कॉर्पोरेट का सिद्धांत जियो... और जीने दो का नहीं

  • 2016-10-01 11:30:35.0
  • उगता भारत ब्यूरो

कॉर्पोरेट का सिद्धांत जियो... और जीने दो का नहीं

मिथिलेश कुमार सिंह
मुकेश अम्बानी देश के सबसे बड़े उद्योगपति तो हैं ही, किन्तु उनकी सोच उनके कद से भी बड़ी है। आप उनके द्वारा लिए गए तमाम इनिशिएटिव देख लें, मानो परिपक्वता और दूरदर्शिता उनमें कूट-कूट कर भरी हो। आज मुकेश अम्बानी नियंत्रित रिलायंस इंडस्ट्रीज उन चन्द कंपनियों में है, जो जिधर दृष्टि घुमा ले उधर मैदान साफ़ हो जाए और रिलायंस जिओ की लांचिंग कुछ ऐसी ही धमाकेदार है। कॉर्पोरेट का सिद्धांत कभी भी जिओ और जीने दो का नहीं रहा है, बल्कि इसका सिद्धांत सौ फीसदी डार्विनवाद पर आधारित है कि जो ताकतवर है, वही जियेगा। खैर, इतनी भूमिका के बाद अगर मूल मुद्दे पर बात करते हैं तो मुकेश अम्बानी टेलीकॉम इंडस्ट्री को बदलने की चाहत काफी पहले से संजोये हुए हैं।

जब अम्बानी बंधुओं में अलगाव नहीं हुआ था, तब भी 40 पैसे एसटीडी रेट और 500 रूपये में फोन लांच करके रिलायंस ने तहलका मचा दिया था, जिसके बाद ही आज गाँव-गाँव तक में व्यक्ति-व्यक्ति के हाथों में मोबाइल आया। बाद में अनेकों कंपनियां आईं किन्तु हकीकत में इसका श्रेय रिलायंस को ही जाता है। बाद में मुकेश-अनिल अलग हुए और रिलायंस का टेलीकॉम बिजनेस अनिल अम्बानी के हिस्से में चला गया, किन्तु मुकेश इस क्षेत्र में छिपे पोटेंशियल को बेहतर ढंग से समझ चुके थे। दशक भर में टेलीकॉम इंडस्ट्री का मतलब सिर्फ बात करने से बदलकर इन्टरनेट तक पहुँच गया था और इस नब्ज़ पर पूरी तरह रिसर्च करके मुकेश अम्बानी ने ऐसा दांव चला है कि एयरटेल, वोडाफोन, आईडिया, अनिल अम्बानी वाली रिलायंस कम्युनिकेशंस जैसी कंपनियां जीने दो की गुहार लगाती दिख रही हैं।

अब सोशल मीडिया पर जियो और जीने दो के जो ह्यूमर्स शेयर हो रहे हैं, उनसे तो यही प्रतीत होता है तो अन्य कंपनियों द्वारा इन्टरनेट और दूसरी सुविधाओं की दरों में भारी कटौती भी इस तरफ मजबूत संकेत भी देती है। मुकेश की स्ट्रेटेजी वही है, जब रिलायंस ने पहले 500-500 रूपये वाला फोन लांच किया, मसलन प्रतिद्वंद्वियों की कमर तोडऩे वाला बड़ा प्लान, फोन-कनेक्शन-इन्टरनेट और दूसरी सुविधाओं का कॉम्बो-पैकेज और यूजर्स के बड़े समूह की जरूरतों का गहन अध्ययन! इसके अतिरिक्त, वर्तमान सरकार की डिजिटल इंडिया स्कीम के साथ सधा हुआ तालमेल मुकेश अम्बानी को बाकी खिलाडिय़ों से चतुर साबित करता है। मुकेश यह बात बखूबी जानते हैं कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की पब्लिक से बेहतर कनेक्टिविटी है, तो डिजिटल इंडिया इत्यादि स्कीम्स के प्रचार-प्रसार में सरकार दिन-रात एक किये हुए है। हैरानी की बात है कि इस सेक्टर के अन्य खिलाड़ी इस सोच से महरूम रह गए, जबकि डिजिटल इंडिया का असल मतलब ही व्यक्ति-व्यक्ति को इन्टरनेट से जोडऩा है। हालाँकि, मुकेश अम्बानी की जिओ के प्रचार के लिए प्रधानमंत्री का नाम लेने को लेकर कुछ हलकों में आलोचना भी हुई, किन्तु इसमें तकनीकी तौर पर आखिर गलत क्या है? डिजिटल इंडिया उद्देश्य तो सरकार द्वारा ही निर्धारित है और अगर मुकेश अम्बानी ने इसे अपने बिजनेस के साथ जोड़ा तो दूसरों को आलोचना करने का हक़ नहीं है। बेशक आने वाले दिनों में किन्तु-परंतु आये, पर हकीकत यही है कि मुकेश अम्बानी ने बाजी मार ली है।