आज देश में जरूरी है-आर्थिक सर्जिकल स्ट्राइक

  • 2016-10-07 12:30:38.0
  • पीके खुराना

आज देश में जरूरी है-आर्थिक सर्जिकल स्ट्राइक

अगर हम पाकिस्तान की आतंकवादी कार्रवाइयों पर लगाम लगाना चाहते हैं, तो हमें चीन पर वार करना होगा और वह वार सिर्फ आर्थिक ही हो सकता है। यह काम कोई सरकार अकेले नहीं कर सकती, इसमें हम सबको साथ मिलना होगा। हमें आज से, अभी से, यह कसम खानी होगी कि चीन में निर्मित कोई भी सामान, चाहे वह कितना ही सस्ता या आकर्षक हो, कदापि नहीं खरीदेंगे। इसका भाजपा से कोई लेना-देना नहीं है। यह एक राष्ट्रीय आवश्यकता है। अगर हम आतंकवाद पर लगाम लगाना चाहते हैं तो हमें यह करना ही होगा, अन्यथा हम अपना कत्र्तव्य पूरा किए बिना अपनी सरकारों को दोष देते रहेंगे.


हम जानते हैं कि भारत के विरुद्ध पाकिस्तानी आतंक को चीन का सक्रिय समर्थन प्राप्त है और चीन के हित इस बात से जुड़े हुए हैं कि भारत इन आतंकवादी कार्रवाइयों से परेशान रहे, पाकिस्तान को दोष देता रहे और वह चुपचाप अपना हित साधता रहे। पाकिस्तान की हर उस गतिविधि को चीन का सक्रिय समर्थन प्राप्त है, जिससे भारत का ध्यान बंटा रहे। दरअसल, कश्मीर की समस्या की जड़ पाकिस्तान में नहीं, चीन में है। पाकिस्तान सिर्फ फ्रंट है, चेहरा है, असली समस्या चीन है। चीन-पाकिस्तान आर्थिक गलियारा (चाइना-पाकिस्तान इकॉनोमक कारिडोर) हमारी समस्याओं की असली जड़ है। इस गलियारे का बड़ा हिस्सा पाकिस्तान-शासित कश्मीर से गुजरता है और यदि कश्मीर का शेष भाग, जो अब भी भारत में है, भारत से अलग हो जाए तो यह गलियारा पूरा हो जाता है और चीन के लिए शेष विश्व से व्यापार करना बहुत सस्ता और आसान हो जाएगा। चीन का यही आर्थिक हित पाकिस्तान में निवेश का और पाकिस्तान में आतंकवादियों के लिए धन के जुगाड़ का एकमात्र कारण है। यही कारण है कि भारतवर्ष में समाज का एक वर्ग चीन में बने सामान को न खरीदने की वकालत कर रहा है, लेकिन जब हम चीनी सामान के बहिष्कार की बात करते हैं तो हमें कुछ अन्य व्यावहारिक पक्षों को भी ध्यान में रखना होगा।

बजाज सीलिंग फैन के ब्लेड चीन में बनते हैं। तमाम बीमारियों में काम आने वाली एंटीबायोटिक्स और बिजलीघरों में लगने वाली टरबाइनें चीन से बनकर आती हैं। आईफोन समेत भारत में बिकने वाले ज्यादातर मोबाइल फोन और लैपटाप भी चीन में बनते हैं। देश के बड़े निर्माण कार्यों के बहुत से ठेके भी चीन की कंपनियों को मिले हुए हैं। सन् 2012 में चीनी सामान का भारत में व्यापार 33000 करोड़ से भी ज्यादा का था। स्वदेशी अभियान हमारी आवश्यकता है पर इसे लागू कर पाने के लिए हमें अपनी क्षमताओं, गुणवत्ता और अनुशासन पर और ध्यान देना होगा। इस दिवाली के लिए चीन का जो सामान भारत आया है, वह अब से काफी समय पहले भी आया हो सकता है और उसका भुगतान भी चीन को किया जा चुका होगा। यही नहीं, जिन छोटे-छोटे दुकानदारों ने इसे आगे बेचने के लिए खरीदा होगा, उन्हें काफी दिक्कतों का सामना करना पड़ेगा। हमें उन बड़े उद्योगपतियों के बारे में भी सोचना होगा जो चीन से व्यापार कर रहे हैं, चीन से सामान आयात कर रहे हैं या चीन में अपने कारखाने चला रहे हैं। यह साधारण मामला नहीं है, इसमें कई सारी गुंझलें हैं। यह सच है कि चीन ने बह्मपुत्र नदी का पानी रोक लिया है, चीन हर तरह से भारत को घेरने की कोशिश कर रहा है। यही नहीं, उड़ी हमले के बाद भी चीन योजनाबद्ध तरीके से बार-बार हमारी सीमा में घुसकर हमारी सीमा में अपने निशान छोड़ रहा है ताकि वक्त आने पर वह यह दावा कर सके कि वह क्षेत्र भारत का नहीं, चीन का है। सीमा के आसपास के क्षेत्र में चीन विकास योजनाएं चला रहा है, परिवहन व्यवस्था मजबूत कर रहा है। वह एक सोची-समझी योजना के अंतर्गत वर्षों से काम कर रहा है। तो अगर हम पाकिस्तान की आतंकवादी कार्रवाइयों पर लगाम लगाना चाहते हैं तो हमें चीन पर वार करना होगा और वह वार सिर्फ आर्थिक ही हो सकता है। यह काम कोई सरकार अकेले नहीं कर सकती, इसमें हम सबको साथ मिलना होगा। हमें आज से, अभी से, यह कसम खानी होगी कि चीन में निर्मित कोई भी सामान, चाहे वह कितना ही सस्ता या आकर्षक हो, कदापि नहीं खरीदेंगे। इसका भाजपा अथवा नागपुर से कोई लेना-देना नहीं है। यह एक राष्ट्रीय आवश्यकता है।

हम यह नहीं सोच सकते कि चीन और पाकिस्तान को अलग-थलग करने के लिए कोई दूसरा देश एक सीमा से आगे बढक़र हमारा साथ दे सकता है। आज के दौर में राष्ट्रीय हित पूरी तरह से देश के आर्थिक हितों से जुड़े हुए हैं। यह उम्मीद करना गलत होगा कि आतंकवाद के मामले में पाकिस्तान अलग-थलग पड़ जाएगा। इस मामले में विश्व बिरादरी को हम तीन हिस्सों में बांट सकते हैं। पहला हिस्सा मुस्लिम देशों का है, जो पाकिस्तान को सिर्फ इसलिए समर्थन और सहायता देते हैं क्योंकि वह एक मुस्लिम देश है, दूसरा हिस्सा उन देशों का है जिनके व्यावसायिक हित पाकिस्तान से जुड़े हुए हैं। ऐसे देशों में अमरीका भी शामिल है जो सारी दुनिया को हथियार बेचता है। अमरीका, फ्रांस, रूस आदि हथियार निर्माता देशों के हित शेष विश्व से अलग हैं, वे तो चाहते ही हैं कि हर जगह अशांति बनी रहे। एक-दूसरे का प्रभाव कम करने के लिए वे अलग-अलग देशों के समर्थन में खड़े हो सकते हैं लेकिन उसके पीछे भी हित शुद्ध व्यावसायिक ही हैं। इसी वर्ग में वे देश भी आते हैं जिनके लिए पाकिस्तान एक बाजार है। तीसरा वर्ग उन देशों का है जो किसी दूसरे के फटे में टांग अड़ाना नहीं चाहते, वे निरपेक्ष हैं। उन्हें भारत-पाकिस्तान की लड़ाई से कोई लेना-देना नहीं है। अत: यह सोचना कि भारत विश्व बिरादरी में इतना मजबूत हो गया है कि पाकिस्तान को पूर्णत: अलग-थलग किया जा सकता है, सच्चाई से आंखें मूंदना है।

हर भारतवासी चाहता है कि उत्तर-पूर्व और कश्मीर सहित पूरे देश में शांति का माहौल हो। हर भारतवासी चाहता है कि भारतवर्ष एक महाशक्ति बने और हर भारतवासी चाहता है कि विश्व में भारतवर्ष का सम्मान बढ़े। यह सपना सच हो सके, इसके लिए आवश्यक है कि सरकार, उद्यमी, शिक्षण संस्थाएं और समाज मिलकर काम करें। सरकार की नीतियां ऐसी हों जहां हमारे लिए कृषि और उद्योगों में संतुलन बनाते हुए विकसित तकनीक का प्रयोग करना संभव हो सके। शिक्षण संस्थाएं किताबी शिक्षण के बजाय विश्व स्तरीय व्यावहारिक शिक्षण पद्धति लागू करें। यह कोई साधारण काम नहीं है। यह एक नई संस्कृति की शुरुआत जैसा काम है।

इसके लिए यह भी आवश्यक है कि एक नागरिक के रूप में हम भी जिम्मेदार बनें, यदि हम नौकरी में हैं तो अपना काम मुस्तैदी से करें, समय के पाबंद हों, अनुशासन में रहें और एक टीम के रूप में काम करने और सबको सफल बनाने की आदत डालें।

चीन, पाकिस्तान आदि हमारे दुश्मन हैं, पर हम खुद भी अपने सबसे बड़े दुश्मन हैं। यदि हम भारत को एक विकसित देश के रूप में देखना चाहते हैं तो हमें खुद को भी बदलना होगा। एक सरकारी कर्मचारी के रूप में मैं समय का पाबंद रहूं, अपना काम मुस्तैदी से करूं, काम के बदले रिश्वत की उम्मीद न करूं, बिना कारण हड़ताल न करूं, एलटीसी, मेडिकल तथा अन्य भत्तों में बेईमानी न करूं तो मैं एक जिम्मेदार नागरिक हूं। और यदि मैं ऐसा करता हूं तो यह निश्चित है कि जनसाधारण को अपने कामों के लिए सरकारी दफ्तरों के चक्कर नहीं लगाने पड़ेंगे और भ्रष्टाचार पर लगाम लगेगी। जीवन के हर क्षेत्र में हर नागरिक को स्वयं को बदलना होगा, अपने उत्तरदायित्व निभाने होंगे, तभी भारतवर्ष एक विकसित देश बन सकेगा और तभी यह संभव होगा कि हम आतंकरहित चैन का जीवन जी सकेंगे। अगर हम आतंकवाद पर लगाम चाहते हैं तो हमें यह करना ही होगा, अन्यथा हम अपना कत्र्तव्य पूरा किए बिना अपनी सरकारों को दोष देते रहेंगे।