चित्त का चिन्तन ठीक हो, तो मनुज का हो उत्थान

  • 2018-02-12 10:13:41.0
  • विजेंदर सिंह आर्य

चित्त का चिन्तन ठीक हो, तो मनुज का हो उत्थान

बिखरे मोती-भाग 221
गतांक से आगे....
काश! ऐसा हो कि हम अपने आत्मस्वरूप को पहचानें और प्रभु प्रदत्त चित्त रूपी मानसरोवर जो प्रेम, प्रसन्नता शान्ति, क्षान्ति, क्षमा, धैर्य, सौहाद्र्र, संतोष, उदारता, वात्सल्य, स्नेह, श्रद्घा, समर्पण इत्यादि सद्भावों का जलाशय है। यदि मानव इस जलाशय में नित्य प्रति अवगाहन करेगा, इस जलाशय में गोता लगाएगा अर्थात चित्त के उपरोक्त दिव्य गुणों को आत्मसात करेगा, यानि कि आचरण में लाएगा तो उसे 'देवत्व' का मोती मिलना सुनिश्चित है। जिनके आचरण में ये दिव्य गुण होते हैं-उन्हें यह संसार 'देवता' कहता है, 'मसीहा' कहता है, फरिश्ता कहता है। इतना ही नहीं चित्त में जब इन दिव्य गुण की ऊर्मियां आचरण में भासती हैं तो भक्ति परवान चढ़ती है। ऐसा साधक भगवत्ता को प्राप्त हो जाता है। इसलिए मैं इतना ही कहूंगा-'सद्भाव में डूबोगे, तो देवत्व में जागोगे।'
चित्त का चिन्तन ठीक हो,
तो मनुज का हो उत्थान।
गर चिन्तन निकृष्ट हो,
तो डूब गया इन्सान ।। 1157।।
व्याख्या :-यदि मनुष्य के चित्त का चिन्तन ठीक है तो मनुष्य के जीवन का उत्कर्ष भी सुनिश्चित है और यदि मनुष्य के चित्त का चिन्तन बिगड़ गया तो उसका अपकर्ष अर्थात पतन भी अवश्यम्भावी है क्योंकि राष्ट्र और समाज का कार्य व्यक्ति नहीं, उसके सुसंस्कार करते हैं। मनुष्य का यह छोटा सा चित्त जहां आत्मा और परमात्मा के मिलन का केन्द्र है, वहां यह सम्वेदना, स्मृति और संस्कारों का आगार है। संसार में जितने भी महापुरूष हुए हैं, वे अपने सुसंस्कारों के कारण महान, बने तथा आने वाली पीढिय़ों के लिए प्रेरणास्रोत बने। दुर्बलता दुर्बलता कहने से सबलता नहीं आती, निर्धनता-निर्धनता कहने से सम्पन्नता नहीं आती, अन्याय-अन्याय का रोना रोने से न्याय नहीं मिलता, पर्वत का शिखर-शिखर कहने से पर्वत अपना शीश नहीं झुकाता है, अपितु इन सब पर तो विजय पताका वही फहराता है-जिसके सांसों में तूफान और हृदय में अर्थात चित्त में दृढ़ संकल्प, श्रम, साहस और स्वाभिमान के संस्कार होते हैं। इसलिए अपने आत्मस्वरूप को पहचानो, चित्त की प्रेरक शक्तियों को पहचानो और आगे बढ़ो, मंजिल आपके स्वागत में जयमाला लिए खड़ी है।
चेतन पुरूष के कारणै,
देह-कोश गतिशील।
हंस उडय़ो शोभा गई,
फिर नहीं क्रियाशील ।। 1158।।
व्याख्या:-चेतन पुरूष से अभिप्राय जीवात्मा से है। जैसे समुद्र में आकर सब नदियां एक हो जाती हैं, वैसे ही जीवात्मा में आकर सब इन्द्रियां, मन, बुद्घि, चित्त, अहंकार एक हो जाते हैं किन्तु ध्यान रहे इनकी शक्ति का स्रोत भी जीवात्मा ही है। इतना ही नहीं अपितु तीन शरीर-स्थूल शरीर, सूक्ष्म शरीर, कारण शरीर तथा पांच कोश-अन्नमय कोश, प्राणमय कोश, मनोमय कोश, विज्ञानमय कोश, आनन्दमय कोश की जड़ें मशीनरी भी जीवात्मा रूपी पावर हाउस की ऊर्जा से गतिशील रहते हैं। जैसे विद्युत के जाने पर शहर की चकाचौंध और शोर-गुल शान्त हो जाता है और कोई रौनक नहीं रहती है, ठीक इसी प्रकार इस शरीर रूपी कारखाने की विद्युत जाने पर अर्थात जीवात्मा के चले जाने पर सारा सौन्दर्य, रूप लावण्य, ओज और तेज सब कान्तिहीन तथा सब अंग-प्रत्यंग क्रियाशून्य हो जाते हैं। जो कल तक हाथ मिलाते थे और खिलखिलाकर हंसते हुए हाल चाल पूछते थे वे नजदीक आते हुए डरने लगे हैं। अत: जीवात्मा की शक्ति अत्यंत महिमाशाली है। क्रमश:

विजेंदर सिंह आर्य ( 334 )

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