प्रकृति की ओर लौटती खेती : समय की आवश्यकता

  • 2016-10-25 09:30:00.0
  • उगता भारत ब्यूरो

प्रकृति की ओर लौटती खेती : समय की आवश्यकता

रमेश शर्मा
हमें कृषि उन्नति और उत्पादन की विपुलता के लिए उन्हीं वस्तुओं का प्रयोग करना होगा, जो उस फसल के प्राकृतिक सहायक तत्त्व हैं। इसके बिना हम खेतों को खो देंगे और खेती को भी। यह दृश्य जब भारत में ही नहीं, पूरी दुनिया में देखने को मिल रहा है, इसीलिए पूरी दुनिया खेती के प्राकृतिक और परंपरागत तरीकों की ही ओर लौट रही है। पूरी दुनिया अब मान रही है कि यदि हमें उन्नत होना है, तो उन्हीं तरीकों को आधुनिक बनाना होगा, जिसमें मिट्टी के प्राकृतिक गुण, बीजों की क्षमता और प्राकृतिक परिवेश का तालमेल हो सके.

जीवन के आरंभ से ही जीव जिज्ञासु रहा है। यह उसकी जिज्ञासा और जरूरत ही है, जिससे प्रेरित होकर वह यात्राएं करता है, खोज करता है। यह खोज और यात्राएं धरती के भीतर भी और धरती के बाहर भी। जाने, अनजाने अथवा लक्ष्य साधकर किए गए सभी प्रयत्नों में अब प्रकृति के रहस्यों को समझने के अतिरिक्त प्रयास भी शामिल हैं, जिन्हें विज्ञान कहा गया। आरंभ काल के वैज्ञानिकों और भौतिकवादी विचारकों ने चाहे जो कहा हो, लेकिन अब विज्ञान ने मान लिया है कि प्राणी की क्षमता, समझ और सामथ्र्य बहुत सीमित है, जबकि प्रकृति की अनंत। यदि जीवन को सुखी एवं संतुष्ट बनाना है, तो जीवन शैली प्रकृति के अनुरूप ही होनी चाहिए। जीवन का यह आधारभूत सिद्धांत हर क्षेत्र में लागू होता है। कृषि और उद्यानिकी में भी। प्राकृतिक गुणों के अनुरूप खेती करने का नाम ही जैविक खेती है। आधुनिकता और विज्ञान के नाम पर कृषि क्षेत्र में बहुत ज्यादा प्रयोग हुए। इन प्रयोगों से तत्कालिक लाभ मिला, लेकिन दूरगामी नुकसान। असत्य से कभी सत्य सशक्त नहीं होता और न ही धारणाओं से संतोष मिलता है। जीव से ही जीव पुष्पित होगा। निस्संदेह जीव और निर्जीव दोनों साथ होते हैं, लेकिन यह साथ परस्पर सहायक के रूप में ही होता है। जैसे गेहूं और भूसा। यह भूसा गेहूं का सहायक है और गेहूं के साथ ही पैदा होता है। भूसा गेहूं का कवच है। भूसे के बिना गेहूं पैदा ही नहीं होगी, लेकिन भूसा बोने से न गेहूं पैदा होगी और न भूसा। भूसा निर्जीव है और गेहूं सजीव, इसीलिए बीज के रूप में गेहूं का ही संरक्षण होता है, प्रयोग होता है। इसका अर्थ हुआ कि हमें कृषि उन्नति और उत्पादन की विपुलता के लिए उन्हीं वस्तुओं का प्रयोग करना होगा, जो उस फसल के प्राकृतिक सहायक तत्त्व हैं। इसके बिना हम खेतों को खो देंगे और खेती को भी। यह दृश्य अब भारत ही नहीं, पूरी दुनिया में देखने को मिल रहा है, इसीलिए पूरी दुनिया खेती के प्राकृतिक और परंपरागत तरीकों की ही ओर लौट रही है। पूरी दुनिया अब मान रही है कि यदि हमें उन्नत होना है, तो उन्हीं तरीकों को आधुनिक बनाना होगा, जिनमें मिट्टी के प्राकृतिक गुण, बीजों की क्षमता और प्राकृतिक परिवेश का तालमेल हो सके। मिट्टी में अनंत अदृश्य जीव होते हैं, जो उसकी जीवंतता को बनाए रखते हैं। मिट्टी की यही जीवंतता उत्पादन का अनुपात बढ़ाती है। रासायनिक खाद और कीटनाशक को इससे कोई मतलब नहीं होता कि मिट्टी की मौलिकता क्या है। वह किस द्रव्य से आहत होती है और किस पदार्थ से पल्लवित। इसीलिए भारत ही नहीं, अमरीका जैसे आधुनिक और वैज्ञानिकता वाले देशों में लाखों एकड़ जमीन या तो बंजर हो रही है अथवा दलदल में बदल रही है। दुनिया इससे सतर्क हुई है और अभियान चला रही है कि खेती के लिए स्थानीय कारणों का ही उपयोग होना चाहिए और इसके लिए पहले मिट्टी की जांच हो। मौसम का अध्ययन हो, तब उसके अनुरूप खेती की जाए। मध्यप्रदेश और मध्यप्रदेश का नेतृत्व वह दूरदर्शी प्रांत और शासक है, जिसने दीवार पर उभरती भविष्य की इबारत पढ़ ली तथा अपने हरित क्रांति अभियान को जैविक खेती की ओर मोड़ा। मध्यप्रदेश में हरित क्रांति की बात तो इसके निर्माण से पहले दिन से की गई, लेकिन शुरुआती दौर में विदेशी क्षेत्र, रासायनिक खाद एवं कीटनाशक ही इस क्रांति आह्वान में आकर्षण का केंद्र थे, लेकिन अस्सी के दशक की शुरुआत में ही विशेषज्ञों को यह सत्य समझ में आ गया कि लगातार कीटनाशकों और रासायनिक खाद के प्रयोग से धरती की उत्पादन क्षमता गिर रही है। केवल उत्पादन बढ़ाने की स्पर्धा में यह ध्यान ही नहीं दिया गया कि जिन साधनों से हम बढ़ता उत्पादन देखकर खुश हो रहे हैं, वह दरअसल अस्थायी है और अंत में जमीन की समस्त उर्वराक्षमता को नष्ट करने वाला है। अब जाकर दुनिया के सोच में सुधार हुआ कि यदि धरती की उर्वरकता को चिर स्थायी रखना है, तो प्राकृतिक परंपरा के विकास के साथ ही आगे बढऩा होगा और यहीं से प्रकृति के स्वभाव का अध्ययन करके जैविक खेती का तरीका सामने आया। हमने जैविक खेती के बारे में कई बार सुना है, पढ़ा है, फिर भी एक प्रश्न उठना स्वाभाविक है कि आखिर यह जैविक खेती है क्या और इसका नाम जैविक खेती कैसे पड़ा। इसका सिद्धांत जीव के विकास में निहित है कि जीवन की वृद्धि में जीव भी सहायक होता है, भले ही वह दृश्य रूप में हो अथवा अदृश्य। जैसे बीज में जीव होता है, जो दिखता नहीं है, धरती से आसमान तक असंख्य जीव होते हैं। इन्हें वायरस, वैक्टीरिया अथवा सूक्ष्म कीटाणु कहते हैं। इनमें से कुछ सहायक होते हैं और कुछ खतरनाक। जो खतरनाक होते हैं, वे बीमारियां पैदा करते हैं। बीमारियां सबको होती हैं, पेड़-पौधे, जंतु, जानवर, मनुष्य सबको। एक लंबे अनुसंधान के बाद यह तलाशा गया कि आखिर फसलों के लिए कौन-कौन से जैविक तत्त्व सहायक होते हैं। उनकी सहायता लेकर खेती करने के काम को ही जैविक खेती कहा गया। यह ठीक है कि इसमें मेहनत ज्यादा लगती है, लेकिन लागत कम आती है। जिस प्रकार खेती के काम में लागत बढ़ रही है, उसे रोकने के लिए भी जैविक खेती जरूरी हो गई है। वह लागत तो कम करती है। साथ ही पर्यावरण की शुद्धता, जल व वायु की शुद्धता, भूमि का प्राकृतिक स्वरूप बनाने वाली, जल धारण क्षमता बढ़ाने वाली व धैर्यशील कृत संकल्पित होते हुए रसायनों का उपयोग आवश्यकता अनुसार कम से कम करते हुए कम लागत से दीर्घकालीन, स्थिर व अच्छी गुणवत्ता वाली खेती संभव बनाती है। इसमें रासायनिक उर्वरकों, कीटनाशकों तथा खरपतवारनाशियों के स्थान पर जीवांश खाद, पोषक तत्त्वों, गोबर की खाद, कंपोस्ट, हरी खाद, जीवाणु कल्चर, जैविक खाद आदि का इस्तेमाल किया जाता है। इसके अलावा जैवनाशियों (बायो-पैस्टीसाइड) व बायो एजेंट आदि का उपयोग किया जाता है। इससे न केवल भूमि की उर्वरा शक्ति लंबे समय तक बनी रहती है, बल्कि पर्यावरण भी प्रदूषित नहीं होता। कई अध्ययनों के अनुसार जैविक खेती में पारंपरिक खेती की तुलना में अधिक श्रम निवेश की आवश्यकता होती है।
इस प्रकार भारत जहां श्रम बेरोजगारी और अल्प रोजगार की बहुत बड़ी संख्या है, जैविक खेती को आकर्षण मिलेगा। इसके अलावा क्योंकि फसलों के विविधिकरण जैसे कि अलग-अलग रोपण और कटाई के तरीके, जिसके लिए और भी ज्यादा मजदूर लगते हैं, इससे बेरोजगारी की समस्या भी कम होती है। जैविक खेती से कई अप्रत्यक्ष लाभ किसानों और उपभोक्ताओं के लिए उपलब्ध हैं, जबकि उपभोक्ताओं को बेहतर, स्वादिष्ट और पोषक मूल्यों के साथ स्वस्थ आहार मिलता है। किसान परोक्ष रूप से स्वस्थ मिट्टी और कृषि उत्पादन वातावरण में लाभान्वित होते हैं। पारिस्थितिक पर्यटन तेजी से लोकप्रिय होता जा रहा है और इटली जैसे देशों में जैविक खेती पसंदीदा स्थलों में परिवर्तित हो गई है। पारिस्थितिक तंत्र, वनस्पति, जीव, बढ़ती जैव विविधता और मानव जाति के परिणामी लाभ के संरक्षण, जैविक खेती के महान लाभ हैं। इसके अलावा जैविक खेती से भूमि की उर्वरा शक्ति में टिकाऊपन बढ़ता है। जैविक खेती प्रदूषण रहित है और प्रकृति को नुकसान नहीं पहुंचाती। कम पानी की आवश्यकता होती है, क्योंकि पानी धारण की क्षमता बढ़ाती है। पशुओं का महत्त्व बना रहता है। फसल अवशेषों को खपाने की समस्या नहीं रहती। स्वास्थ्यवद्र्धक और अच्छी गुणवत्ता की पैदावार होती है। मित्र जीव सुरक्षित रहते हैं एवं उनकी संख्या में बढ़ोतरी होती है। स्वास्थ्य में सुधार होता है। लिहाजा खेती के इस कल्याणकारी विकल्प पर अब गंभीरता से विचार होना चाहिए।

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