विश्वगुरू के रूप में भारत-33

  • 2017-09-22 05:45:37.0
  • राकेश कुमार आर्य

विश्वगुरू के रूप में भारत-33

राजा और राजनीति को भारत में ईश्वर की न्याय-व्यवस्था को सुचारू रूप से जारी रखने के लिए स्थापित किया गया। अत: राजा और राजनीति का धर्म यह बताया गया कि तुम ऐसी राज्य व्यवस्था बनाओ जिससे लोगों में 'पाप' के प्रति घृणा और पुण्य के प्रति लगाव या आकर्षण उत्पन्न हो और वे स्वाभाविक रूप से सत्कर्म करने वाले बने रहें। इसीलिए ईश्वर के पश्चात राजा और राजनीति को मनुष्य मनुष्य के बीच विवादों की स्थिति में न्याय करने का दायित्व भी दिया गया। इसके लिए राजा को विधि बनाने और विधि का उल्लंघन करने वाले व्यक्ति को दंडित करने का विशेष अधिकार प्रदान किया गया। जिससे ईश्वरीय न्याय व्यवस्था साफ-सुथरी बनी रहे और लोग पापमयी वृत्तियों से स्वयं को दूर रखें। यही कारण है कि वैदिक संस्कृति में राजा को ईश्वर का प्रतिनिधि माना गया है।
इससे भी महत्वपूर्ण बात ये है कि भारतीय राज्य व्यवस्था में राजा से अपेक्षा की गयी है कि वह वैदिक विद्वान, न्यायप्रिय और पक्षपात शून्य होगा। वह न्याय करते समय अपने-पराये का ध्यान नहीं रखेगा, अपितु विधिक प्रावधानों के अंतर्गत न्याय के नैसर्गिक सिद्घांतों का पालन करते हुए वह वास्तविक दोषी का पता लगाएगा और उसके विधि विरूद्घ कार्य के अनुसार उचित अनुपात में उसे दण्ड देगा। राजा के विषय में भी यह स्पष्ट किया गया कि यदि राजा मूर्ख है, पक्षपाती और अन्यायी है-तो ऐसे राजा को अंत में गलना पड़ेगा। यह कहावत गांवों में आजकल भी है कि जो पंच न्याय में पक्षपात करता है-वह गलता है। गलने का अभिप्राय है कि वह मोक्षमार्ग पर चल नहीं पाएगा, अपितु बीच में ही फिसल जाएगा। इसके लिए लोगों ने युधिष्ठिर और उनके भाइयों का उदाहरण ध्यान रखने के लिए बना लिया कि कैसे उनके भाई और पत्नी स्वर्ग जाते समय मार्ग में ही फिसलते गये? अंत में धर्मराज युधिष्ठिर ही स्वर्ग पहुंच पाए। ये उदाहरण भारत में राजा और राजनीति का राजधर्म निश्चित करने के लिए बनाये गये कि सावधान रहना अन्यथा भयंकर दु:खदायी फल भोगना पड़ेगा। इससे राजा लोग वास्तव में सावधान व सचेत रहे।
हमारे अधिकांश राजा अपने राजधर्म को निभाने में और न्यायप्रिय बने रहने में अपने कर्मों का और कार्यों का सदा निरीक्षण, समीक्षण व परीक्षण करते रहे। ऐसे न्यायप्रिय शासकों के होने से प्रजा को कोई कष्ट नहीं होता था। इसलिए प्रजा भी यह कहने लगी थी-''कोऊ नृप होई हमें का हानि''-अर्थात राजा कोई भी बने हमें तो कोई हानि होनी नहीं है, हमें तो न्याय हर स्थिति में मिलेगा। यह था -वास्तविक लोकतंत्र। आजकल तो एक पार्टी की सरकार जाए तो उसके समर्थक रोने लगते हैं कि अब जो राजा आएगा वह हमसे पक्षपात करेगा। सिद्घ हुआ कि आज का राजा और राजनीति लोगों में विभेद उत्पन्न करती है और विखण्डनवाद उसका राजधर्म हो गया है। यही कारण है कि आजकल लोगों का राजा, राजनीति और उनके राजधर्म से विश्वास भंग हो गया है। आज का 'राजा' प्रात:काल से सायंकाल तक कभी चर्च में तो कभी गुरूद्वारे में और कभी मंदिर में तो कभी मस्जिद में टोपियां बदलता घूमता है और वह स्वयं साम्प्रदायिक सोच रखता है, पर उसकी राजनीति कहती है कि तुुझे पंथनिरपेक्ष रहना है।
इस दोहरी मानसिकता का परिणाम ये हुआ है कि आज का 'राजधर्म' किस रंग का है-यह समझ ही नहीं आता। प्रात:काल से सायंकाल हमारे जनप्रतिनिधि गिरगिट की भांति रंग बदलते रहते हैं। संसार के अन्य देशों के राजा और उनकी राजनीति ने भारतीय राजधर्म पर पड़े कर्मफलसिद्घांत के प्रभाव को कभी नहीं समझा और ना ही वे समझ सकते थे क्योंकि उनको कर्मफल-व्यवस्था की व्यापक जानकारी कभी नहीं रही। उन्होंने इसके बारे में कभी कुछ सीखा या समझा नहीं। यहां तक कि आज भी भारत का एक 15 वर्षीय संस्कारशील हिंदू बच्चा या किशोर जितना कर्मफल व्यवस्था के विषय में जानता है उतना पश्चिमी देशों का 80 वर्ष का वृद्घ भी नहीं जानता।
हमारे देश के लोग अपने दु:खों को आज भी किसी 'किये का फल' मानते हैं, और उसे धैर्य से भोगते हैं। ऐसा इसलिए होता है कि भारत में कर्मफल को हर स्थिति में भोगना ही पड़ेगा-ऐसी दृढ़ मान्यता है। जिसे एक संस्कार के रूप में हमारे भीतर बचपन से ही स्थापित कर दिया जाता है।
कई लोग तो ये कहते भी मिल जाते हैं कि अच्छा हो ये दु:ख यहीं भोग लिये जाएं-आगे के लिए समस्या समाप्त हो जाएगी। इसके विपरीत पश्चिमी देशों में लोग अपने कष्टों के लिए अन्य लोगों को दोष देते फिरते हैं। यही कारण है कि भारत के समाज में आज भी शान्ति है, प्रेम है, प्रीत है। जबकि पश्चिमी देशों में ऐसा नहीं है। आज भारत के जिन लोगों ने पश्चिमी संस्कृति को 'अपना हीरा' बेचकर उससे उसका 'लोहा' खरीद लिया है वे अवश्य दु:खी हैं। उन्हें दु:खी होना भी चाहिए, हीरा बेचकर उसी के वजन का लोहा लेने की मूर्खता जो की है-उन्होंने। उन्हें लोहा डुबा रहा है। महर्षि पतंजलि ने कहा-
सति मूले तद्विपाको जात्यायुर्भोगा:।
योग. 2/14/11
अर्थात कर्मों के होने से उनका फल जाति, आयु और भोग के रूप में मिलता है। हम चाहे राजा के घर जन्म लें, चाहे रंक के घर जन्म लें, सभी में पूर्वजन्म का कर्म प्रबल होता है। महर्षि दयानंद जी महाराज लिखते हैं-''इसलिए पूर्व जन्म के पुण्य पाप के अनुसार वर्तमान जन्म और वर्तमान तथा पूर्व जन्म के कर्मानुसार भविष्यत जन्म होते हैं।''
वह यह भी कहते हैं-''और जो पूर्व जन्म न मानोगे तो परमेश्वर पक्षपाती हो जाता है क्योंकि बिना पाप के दारिद्रय आदि दु:ख और बिना पूर्व संचित पुण्य के राज्य धनाढ्यता और बुद्घिमानता उसने क्यों दी? और पूर्व जन्म के पाप पुण्य के अनुसार दु:ख सुख के देने से परमेश्वर न्यायकारी यथावत रहता है।''
यजुर्वेद में आता है कि ''पापकर्मों से अपनी आत्मा का हनन और पतन करने वाले लोग मरने के पश्चात उन लोकों या शरीरों को प्राप्त करते हैं जो कि अंधकार से ढंके हुए हैं।''
(यजु. 40/3)
इसे सामान्यत: हमारे देहात में आज भी ऐसे कहा जाता है कि-'जो बुरा करता है (अर्थात आत्मा का हनन करता है) उसका कोई गतिमोख (मोक्ष) नहीं है' अर्थात वह अंधकारमयी लोकों में ही भटकता फिरता है।
महाभारतकार अनुशासन पर्व में कहता है-''प्राणी जिस-जिस शरीर से जो-जो कर्म करता है, उस कर्म के फल को उस शरीर से ही पाता है, अर्थात मन से किये गये कर्म के फल को मन से ही स्वप्नादि में भोगता है और शरीर से किये गये कर्म को जागृतावस्था में शरीर से ही भोगता है।''
'मनु स्मृति' (12/8) में मनु महाराज भी कुछ ऐसी ही व्यवस्था देते हैं-''मन से किये हुए शुभाशुभ कर्मों का फल मन द्वारा ही भोगा जाता है। इसी प्रकार वाणी और शरीर की अन्य इन्द्रियों द्वारा किये हुए कर्मों का फल उन इन्द्रियों द्वारा ही भोगा जाता है।''
इस प्रकार भारत का सांस्कृतिक वांग्मय पूर्णत: कर्मफल व्यवस्था की वास्तविकता को स्पष्ट करता है।
क्रमश: