काले धन का दोहरा संकट

  • 2016-08-03 07:30:22.0
  • डा. भरत झुनझुनवाला

काले धन का दोहरा संकट

ईमानदारी से सरकारी राजस्व से खपत को बढ़ाया जा रहा है। सरकारी निवेश में निरंतर कटौती की जा रही है। इस कटौती का पूरा दुष्प्रभाव दिख नहीं रहा है, चूंकि ईमानदारी के निजी निवेश में कुछ वृद्धि भी हुई है। जैसे हाई-वे बनाने का ठेका पारदर्शी और बिना घूस लिए दिए जाने से निजी उद्यमी द्वारा हाई-वे बनाने में अधिक निवेश किया जा रहा है, परंतु यह उपलब्धि तो यूं भी अपेक्षित थी। इस ईमानदारी से आर्थिक विकास की गति में तेजी आनी थी

, लेकिन इस ईमानदारी से केवल सरकार की खपत के दुष्प्रभाव को काटा जा रहा हैज्

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने देश के नागरिकों को चेतावनी दी है कि काले धन की घोषणा करके उस पर टैक्स अदा कर दें अन्यथा 30 सितंबर के बाद सख्त कदम उठाए जाएंगे। काला धन रखने वालों को जेल भी भेजा जा सकता है। हाल में ही बेनामी प्रापर्टी को जब्त करने का नया कानून संसद ने पारित किया है। मोदी सरकार की शीर्ष स्तर पर ईमानदारी एवं दृढ़ संकल्प को देखते हुए इन कदमों को गंभीरता से लेना चाहिए। प्रश्न है कि इन सही कदमों का अंतिम परिणाम क्या होगा। क्या काले धन पर नियंत्रण से देश की अर्थव्यवस्था को गति मिल पाएगी

? आर्थिक विकास का रास्ता निवेश होता है। जैसे एक आटो रिक्शा चालक अपनी 500 रुपए प्रतिदिन की कमाई में 200 रुपए की बचत करे तो दो साल में 1,20,000 रुपए जमा कर सकता है। इस रकम पर बैंक से ऋण लेकर वह मोटर कार खरीद कर टैक्सी चला सकता है। तब उसकी आय
500 रुपए प्रतिदिन से बढक़र 1,000 रुपए प्रतिदिन हो जाएगी। फार्मूला सीधा सा है-आय के अधिकाधिक अंश का निवेश करने से विकास होता है। इसके लिए कुल आय में बचत को प्रोत्साहन देना आवश्यक होता है। आय की रकम की खपत करने से विकास शिथिल हो जाता है। यही बात देश की अर्थव्यवस्था पर लागू होती है। यूपीए सरकार के कार्यकाल मे काले धन का बोलबाला था। अब तक उसके कार्यकाल में होने वाले घोटालों के खुलासों से यह बात कई मर्तबा साबित हो चुकी है। मंत्री एवं अधिकारी घूस लेकर उद्यमी को राहत देते थे। जैसे मान लीजिए किसी उद्योग के लिए प्रदूषण नियंत्रण प्लांट लगाना अनिवार्य है। मंत्रीजी ने घूस लेकर उस पर कार्रवाई नहीं होने दी।

इससे उद्यमी की लागत कम हुई। उसे प्रदूषण नियंत्रण प्लांट में निवेश नहीं करना पड़ा। प्लांट को चलाने में बिजली खर्च नहीं करनी पड़ी। माल के उत्पादन में उसकी लागत कम आई। उस घटी लागत के परिणामस्वरूप उसने लाभ कमाया। लाभ की जो अतिरिक्त रकम थी

, उसका उसने फिर से निवेश किया। इस काले धंधे से निवेश बढ़ा। दूसरी तरफ मंत्री एवं अधिकारियों ने घूस की रकम का निवेश किया। उन्होंने किसी बिल्डर से पार्टनरशिप स्थापित की और उसके प्रोजेक्ट में निवेश किया। इस प्रकार यूपीए सरकार के कार्यकाल में काले धंधे से निवेश में वृद्धि हुई थी। इस निवेश के कारण विकास की प्रक्रिया भी किसी रूप में बाधित नहीं हुई। यही कारण है कि चौतरफा भ्रष्टाचार के बावजूद आर्थिक विकास दर सात प्रतिशत के सम्मानजनक स्तर पर बनी रही। केंद्र में सत्ता परिवर्तन के बाद हालात भी बदले हैं। राज्य व्यवस्था में पसरे कदाचार को मिटाने की दिशा में मोदी सरकार ने कई प्रभावी कदम उठाए हैं। मोदी सरकार ने केंद्र के स्तर पर मंत्रियों एवं अधिकारियों का यह गोरखधंधा बंद कर दिया है। फलस्वरूप उद्यमी को प्रदूषण नियंत्रण प्लांट लगाना पड़ रहा है। प्रदूषण नियंत्रण प्लांट लगाने से माल के कुल उत्पादन में उसकी लागत ज्यादा आ रही है। उसके लाभ दबाव में हैं। अधिशेष कम रह जाने की वजह से वह नया निवेश नहीं कर रहा है। मंत्री एवं अधिकारियों की काले धन की आय भी न्यून हो गई है। इनके द्वारा बिल्डर के साथ साझेदारी नहीं बनाई जा रही है। रीयल एस्टेट में निवेश नहीं हो रहा है। यहां भी मंदी व्याप्त है
, लेकिन काले धन पर नियंत्रण से आई यह मंदी आधी कहानी ही बताती है। उद्यमी तथा मंत्री द्वारा निवेश कम हो रहा है यह सच है
, परंतु सरकार का राजस्व बढ़ रहा है।

इस दौरान करों की चोरी काफी हद तक घटी है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा 30 सितंबर की चेतावनी दिया जाना तथा बेनामी प्रापर्टी को जब्त करने का कानून बनाना इसी दिशा में एक और कदम है। सरकार के राजस्व में आने वाले समय में और वृद्धि होगी। प्रश्न है कि इस राजस्व का उपयोग किस दिशा में किया जाता है। सरकार द्वारा इस रकम का निवेश किया गया तो अर्थव्यवस्था में निवेश बढ़ेगा और वह सफेद धन के बल पर चल निकलेगी। उद्यमी तथा मंत्री द्वारा काले धन का निवेश न करने से जो मंदी आई है

, वह सरकार द्वारा सफेद धन का निवेश करने से कट जाएगी। जैसे मंत्रीजी ने बिल्डर के साथ साझेदारी नहीं बनाई, तो बिल्डर का धंधा पस्त हुआ, लेकिन दूसरी ओर सरकार ने हाई-वे एवं बंदरगाह बनाए। बिल्डर के पस्त होने से आई मंदी
, सरकारी निवेश में वृद्धि से कट गई। अर्थव्यवस्था साफ भी हो गई और गतिमान भी। यह उत्तम स्थिति है, जहां हमें पहुंचना है। दूसरी परिस्थिति में सरकार द्वारा राजस्व का उपयोग निवेश के स्थान पर सरकारी कर्मियों को बढ़े वेतन देने में किया जा सकता है। जैसे वन रैंक, वन पेंशन तथा सातवें वेतन आयोग के नाम पर इन्हें बढ़ाकर वेतन दिए जा रहे है। सरकारी कर्मियों द्वारा इस रकम से खपत बढ़ाई जा रही है
, जैसे इनके द्वारा लग्जरी कार खरीदी जा रही है अथवा विदेश यात्रा को जाया जा रहा है अथवा सोना खरीद कर बैंक के लॉकर में रखा जा रहा है। ऐसा करने से सरकार के राजस्व का उपयोग निवेश में नहीं, बल्कि खपत को बढ़ाने में हो जाता है। इसका परिणाम होता है

कि निजी क्षेत्र द्वारा काले धन एवं सरकारी क्षेत्र द्वारा सफेद धन दोनों द्वारा ही निवेश में कटौती हो जाती है। काले धन पर नियंत्रण का अंतिम परिणाम इस बात पर निर्भर करता है कि राजस्व की वृद्धि का उपयोग किस प्रकार किया जाता है। यदि राजस्व का उपयोग निवेश बढ़ाने के लिए किया जाता है तो अर्थव्यवस्था में चार चांद लग जाएंगे। इसके विपरीत यदि राजस्व का उपयोग खपत बढ़ाने में किया जाता है

, तो अर्थव्यवस्था पर ग्रहण लग जाएगा। इस दिशा में मोदी सरकार का अब तक का रिकार्ड निराशाजनक रहा है। ईमानदारी से सरकारी राजस्व से खपत को बढ़ाया जा रहा है। सरकारी निवेश में निरंतर कटौती की जा रही है। इस कटौती का पूरा दुष्प्रभाव दिख नहीं रहा है
, चूंकि ईमानदारी के निजी निवेश में कुछ वृद्धि भी हुई है।

जैसे हाई-वे बनाने का ठेका पारदर्शी और बिना घूस लिए दिए जाने से निजी उद्यमी द्वारा हाई-वे बनाने में अधिक निवेश किया जा रहा है, परंतु यह उपलब्धि तो यूं भी अपेक्षित थी। इस ईमानदारी से आर्थिक विकास की गति में तेजी आनी थी, लेकिन इस ईमानदारी से केवल सरकार की खपत के दुष्प्रभाव को काटा जा रहा है। जैसे घर का मुखिया दारू पिए और बच्चे को पढ़ाई के लिए भी पैसा दे

, तो परिवार चल निकलता है। वही मुखिया ईमानदारी से सोना खरीद कर तिजोरी में रखे और बच्चे की पढ़ाई के लिए निवेश न करे, तो परिवार दब जाता है। ऐसा ही मोदी सरकार की कृपा से भारतीय अर्थव्यवस्था का हो रहा है। राजस्व के दुरुपयोग के कारण काले धन पर नियंत्रण अभिशाप बनता जा रहा है।

लेकिन यदि तमाम तरह के उत्पीडऩकारी सामाजिक ढांचों को मिटाना है तो समानता का विचार महत्त्वपूर्ण हो जाता है।

क्या यह संभव है कि वर्ण व्यवस्था रहे और समरसता आ जाए? क्या यह संभव है कि आर्थिक संसाधनों पर कुछ लोगों का अलोकतांत्रिक नियंत्रण हो और समरसता आ जाए? क्या यह संभव है कि पितृसत्तात्मक ढांचे बने रहें और समरसता आ जाए? यह एक खामखयाली तो हो सकती है, लेकिन तार्किक विचार नहीं हो सकता। सरकार समरसता पर जोर देकर विद्यार्थियों को किस तरह के कल के लिए तैयार कर रही है

? क्या ऐसे कल के लिए, जहां वे जुल्मों का प्रतिकार करने का हौसला रखने के बजाय उनके साथ समरस होकर जीना सीख लें?

दस्तावेज में कहा गया है कि बाल मजदूरों और स्कूल छोड़ चुके बच्चे-बच्चियों की शिक्षा के लिए मुक्त विद्यालय की सुविधा का विस्तार किया जाएगा। इसका अर्थ यह है कि मुक्त विद्यालय की परिधि में प्राथमिक शिक्षा को भी शामिल किया जाएगा। अर्थात बच्चों और बच्चियों के स्कूल छोडऩे के कारणों का पता लगा कर उन्हें दूर नहीं किया जाएगा बल्कि उनके लिए मुक्त विद्यालय जैसी दोयम दर्जे की व्यवस्था करके स्कूल छोडऩे के कारणों को बना रहने दिया जाएगा। ऐसा करना बाजारवादी

'कॉस्ट-इफेक्टिवनेस' की संस्कृति के साथ मेल खाता है।

इस प्रकार यह राष्ट्रीय शिक्षा नीति निर्माण के दस्तावेज के बजाय उस अंतरराष्ट्रीय पूंजी के उद््देश्यों की पूर्ति का दस्तावेज है जिसे सामूहिकता की भावना से प्रेरित संघर्षरत

, शिक्षित नागरिक नहीं बल्कि मशीनी स्तर पर प्रशिक्षित, अर्ध-प्रशिक्षित, सस्ते श्रमिक चाहिए। इस पूरी कवायद में 'गौरवमयी संस्कृति' की दुहाई एक सहायक विचार की तरह काम करती है। क्योंकि इनसे देश के इतिहास से उपजे व वर्तमान में भी स्थित वर्ण-आधारित, वर्गीय व लैंेिगक असमानता और शोषण के प्रश्नों को दबाने का काम लिया जाएगा।

यह कोई हैरानी की बात नहीं कि इस दस्तावेज में समान स्कूल व्यवस्था तो दूर

, पिछले साल आए इलाहाबाद उच्च न्यायालय के उस फैसले का जिक्र भी नहीं है जिसमें उत्तर प्रदेश सरकार को यह आदेश दिया गया था कि न्यायाधीश व मंत्री से लेकर अधिकारी व कर्मचारी तक सरकार से किसी भी तरह का वेतन/मानदेय प्राप्त करने वाले सभी लोगों के बच्चे प्रदेश के सरकारी स्कूलों में पढेंÞ। दस्तावेज नवउदारवाद की जरूरतों के अनुरूप शिक्षा को बाजार में बिकने वाले 'माल' की संकल्पना के खिलाफ कोई योजना तो क्या चिंता तक व्यक्त नहीं करता है
, बल्कि अंतरराष्ट्रीय बाजार के विस्तार के लिए शिक्षा को पूंजी के एक नए फैलाव के साधन के तौर पर देखता है।

आज एक ओर देश के तमाम हिस्सों में सरकारी स्कूल-व्यवस्था व सार्वजनिक उच्च शिक्षा संस्थानों को शिक्षा के बाजार को खड़़ा करने के लिए सुनियोजित ढंग से बदहाली व बंदी के रास्ते पर धकेला जा रहा है, वहीं दूसरी ओर, निजी संस्थानों के संदर्भ में पहुंच

, समानता, गुणवत्ता और सामाजिक न्याय को लेकर जनसामान्य का अनुभव घोर असंतोष व हताशा पैदा कर रहा है। बाजार के मूल चरित्र तथा विश्व-धरातल के ऐतिहासिक अनुभवों को ध्यान में रखते हुए शिक्षा के क्षेत्र में निजी संस्थाओं से यह उम्मीद रखना कि वे मानवीय व संवैधानिक मूल्यों को साधने में सहायक होंगी, एक भ्रम पालना होगा। अफसोस है कि यह दस्तावेज इसी गलतफहमी से न सिर्फ स्वयं ग्रसित है बल्कि जनसामान्य में भी यही नासमझी प्रेषित कर रहा है।

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