मोहभंग के दौर में वैश्वीकरण

  • 2016-10-26 06:30:34.0
  • डा. भरत झुनझुनवाला

मोहभंग के दौर में वैश्वीकरण

जिस प्रकार टाटा, जार्ज सोरोस तथा डोनाल्ड ट्रंप के लिए यूरोपीय यूनियन की सदस्यता काम का सौदा थी, उसी प्रकार भारत के उद्यमियों तथा अरबपतियों के लिए विश्व व्यापार संगठन की सदस्यता लाभ का सौदा है। यही कारण है कि अमीरों का हित साधने वाले हमारे मंत्री, नीति आयोग के गणमान्य सदस्य, आईएएस अधिकारी तथा विश्वविद्यालयों के प्रोफेसर मुक्त व्यापार के गुणगान करने में थकते नहीं हैं.

इंग्लैंड ने यूरोपियन यूनियन से बाहर आने का निर्णय लिया है। इसे ब्रेग्जिट यानी ब्रिटेन का यूरोपीय यूनियन से एग्जिट कहा जा रहा है। उस देश के नागरिकों ने पाया कि हंगरी तथा पोलैंड जैसे तुलना में गरीब देशों से भारी संख्या में श्रमिक इंग्लैंड में प्रवेश कर रहे हैं। यूरोपीय यूनियन की सदस्यता की एक शर्त है कि सभी सदस्य देशों के नागरिकों को किसी भी दूसरे सदस्य देश में नौकरी करने की छूट होगी। इंग्लैंड के उच्च वर्गीय नागरिकों के लिए यह वरदान था। इंग्लैंड की सरकार के लिए काम करने वाले एक अधिकारी ने हंगरी की एक गृह सहायिका को रखा है, चूंकि वह कम वेतन पर अधिक समय के लिए कार्य करने को तैयार थी। इंग्लैंड में इस समय प्रति वर्ष तीन लाख कर्मी दूसरे यूरोपीय देशों से प्रवेश कर रहे हैं। इंग्लैंड के अपने नागरिकों के इतने ही रेजगार छिन रहे हैं। इसलिए इंग्लैंड के नागरिकों ने यूरोपीय यूनियन से बाहर आने का निर्णय किया है। इंग्लैंड की प्रधानमंत्री थेरेसा मे ने घोषणा की है कि बे्रग्जिट के बाद वह आगंतुकों को वीजा देने में सख्ती करेंगी। वर्तमान में प्रवेश कर रहे तीन लाख श्रमिकों की संख्या को घटाकर एक लाख किया जाएगा। वीजा केवल विशेष कुशलता रखने वाले श्रमिकों को दिया जाएगा। ब्रेग्जिट पर निर्णय लेने के लिए इंग्लैंड में जनमत संग्रह कराया गया था।

इसमें 52 प्रतिशत लोगों ने ब्रेग्जिट के पक्ष में मत डाले थे। तमाम अर्थशास्त्रियों और उद्यमियों ने इंग्लैंड को ब्रेग्जिट से इंग्लैंड को होने वाली हानि की चेतावनी दी थी। अपने देश के टाटा समूह द्वारा इंग्लैंड में जैगुआर कार का उत्पादन किया जाता है। इन्होंने ब्रेग्जिट का विरोध किया था। इसी प्रकार अरबपति जार्ज सोरोस तथा राष्ट्रपति पद के उम्मीदवार डानल्ड ट्रंप ने भी इंग्लैंड के नागरिकों को ब्रेग्जिट के दुष्परिणामों के प्रति चेताया था। इन उद्यमियों एवं अरबपतियों का मानना था कि दूसरे देशों के सस्ते श्रम के प्रवेश से अंत में इंग्लैंड में श्रमिकों के रोजगार में वृद्धि होगी। इनका तर्क था कि सस्ते श्रम के प्रवेश से इंग्लैंड में श्रमिकों के वेतन घटेंगे। श्रम सस्ता होने से यहां उद्योग ज्यादा लगेंगे। इनमें नए रोजगार उत्पन्न होंगे। इन नए रोजगारों से हंगरी के साथ-साथ इंग्लैंड के नागरिक भी लाभान्वित होंगे। उद्योगों के विस्तार से इंग्लैंड की सरकार को टैक्स अधिक मिलेगा। इससे जनकल्याणकारी योजनाएं जैसे मुफ्त स्वास्थ्य सेवाओं का विस्तार किया जा सकेगा। अत: इन लोगों ने ब्रेग्जिट का विरोध किया था। उद्यमियों एवं अरबपतियों के तर्क में दम है। प्रमाण है कि इंग्लैंड में तीन लाख श्रमिक प्रवेश कर रहे हैं। यूरोपीय यूनियन की सदस्यता से इंग्लैंड की अर्थव्यवस्था लाभान्वित हुई है और नए रोजगार बने हैं। फलस्वरूप लोग उस देश में प्रवेश करने को लालायित हैं।

फिर इंग्लैंड के नागरिकों ने ब्रेग्जिट के पक्ष में वोट क्यों दिया? कारण है कि इंग्लैंड के अपने नागरिकों के लिए यूरोपीय यूनियन की सदस्यता घाटे का सौदा रही है। जो नए रोजगार बने हैं, वे बाहरी श्रमिकों ने हासिल किए हैं। इंग्लैंड की परिस्थिति उस गृहस्वामिनी की है, जिसने रसोई में बने अधिकाधिक भोजन को मेहमानों को परोस दिया और घर के प्राणी भूखे रह गए। किचन का विकास अवश्य हुआ, लेकिन घर के बच्चे भूखे रह गए। इसी प्रकार यूरोपीय यूनियन की सदस्यता का लाभ उद्यमियों एवं अरबपतियों को हुआ है। इन्हें सस्ता श्रम मिला। यूरोप के बाजार में अपना माल बेचने की छूट मिली। यह सदस्यता यूरोपीय यूनियन के गरीब देशों के लिए भी लाभप्रद रही। हंगरी की गृह सहायिका को इंग्लैंड में रोजगार मिला, लेकिन इंग्लैंड के अपने श्रमिकों के लिए यह सदस्यता घाटे का सौदा रही। उनके वेतन दबाव में आए और नए रोजगार आगंतुकों को हासिल हुए। अतएव उन्होंने ब्रेग्जिट के पक्ष में मतदान किया। भारत की परिस्थिति इंग्लैंड सरीखी है। हमने विश्व व्यापार संगठन की सदस्यता को स्वीकार करके अपने उद्यमियों के लिए पूरे विश्व में अपने माल का निर्यात करना आसान बना दिया है। चमड़े के उत्पाद, दवाओं और कपड़े का भारी मात्रा में निर्यात हो रहा है, जैसे टाटा के लिए इंग्लैंड में बनी जैगुआर कार का निर्यात करना आसान हो गया था। साथ-साथ भारत को बांग्लादेश तथा नेपाल से श्रमिकों का पलायन भी बढ़ा है।

मेरे पड़ोसी असम के रहने वाले हैं। वे बताते हैं कि बांग्लादेश से लगे जिलों में निम्न श्रेणी के रोजगार जैसे कुली, खेत के कार्य में लगे मजदूर, रिक्शा चालक इत्यादि लगभग पूर्णतया बांग्लादेशी आगंतुकों के हाथ चले गए हैं। इन जिलों के भारतीय नागरिक दुकान चलाने जैसे कुछ कार्यों तक सिकुड़ कर रह गए हैं। कोलकाता और दिल्ली में भी बांग्लादेश के नागरिकों को रिक्शा चलाते और गृह कार्य करते पाया जाता है। जिस प्रकार इंग्लैंड में हंगरी की गृह सहायिका ने प्रवेश किया है, उसी प्रकार भारत में बांग्लादेश की गृह सहायिकाएं प्रवेश कर रही हैं। इस बात से कोई अंतर नहीं पड़ता है कि इंग्लैंड में प्रवेश कानूनी था, जबकि भारत में यह गैर कानूनी है। अर्थव्यवस्था को इस कानूनी प्रपंच से कोई सरोकार नहीं रहता है। स्पष्ट है कि भारत तथा इंग्लैंड की स्थिति एक समान है। यदि इंग्लैंड के नागरिकों के लिए यूरोपीय यूनियन के साथ मुक्त व्यापार घाटे का सौदा रहा है, तो हमारे नागरिकों के लिए विश्व व्यापार संगठन के अंतर्गत मुक्त व्यापार भी घाटे का सौदा ही है। परंतु जिस प्रकार टाटा, जार्ज सोरोस तथा डोनाल्ड ट्रंप के लिए यूरोपीय यूनियन की सदस्यता काम का सौदा थी, उसी प्रकार भारत के उद्यमियों तथा अरबपतियों के लिए विश्व व्यापार संगठन की सदस्यता लाभ का सौदा है।

यही कारण है कि अमीरों का हित साधने वाले हमारे मंत्री, नीति आयोग के गणमान्य सदस्य, आईएएस अधिकारी तथा विश्वविद्यालयों के प्रोफेसर मुक्त व्यापार के गुणगान करने में थकते नहीं हैं। इस समस्या के समाधान पर भी इंग्लैंड का अनुभव प्रकाश डालता है। इंग्लैंड की प्रधानमंत्री थेरेसा मे ने कहा है कि ब्रेग्जिट के बाद भी विशेष कुशलता रखने वाले आगंतुकों को वीजा दिया जाता रहेगा, जैसे इंजीनियरों एवं सॉफ्टवेयर प्रोग्रामरों को। उनकी रणनीति है कि इन कुशल कर्मियों के सहारे इंग्लैंड की अर्थव्यवस्था में उच्च कोटि के व्यापार में वृद्धि हासिल की जाए जैसे सॉफ्टवेयर प्रोग्रामरों एवं वित्तीय विश्लेषकों के सहारे इंग्लैंड को विश्व की पूंजी की राजधानी बनाए रखा जाए। तब इंग्लैंड में वित्तीय क्षेत्र में ऊंचे वेतन के नए रोजगार बनते रहेंगे। इन ऊंचे कर्मियों द्वारा गृह सहायिकाओं को रोजगार दिया जाएगा। गृह सहायिकाओं के वेतन वर्तमान से बढ़ जाएंगे, चूंकि हंगरी से सहायिका का आगमन नहीं होगा।

अर्थात अर्थव्यवस्था को कपड़े के उत्पादन जैसे निम्न कोटि के क्षेत्रों से हटाकर उच्च कोटि के वित्त, बीमा एवं डिजाइन जैसे क्षेत्रों की तरफ बढ़ा दें, तो ब्रेग्जिट के कारण घरेलू वेतन में वृद्धि के बावजूद इंग्लैंड में नए रोजगार बन सकते हैं। यही फार्मूला हमें भी अपनाना चाहिए। अर्थव्यवस्था को उच्च कौशल उद्योगों की ओर मोडऩा चाहिए। तब हम महंगे घरेलू श्रम का भार वहन कर सकेंगे। मेक इन इंडिया को उच्च कोटि के उद्योगों तक सीमित करना चाहिए।