चिंता का विषय : टाटा घराने पर उभरे संकट

  • 2016-11-12 06:30:30.0
  • प्रो. एनके सिंह

चिंता का विषय : टाटा घराने पर उभरे संकट

मैंने कभी कल्पना भी नहीं की थी कि इतनी पेशेवर कंपनी की अंदरूनी कलह भी कभी सार्वजनिक हो सकती है और रतन टाटा ने सख्त निर्णय लेते हुए उनकी धारक कंपनी के मुखिया साइरस मिस्त्री को एक ही झटके में पद से ही हटा दिया। उनकी जवाबदेही समझ में आती है, क्योंकि समूह पिछले कुछ समय से सही ढंग से कार्य नहीं कर पा रहा था, लेकिन इस तरह से अचानक व अप्रत्याशित तौर पर उन्हें पद से हटा देने के फैसले को किसी ने भी नहीं सराहा.


मैं हमेशा से जमशेदजी टाटा के प्रयासों को सराहता रहा हूं, क्योंकि भारत में इस्पात संयंत्र को स्थापित करने का श्रेय उन्हीं को जाता है। जिस दौर में उन्होंने यह कामयाबी हासिल की थी, तब तक अंग्रेजों को यही भ्रम था कि भारतीय केवल मिट्टी के बरतन ही बना सकते हैं। मैंने अपनी पहली नौकरी हासिल करने से लेकर जनरल मैनेजर बनने तक करीब दो दशक इस्पात क्षेत्र में ही कार्य किया। इस दौरान हमने उनकी कार्य पद्धति का बड़ी नजदीकी से अवलोकन किया, वहीं सार्वजनिक क्षेत्र की कार्य शैली को भी हमने उस दौरान समझा, जब हम इसमें सेवारत थे। इस पूरे आकलन के बाद हमने टाटा समूह की कार्य पद्धति को सराहा और यह अंतर भी पाया कि इसकी उत्पादकता सार्वजनिक क्षेत्र की अपेक्षा कहीं अधिक थी। कहना न होगा कि इस समूह के परिश्रम ने निजी क्षेत्र की दक्षता को उच्च स्थान पर स्थापित कर दिया। जब मैंने इस्पात उद्योग के मानकीकरण तय करने से संबंधित एक समिति की अध्यक्षता की, तो उस दौरान रुस्तमजी होमसजी मोदी ने एडी सिंह से उस समिति का सदस्य बनने की इच्छा जाहिर की। उस दौरान मैंने पाया कि उनके प्रशासन की कार्यशैली बेहद विवेकशील, ईमानदार व लागत नियंत्रण में प्रभावशाली थी। लेकिन एक अच्छी छवि होने के बावजूद वह उन लोगों से संपर्क स्थापित करने के रास्ते ढूंढ लेते थे, जो उनके लिए मायने रखते थे। कई विशेषज्ञों का ऐसा विश्वास रहा है कि प्रबंधन में कर्मचारियों की सहभागिता महज मौखिक सहानुभूति तक सीमित थी, असल में उन्होंने टे्रड यूनियनों को एक जेब यूनियन बना लिया था। इसमें कोई संदेह नहीं कि मान्यता प्राप्त यूनियन के साथ उनके बेहतर संबंध थे और यहां तक कि यूनियन के एक शीर्ष नेता को एक आलीशान बंगला उपहार स्वरूप भेंट किया था। एक बार मोहन कुमारमंगलम, तत्कालीन इस्पात मंत्री सार्वजनिक क्षेत्र में कर्मचारियों की भागीदारी सनिश्चित करना चाहते थे, तो उससे पहले उन्होंने मुझसे टाटा इस्पात समूह का अध्ययन करने को कहा। तब मैंने अध्ययन में पाया कि टाटा समूह में कर्मचारियों की सहभागिता का दावा महज एक छलावा था। ट्रेड यूनियनों के साथ छोटे-मोटे मामलों पर ही उनके साथ विचार-विमर्श किया जाता था, लिहाजा कर्मचारियों की प्रबंधन में कोई वास्तविक भागीदारी देखने को नहीं मिली। मैंने पहली मर्तबा राउरकेला इस्पात संयंत्र में कर्मचारियों की भागीदारी सुनिश्चित की, लेकिन जमशेदपुर में कहीं कोई स्वाभाविक भागीदारी देखने को नहीं मिली। टाटा समूह अपनी छवि को सुधारने के प्रति बेहद सतर्क रहा है। मुझे एयर इंडिया के निदेशक मंडल में जेआरडी रतन टाटा के साथ काम करने का भी मौका मिला, जो उस समय बोर्ड के चेयरमैन थे और मैं भी उसका एक सदस्य था। उनके साथ काम करते वक्त मेरा उनके पेशेवर व्यवहार के प्रति एक दृढ़ मत विकसित हुआ। कुछ दिन पूर्व टाटा समूह में जो कुछ भी घटित हुआ, वह हैरान करने वाला है।

मैंने कभी कल्पना भी नहीं की थी कि इतनी पेशेवर कंपनी की अंदरूनी कलह भी कभी सार्वजनिक हो सकती है और रतन टाटा ने सख्त निर्णय लेते हुए उनकी धारक कंपनी के मुखिया साइरस मिस्त्री को एक ही झटके में उनके पद से ही हटा दिया। टाटा ने स्वयं अपनी पसंद से उन्हें चुना था और उस दौरान भाव भंगिमा कुछ ऐसी थी कि तमाम तरह की चुनौतियों से जूझ रही इंडिका की मरम्मत के लिए उन्होंने एक 'मिस्त्री' की नियुक्ति कर दी है। उनकी जवाबदेही समझ में आती है, क्योंकि समूह पिछले कुछ समय से सही ढंग से कार्य नहीं कर पा रहा था, लेकिन इस तरह से अचानक व अप्रत्याशित तौर पर उन्हें पद से हटा देने के फैसले को किसी ने भी नहीं सराहा। इसमें कोई संदेह नहीं कि समूह में कई गंभीर समस्याएं पैदा हो रही थीं और इसके अधिग्रहण वाली कई कंपनियों का प्रदर्शन ठीक नहीं था। शायद इस दौरान कुछ गलत निर्णय भी लिए गए। अंतरराष्ट्रीय बाजार में इस्पात की मांग में भारी गिरावट आने से यूके स्थित कंपनी की गतिविधियां भी अनुकूल नहीं थीं।
ये तमाम कारक अंदर ही अंदर एक घुटन भरा माहौल तैयार कर रहे थे। सबसे खस्ता हालत विमानन क्षेत्र की है। जेआरडी टाटा को छोड़ दें, जिन्होंने एयर इंडिया की शुरुआत की थी और आगे चलकर भारत सरकार ने जिसका नियंत्रण अपने हाथों में ले लिया था, तो समूह के पास इस क्षेत्र में कोई खास दक्षता या पृष्ठभूमि नहीं रही है। यह सच है कि विमानन क्षेत्र का जेआरडी रतन टाटा में विशेष सम्मोहन रहा है और वह खुद भी एक प्रशिक्षित पायलट थे। पिछली सरकार ने सिंगापुर के साथ एक नई एयर लाइन शुरू करने के उनके आग्रह को दरकिनार कर दिया था। वह उस समय इस क्षेत्र में काफी अच्छा प्रदर्शन कर सकते थे, क्योंकि तब इंडिगो, स्पाइस जेट या जेट एयरबेस सरीखी कंपनियों से उन्हें स्पर्धा भी नहीं करनी पडऩी थी। इसके लिए सरकार के कानून भी बिलकुल स्पष्ट थे कि संगठन पर भारतीय निवेशकों का ही नियंत्रण रहेगा, भले ही विदेशी निवेश ज्यादा हो। एयर एशिया के मामले में दोनों ही पार्टियों की हिस्सेदारी 49 फीसदी थी, फिर भी इस पर मलेशियाई साझेदारों का ही नियंत्रण था। यह एक गैर कानूनी व्यवहार था, फिर भी मलेशियाई साझेदार हमेशा इसी बात का दावा करते रहे कि यह भारतीय नियंत्रण में है। साइरस मिस्त्री ने कई अहम दस्तावेज जारी किए हैं, जिनमें यह बात उजागर हुई है कि भारतीय कर्मचारियों पर किस तरह से मलेशियाई साझेदारों ने अपना नियंत्रण जमाया हुआ है। इससे कहीं बढक़र आरोप यह भी है कि निवेश कई तरह से संदेहास्पद है और इसमें 20 अरब रुपए कथित हवाला नेटवर्क के जरिए इसमें लगाए गए हैं, जिसकी प्रवर्तन निदेशालय छानबीन कर रहा है। ऑडिट में अब यह बात भी निकलकर सामने आई है कि पूर्व मुख्य कार्यकारी निदेशक धन का उपयोग निजी जरूरतों को पूरा करने के लिए करते रहे हैं और इस दौरान करीब 22 करोड़ रुपए का भुगतान उन कंपनियों को किया गया है, जो कि कहीं पंजीकृत ही नहीं थीं। भारत पहले ही इंडिगो सरीखी एयरलाइंस स्थापित कर चुका था, जिसने अपने गैर जरूरी खर्च नियंत्रित कर लिए थे। उस क्षेत्र में निवेश करने का कोई अर्थ नहीं है, जिसकी पृष्ठभूमि उथल-पुथल भरी और कार्य पद्धति पेशेवर नियमों के प्रतिकूल हो। यही वजह है कि इसके कई प्रमुखों ने अपने पद से इस्तीफा दे दिया है। व्हिस्टारा में निवेश की स्थिति में सुधार किया जा सकता था, क्योंकि सिंगापुर एयरलाइन बेहद पेशेवर और कार्यकुशल है। हालांकि अब भी टाटा को कम लागत के एयरलाइन क्षेत्र से पैसा निकाल कर व्हिस्टारा में ध्यान केंद्रित करना चाहिए। अपनी छवि के प्रति बहुत सचेत रहने वाले रतन टाटा ने इस पूरे प्रकरण में इसे धूमिल ही किया है। टाटा समूह के शेयरों के मूल्य में भी गिरावट दर्ज की गई है। साइरस मिस्त्री ने तो अपनी जड़ें जमाई हुई हैं, जो कि आज भी टाटा समूह की आठ कंपनियों के चेयरमैन हैं। आज जो यह खुला युद्ध छिड़ा हुआ है, वह उस संगठन को बड़ी क्षति पहुंचाएगा, जो अब तक दक्षता और नैतिकता के लिए एक प्रतीक के रूप में जाना जाता रहा है।

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