वयस्क मताधिकार और भारत की समस्याएं

  • 2016-09-14 08:00:46.0
  • राकेश कुमार आर्य

वयस्क मताधिकार और भारत की समस्याएं

भारत में प्रचलित कई गलत व्याख्याओं ने हमें भ्रमजाल में फंसा दिया है। देश की सत्ता पुन: इन गलत व्याख्याओं के जनकों और प्रतिपादकों के हाथों में आ गयी है। हमारे देश में जितनी सभाएं हैं-उन सबमें सर्वोत्तम सभा लोकसभा है। यह हमारे देश की संसद का निम्न सदन है। जिसके सदस्यों का निर्वाचन देश की जनता के द्वारा सीधे-सीधे किया जाता है। राज्यों की विधानसभाओं और लोकसभा का निर्वाचन वयस्क मताधिकार के आधार पर किया जाता है, जिसकी व्यवस्था हमारा वर्तमान संविधान करता है। ये चुने हुए विधायक और सांसद हमारे मुख्यमंत्रियों और प्रधानमंत्री का चयन करते हैं।


अब प्रश्न है कि सभा, सभासद (विधायक और सांसद) और राजा (प्रधानमंत्री) के प्रति हमारा प्राचीन वैदिक दृष्टिकोण क्या है? इनका चयन कैसे हो और उनके कत्र्तव्य क्या हों?
वैदिक सभा
सभा का अर्थ है-प्रकाशयुक्त, आभासहित। जिसकी एक आभा हो, जो ज्ञानपूर्वक और ज्ञानरक्षक कार्य करती हो वह सभा है। इस ऐसी आभायुक्त ज्ञानपूर्वक और ज्ञानरक्षक कार्य करने वाली संस्था के योग्य व्यक्ति को 'सभ्य' कहा जाता है-अर्थात जो सभा के योग्य है वही 'सभ्य' है। इस सभ्य के चाल-चलन को सभ्यता कहा जाता है। जो सभा 'ज्ञानपूर्वक' और 'ज्ञानरक्षक' कार्य न कर सके वह सभा कोई सभा नही होती। ज्ञानपूर्वक और ज्ञानरक्षक के ये दोनों विशेषण सभा का उद्देश्य स्पष्ट कर रहे हैं कि सभा का एकमात्र उद्देश्य जनहितकारी कार्यों का निष्पादन, संपादन और नियमन करना है।
हमारी भगवान से वैदिक प्रार्थना होती है कि-
'हों सभासद इस सभा के सब के सब धर्मात्मा।'
हमारे सभासद कत्र्तव्यभ्रष्ट, धर्मभ्रष्ट और पथभ्रष्ट, (धर्मनिरपेक्ष) न हों, अपितु धर्मात्मा हों, ऐसे धर्मात्मा जो न्यायकारी हों, जनहित में कार्य करने वाले, ज्ञानी, परोपकारी और जनसेवी हों। अपने इस धर्म को मानने वाले हों, समझने वाले हों और जानने वाले हों।
देखिये वेद में कहा गया है कि-
'जो कोई तेरे सभासद हों, वह मेरे लिए बोलने वाले हों'
अर्थात अपने क्षेत्र की बात को सभा में उठाकर राजा का ध्यान इस ओर दिलाने वाले हों। यदि सभासद सभा में अपने क्षेत्र की जनता की समस्याओं को उठाने में असमर्थ रहा, अथवा किसी भी कारण से असमर्थ रहा तो वह सभासद सभा के योग्य नही है, अपितु असभ्य है।

अत: हमारे यहां प्राचीन काल में सभासद भी यह कहता था-
'चारू वदानि पितर: संगतेषु' (अथर्ववेद 6-12-1)
अर्थात हे पूज्य पितरो सभाओं से मैं सुंदर बोलूं। मानो हमारा सभासद कह रहा है कि मैं सभा में जाकर ऐसा न बोलूं, जैसे-
-वंदेमातरम् नही गाऊंगा,
-आतंकवाद और आतंकवादी गतिविधियों में संलिप्त लोगों को राष्ट्रद्रोही नही माना जा सकता।

ऐसी असंगत बातें, जिन्हें हमारे सभाध्यक्ष (स्पीकर) को कार्यवाही से निकालना पड़े या ऐसा भारी शोरगुल जिससे कार्यवाही में व्यवधान पड़े हमारे सभासदों को असभ्य बनाना है। अत: असभ्यता से बचने के लिए हमारा सभासद कह रहा है कि 'मैं सुंदर बोलूं। मेरा बोलना मीठा हो, मधुर हो, और प्राणिमात्र का हित चिंतक हो।'

जिनका आचरण ऐसा नही हो सकता, महाराजा मनु ने उनके लिए निषिद्घ करते हुए कहा-'सभां न प्रवेष्टव्यं' वे सभा में जायें ही नही। अब आते हैं राजा पर, कि राजा कैसा हो? इसके लिए वेद में कहा गया है कि-
'अयमस्तु धनपतिर्धनानामयं विशां विश्वपतिरस्तुराजा' (अथर्ववेद 4-22-3)

अर्थात यह राजा धनियों का धनी हो और प्रजाओं का स्वामी हो। राजा धनेश्वर, ज्ञानी, तेजस्वी, ओजस्वी, बली, विविध सदगुण संपन्न, प्रजा प्रेमी और प्रजा को प्रसन्न रखने वाला हो।
इन गुणों से हीन व्यक्ति राजा नही हो सकता। व्यभिचारी, अत्याचारी, प्रजापीडक़ और प्रजा के अधिकारों का दलन और दमन करने वाला राजा कभी भी राजा नही हो सकता, अपितु तानाशाह है,डिक्टेटर है, अधिनायक है।

ऐसे दुष्ट और अनाचारी राजा को उखाड़ फेंकने का अधिकार भारत में प्राचीनकाल से ही प्रजा के पास सुरक्षित रहा है। यदि ऐसा न होता तो आचार्य चाणक्य नंदवंश के समूलोच्छेदन का प्रण कदापि न लेते और न ही उस समय की प्रजा उनके इस कार्य का समर्थन करती, इसके उल्टे हमने अपने सभासदों को धृतराष्ट्र की सभा में मौन रहते और जनता के अधिकारों का दमन दुर्योधन के द्वारा होते देखा है। उसका परिणाम क्या हुआ था? यह भी सारी दुनिया जानती है।

आज के सभ्य संसार में 'धृतराष्ट्रों' की सभा में कितने सभासद हैं? कितने 'दुर्योधन' जनहितों से खिलवाड़ कर रहे हैं? यह आज सचमुच विचारणीय हो गया है। यदि स्थिति पर विचार किया जाए तो वास्तविकता को देखकर रोंगटे खड़े हो जाते हैं क्योंकि जनहित के नाम पर जनहित की ही उपेक्षा करना आज के शासकों की प्रकृति में सम्मिलित हो गया है।

इस स्थिति का परिणाम क्या होगा? निस्संदेह पिछले दोनों महायुद्घों से भी अधिक भयंकर। ऐसी स्थिति के लिए दोषी वह व्यवस्था है, जिसमें 'राजा' का चयन किया जाता है। भारत के संदर्भ में कहें तो यहां राजा अर्थात प्रधानमंत्री का चयन पूरे देश की जनता नही करती। यदि लोकसभा में बहुमत दल का नेता ही हमारा प्रधानमंत्री है तो फिर उसके साथ उतना बहुमत भी नही होता जितना कि राष्ट्रपति (क्योंकि उन्हें राज्य विधानसभाओं के सदस्य और संसद के निर्वाचित सदस्य चुनते हैं) के साथ होता है।
यदि इसी प्रणाली को नेता की उत्कृष्टता का आधार माना जाता है तो फिर तो राष्ट्रपति को ही शक्ति संपन्न होना चाहिए। किंतु व्यवहार में उन्हें 'रबर-स्टांप' माना जाता है और जिस व्यक्ति के साथ केवल लोकसभा (विधानसभाओं के सदस्यों का नही) के कसदस्यों का विश्वास प्राप्त है उसे शक्ति संपन्न माना जाता है। राष्ट्र से बाहर उसकी आवाज को राष्ट्र की आवाज माना जाता है।

यह परंपरा एक सिरे से ही गलत है। हमारी मान्यता है कि प्रधानमंत्री को लोकसभा में नही अपितु लोक में जनमत का बहुमत प्राप्त होना चाहिए। वह लोकप्रिय होना चाहिए। लोग उसके नाम पर अपना मत प्रदान करें। तब भारत मंं बने कितने ही राजनीतिक दलों की समाप्ति स्वयंमेव होना संभव है। वेद कहता है-'त्वां विशो कृणतां राज्याय' (अथर्ववेद 3-4-2) अर्थात राज्यकर्म के लिए प्रजाएं तुझे चुनें।
(लेखक की पुस्तक 'वर्तमान भारत में भयानक राजनीतिक षडय़ंत्र : दोषी कौन?' से)

राकेश कुमार आर्य ( 1580 )

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