आखिर क्या हैं चीनी सामान के बहिष्कार के मायने

  • 2016-10-18 09:30:49.0
  • डॉ. अश्विनी महाजन

आखिर क्या हैं चीनी सामान के बहिष्कार के मायने

देश भर में चीनी माल के बहिष्कार के कारण चीन के सामान की बिक्री 20 से 25 प्रतिशत कम हुई है। चीन द्वारा कुख्यात आतंकवादी मसूद अजहर को अंतरराष्ट्रीय आतंकवादी घोषित करने के प्रस्ताव पर वीटो लगाने और बह्मपुत्र का पानी रोकने से नाराज भारत की जनता ने चीनी माल के बहिष्कार का जो फैसला लिया, उसके परिणाम स्पष्ट दिखाई दे रहे हैं। यदि चीन से आने वाले सामान का आयात 20 प्रतिशत भी कम होता है, तो इससे हमारे चीन के साथ व्यापार घाटे पर कम से कम 10 अरब डालर का असर होगा, जिससे हमारी विदेशी मुद्रा बचेगी.


समाचार पत्रों की रपटों और बाजारों से मिल रहे समाचारों के अनुसार देश भर में चीनी माल के बहिष्कार के कारण चीन के सामान की बिक्री 20 से 25 प्रतिशत कम हुई है। यह कहा जा रहा है कि जिन व्यापारियों ने पहले से चीन का माल आयात कर रखा था, जनता के बहिष्कार के कारण उन्हें भारी घाटा उठाना पड़ा है। ऐसे व्यापारियों का यह भी कहना है कि जनता के रुख को देखते हुए अब वे अगली बार से चीन से माल आयात नहीं करेंगे। चीन द्वारा कुख्यात आतंकवादी मसूद अजहर को अंतरराष्ट्रीय आतंकवादी घोषित करने के प्रस्ताव पर वीटो लगाने और बह्मपुत्र का पानी रोकने से नाराज भारत की जनता ने चीनी माल के बहिष्कार का जो फैसला लिया, उसके परिणाम स्पष्ट दिखाई दे रहे हैं। समाचार पत्रों की इन रिपोर्टों का कहना है कि सोशल मीडिया जैसे व्हाट्स ऐप, फेसबुक इत्यादि के माध्यम से जनता को की गई अपीलों और जनाक्रोश के कारण ऐसा हुआ है। हालांकि सोशल मीडिया पर चीनी माल के बहिष्कार हेतु प्रधानमंत्री के नाम से भी अपील चल रही थी। सरकार की ओर से उसे नकारा गया है, लेकिन उसके बावजूद जनता के बीच चीनी माल के बहिष्कार हेतु उत्साह में कोई कमी नहीं आई है। गौरतलब है कि पिछले कई सालों से चीन से आयात बढ़ता ही जा रहा था। जहां वर्ष 1987-88 में चीन से कुल आयात मात्र 150 लाख (0.015 अरब) डालर ही था, जो 2015-16 तक बढ़ते हुए 61.7 अरब डालर तक पहुंच गया। उधर चीन को होने वाले निर्यात 2015-16 में भी मात्र नौ अरब डालर ही थे, जिसका असर यह हुआ कि चीन से भारत का व्यापार घाटा 2015-16 में बढक़र 52.7 अरब डालर तक पहुंच गया। भारत का कुल व्यापार घाटा 2015-16 में 118.4 अरब डालर था यानी देखा जाए तो अकेले चीन से व्यापार का घाटा कुल घाटे का 45 प्रतिशत था। वर्ष 2000-01 से 2002-03 के अपवाद को छोड़ दिया जाए तो देश लगातार विदेशी भुगतान घाटे में फंसता चला गया और 2013-14 तक हमारा व्यापार घाटा 195 अरब डालर और भुगतान घाटा 90 अरब डालर तक पहुंच चुका था। हाल ही के वर्षों में घटती तेल कीमतों के चलते हमारा भुगतान घाटा और व्यापार घाटा दोनों कम हुए हैं, तो भी देश में व्यापार घाटा 2015-16 में 118.4 अरब डालर तो था ही। विदेशी भुगतानों के घाटे के चलते देश को मजबूरन विदेशी पूंजी और विदेशी कर्ज का सहारा लेना पड़ता है, जिसका दुरगामी प्रभाव भारत के भुगतान घाटे पर भी पड़ता है। देश पर कर्ज का बोझ बढ़ता जाता है और विदेशी कंपनियां भारी मात्रा में रॉयल्टी, ब्याज, डिविडेंट और वेतन के नाम पर विदेशी मुद्रा देश से बाहर ले जाती हैं। वर्ष 2001 में जहां देश पर मात्र 101 अरब डालर का ही कर्ज था, 2016 में बढ़ते हुए 485.6 अरब डालर तक पहुंच गया। इस कर्ज पर हर साल भारी ब्याज भी चुकाना पड़ता है, जो हमारे कर्ज को और बढ़ा देता है। अब जब भारत की जनता ने चीन के सामान का बहिष्कार करने का निर्णय लिया है, वह भी दीपावली के अवसर पर, तो इसका असर चीन से आने वाले आयात पर अवश्य पड़ेगा। यह सही है कि चीन से कुछ सामान तैयार वस्तुओं के रूप में और कुछ सामान मध्यवर्ती वस्तुओं, कलपुर्जों और मशीनरी इत्यादि के रूप में भी आता है। अभी बहिष्कार का दौर उपभोक्ता वस्तुओं तक सीमित है, लेकिन यदि जनता की भावनाएं इसी प्रकार से उद्वेलित रहीं, तो संभव है कि बहिष्कार का असर कलपुर्जों और मशीनरी के आयात पर भी पडऩे लगे। इससे देश की अर्थव्यवस्था पर कई प्रकार के अच्छे प्रभाव पड़ेंगे। पहला प्रभाव सीधे-सीधे आयात और उसके कारण व्यापार घाटे पर पड़ेगा। यदि चीन से आने वाले सामान का आयात 20 प्रतिशत भी कम होता है, तो इससे हमारे चीन के साथ व्यापार घाटे पर कम से कम 10 अरब डालर का असर होगा, जिससे हमारी विदेशी मुद्रा बचेगी। चीन से आयात घटने का दूसरा सबसे अधिक महत्त्वपूर्ण असर यह होगा कि इससे देश में उन वस्तुओं का उत्पादन बढऩे लगेगा, जिनकी आपूर्ति चीनी माल से होती थी। इससे देश में उत्पादन और रोजगार दोनों में वृद्धि होगी। इस बहिष्कार का तीसरा महत्त्वपूर्ण असर यह होगा कि डालर की मांग घटने से रुपए पर दबाव कम होगा और रुपया मजबूती की ओर आगे बढ़ेगा और वर्तमान में रुपया जो 66 से 67 रुपए प्रति डालर पर है, वह सुधरता हुआ 62 रुपए प्रति डालर तक आ सकता है। रुपए का सुधरना देश के लिए अत्यंत मंगलकारी सिद्ध हो सकता है, क्योंकि रुपए के सुधरने से हमारे तेल का आयात बिल भी कम होता है, पेट्रोल और अन्य आयात सस्ते होते हैं और इन सबसे महंगाई भी कम होती है। आज जबकि हमारे आयात कुल जीडीपी के लगभग 25 प्रतिशत के आसपास हैं, रुपए में 10 प्रतिशत की मजबूती महंगाई को 2.5 प्रतिशत कम करती है।

चीनी माल के बहिष्कार के चीन पर प्रभाव बारे कुछ लोगों का कहना है कि चीन के कुल निर्यातों में से भारत को होने वाले निर्यात मात्र 3.4 प्रतिशत ही हैं, क्योंकि पिछले साल चीन के कुल निर्यात 1845 अरब डालर हैं, जिसमें से भारत को होने वाले निर्यात मात्र 61.7 अरब डालर के ही थे। लेकिन यहां हमें यह भी समझना होगा कि चीन, जो पूरी दुनिया में भारी मात्रा में निर्यात करता था, 2007-08 में आई वैश्विक मंदी के बाद निर्यात के मामले में लगातार दबाव में है। वर्ष 2015 में उसके निर्यात लगातार घटते रहे और 2016 के पहले सात महीनों में उनमें थोड़ी वृद्धि होने से चीनी अर्थव्यवस्था पर दबाव कम हुआ। लेकिन 2016 के सितंबर माह में चीन के कस्टम विभाग के आकड़ों के अनुसार चीन के निर्यातों में पिछले साल की तुलना में 10 प्रतिशत की कमी हुई है। हालांकि चीनी सरकार का यह कहना है कि युआन के रूप में यह कमी 5.6 प्रतिशत की ही है, लेकिन हमें इस आकड़े को भी ध्यान से देखना होगा कि जहां अच्छे समय में चीन का कुल व्यापार अधिशेष (सरपल्स) 627.5 अरब डालर तक पहुंच गया था, पिछले साल वह मात्र 420 अरब डालर तक गिर गया। चीन के कुल व्यापार अधिशेष (सरपल्स) का 12 प्रतिशत भारत से आता है। जानकारों का मानना है कि इससे चीनी युआन पर दबाव बढ़ रहा है। गौरतलब है कि चीनी युआन पिछले छह वर्षों में सबसे कमजोर स्तर पर पहुंच गया है। चीनी माल के बहिष्कार का जो उत्साह भारत की जनता के बीच देखने को मिल रहा है, वह अभूतपूर्व है। इससे पहले देश की जनता ने किसी भी परिस्थिति में किसी देश विशेष के संदर्भ में या वैश्विक आयातों के संदर्भ में इस तरह का रुख नहीं अपनाया था। चीन से आयात बढऩे के कारण जब देश में उत्पादन और रोजगार घट रहा था और हमारा मैन्युफेक्चरिंग क्षेत्र अत्यधिक दबाव में था, तो भी आर्थिक विश्लेषक यही कहते रहे कि उपभोक्ता को जब सस्ता सामान मिल रहा है तो वह क्यों न खरीदे। आज जब चीनी माल के बहिष्कार के रूप में देश भक्ति का प्रकटीकरण हो रहा है, तो भी कुछ लोग उस पर टिप्पणी कर रहे हैं कि इससे चीन के साथ संबंध बिगड़ सकते हैं और इससे चीन को कोई नुकसान नहीं होगा, बल्कि भारत को नुकसान जरूर हो सकता है। लेकिन जिस प्रकार से चीनी मीडिया इस अभियान के प्रति प्रतिक्रिया दे रहा है, ऐसा लग रहा है कि जनता द्वारा इस बहिष्कार का असर चीन पर दिखने लगा है। दुनिया के दूसरे मुल्कों को भी इस बहिष्कार से सबक मिल सकता है, जो भारत को केवल बाजार के रूप में देखते हैं और भारत के विरोध में काम करने से बाज नहीं आते।