने ऐसा नही कहा कि सभासद तुझे चुनें, अपितु ये कहा है कि 'प्रजाएं तुझे चुनें' वेद ने यह भी कहा-'सर्वास्त्वा राजन प्रदिशो हृयन्तु'-सारी प्रदिशाएं हे राजन! तुझे चाहें, अर्थात तू लोकप्रिय भी हो। लोग तुझे चाहते हों।
हमने अपनी इस संस्कृति के आधार को एक ओर छोडक़र अपने स्वार्थवश 'सिरों की गिनती' का लोकतंत्र चुन लिया। ये ऐसा लोकतंत्र है जिसमें प्रधानमंत्री को लोग चाहे पसंद करें, चाहे न करें, बस उनके साथ लोकसभा में गिनती के इतने सिर (272 सांसदों का जादुई आंकड़ा) होने चाहिएं कि जो उसके समर्थन में सदा उसके साथ रहें।

इस लोकतंत्र का आधार हमने वयस्क मताधिकार को बनाया। संविधान के द्वारा हमने एक साथ देश के सारे वयस्कों को लोकतंत्र की गाड़ी को चलाने के लिए मताधिकार प्रदान कर दिया। उन्हें कह दिया गया कि तुम सभ्य समाज के निर्माण के लिए सभा, सभ्य , सभासद और राजा का चयन करो। ऐसे लोग जो भारत में आज तक सभा, सभ्य और सभासद की परिभाषा और उसके शाब्दिक अर्थ तक को नही जानते एवं जिन्हें अपने इस गुरूतर दायित्व के निर्वहन का भी अर्थ ज्ञात न हो, उन्हें यह अधिकार सौंप दिया गया कि तुम राजा चुनो, सभा, सभ्य और सभासदों का निर्माण और चयन करो।

मताधिकार की इस प्रक्रिया को बहुत भारी उपकार दिखाते हुए हम पर नेताओं ने एक षडय़ंत्र के साथ लाद दिया है। धीरे-धीरे इसके खेल से पढ़ा-लिखा और संवेदनशील व्यक्ति दूर होता गया। मताधिकार का उपयोग वही लोग करने लगे जिन्हें उनका वास्तविक अर्थ ज्ञात नही था। जिन्हें अर्थ ज्ञात था उन्होंने मताधिकार में सम्मिलित होने वाले मतों को हथियाना (बूथ कैप्चरिंग) आरंभ कर दिया।

आज स्थिति यह है कि लोकतंत्र मूर्खों के द्वारा मूर्खों के लिए मूर्खों का शासन बनकर रह गया है। जो लोग जाति, धर्म और भाषा के नाम पर आराम से बहकाये जा सकते हैं वे लोग मताधिकार में भाग ले रहे हैं, ऐसे ही लोग लोकसदनों की शोभा बढ़ा रहे हैं। अत: हमारे लोकसदन (विधान सभाएं और लोकसभा) आज ऐसे लोगों की कर्मस्थली बन गये हैं जो जाति, धर्म, भाषा और क्षेत्रवाद की संकीर्ण राजनीति करते हैं, या अपने स्वार्थों को साधने में लगे हुए हैं। इनमें इनका दोष नही है, इन्हें भेजा ही वहां इसलिए जाता है कि ये जनता के लिए ऐसी बातें लोकसदनों में बैठकर करें। दोष जनता का भी नही है क्योंकि राष्ट्र की समस्याओं को उसे बताकर वोट नही मांगे जाते अपितु उसकी भावनाएं भडक़ाकर वोट मांगे जाते हैं। निष्कर्ष यह है कि ये दोनों ही मूर्ख हैं, असभ्य हैं, जो सभा के योग्य नही है, क्योंकि किसी के भी आचरण से दूर-दूर तक लोककल्याण नही झलकता।

हमने अपने देश में लोकतंत्र के इस स्वरूप पर यदि शीघ्र प्रतिबंध न लगाया तो परिणाम बड़े ही भयंकर होंगे। हमें यथाशीघ्र ऐसे कदम उठाने होंगे कि लोकतंत्र भी लोकतंत्र बने और हमारी सभाएं भी सभा की गरिमा के अनुरूप अपना आचरण प्रकट करने लगें। इसके लिए हमें अपने देश में मताधिकार को या तो सीमित करना होगा या फिर उसे वर्गीकृत करना होगा। सीमित से हमारा तात्पर्य है कि मताधिकार उन्हीं लोगों को मिले जो राष्ट्र की समस्याओं, राज्यप्रणाली और अपने राजनीतिज्ञों के आचरण से भली प्रकार अवगत हों। समानता के नाम पर चलने वाले वयस्क मताधिकार के षडय़ंत्रपूर्ण नाटक का यथाशीघ्र पटाक्षेप हो जाना चाहिए।

यदि नौकरियों में समानता नही है, वहां शिक्षा, योग्यता को आधार बनाया गया है तो मताधिकार जैसे महत्वपूर्ण दायित्व के निर्वाह में समानता क्यों? हम आर्थिक आधार पर तो समानता दे नही सके परंतु मताधिकार में समानता देकर जनता को प्रसन्न कर दिया आखिर क्यों? -सिर्फ अपना उल्लू सीधा करने के लिए। जो लोग राष्ट्र की समस्याओं और अपनी राजप्रणाली को चलाने वालों के आचरण से भी अवगत नही हैं, उनसे कह दिया जाता है कि हमने लोकसभा भंग करा दी, क्योंकि कुछ लोग समाज में किसी दलित को ऊंचे पद पर देखना नही चाहते, इसलिए अब आप वोट दें और हमें जिताएं। फिर ये बेचारे वोट डालते हैं, दलित के नाम पर, पिछड़ों के नाम पर, जाति के नाम पर आदि-आदि। हमारा सुझाव है कि राजनीतिक चेतना शक्ति से हीन व्यक्ति को मताधिकार से अलग कर दिया जाए। फिर जिन लोगों को यह अधिकार दिया जाए उनके लिए इसका प्रयोग अनिवार्य कर दिया जाए। वर्गीकृत मताधिकार से हमारा तात्पर्य है कि शिक्षा और योग्यता के आधार पर हम मतों का मूल्य निर्धारित करें। यथा हाईस्कूल तक की शिक्षा प्राप्त व्यक्ति के मत का मूल्य दो, इंटरमीडिएट तक की शिक्षा प्राप्त व्यक्ति के मत का मूल्य तीन और इसी प्रकार उच्च शिक्षा प्राप्त व्यक्ति के मत का मूल्य इससे अधिक रखा जाए। अशिक्षितों के मत का मूल्य एक रखा जा सकता है। इससे राष्ट्र चिंतन की हमारी प्रवृत्ति बढ़ेगी, हमारे राष्ट्रनायकों को अपने आपको सुधारने के लिए विवश होना पड़ेगा, अशिक्षितों के मतों को कैश करने के लिए जाति, धर्म, अगड़े-पिछड़े की राजनीति पर अंकुश लगेगा और किसी वर्ग विशेष की राजनीति करने की प्रवृत्ति धराशायी हो जाएगी, इससे सामाजिक समानता लाने में सहायता मिलेगी।

वर्तमान भारतीय समाज में राजनीति के प्रति जनता में एक नैराश्य भाव है। अपवादों को छोडक़र अपने देश के राजनीतिज्ञों और राजनीति से लोगों का विश्वास उठ चुका है। नैराश्य की यह भावना किसी भी राष्ट्र के लिए अच्छी नही मानी जा सकती। इसके परिष्कार के लिए हमें समय रहते कार्य करना होगा। हमें जनता में राजनैतिक चेतना पहले प्रसारित करनी थी, बाद में मताधिकार देकर उसकी राजनीतिक चेतना शक्ति का लाभ उठाना चाहिए था। जबकि हमने अचेतन जनता से राजनैतिक लाभ उठाना आरंभ कर दिया। इसे वर्तमान देश के लिए 'एक भयानक राजनैतिक षडय़ंत्र' ही मानना चाहिए। क्योंकि इसके दुरूपयोग के फलस्वरूप राष्ट्र आज समस्याओं की विभीषिका में जा फंसा है। वयस्क मताधिकार की प्रणाली पर पुनर्विचार कर तथा उसे भारतीय संदर्भों में सही रूप में ढालकर हम इन समस्याओं की विभीषिका पर नियंत्रण पा सकते हैं।
(लेखक की पुस्तक 'वर्तमान भारत में भयानक राजनीतिक षडय़ंत्र : दोषी कौन?' से)