बिखरे मोती-भाग 47

त्याग से जागै प्रेम रस, प्रेम से जागै त्यागजीवन के दो चरण हैं,एक धर्म एक ज्ञान।जो इनका पालन करे,एक दिन बने महान।। 597 ।। जग में धन तो तीन हैं,ज्ञान, समृद्घि, भाव।जो इनसे भरपूर है,उनका पड़े प्रभाव ।। 598 ।। नोट: शरीर को साधनों की समृद्घि चाहिए, जबकि आत्मा को ज्ञान और भावों की समृद्घि […]

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बिखरे मोती-भाग 45

साहसी पुरूष ही जगत में, करते ऊंचे काजगतांक से आगे….पति की सेवा में निहित,स्त्री का कल्याण।कटु भाषण करती नही,आये का राखे मान।। 590।। सृष्टि का कारण वही,वही है आदि अंत।पालक, रक्षक, रचयिता,सबसे बड़ा महन्त ।। 591।। अत्याचारी हो पति,शोकातुर रहै नार।सुख समृद्घि का नाश हो,उजड़ जाए संसार ।। 592।। मन, ज्ञान और इंद्रियां,प्रभु की अदभुत […]

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बिखरे मोती-भाग 43

कुलीन शील नही छोड़ता, अगणित हों चाहे द्वंद्व गतांक से आगे….सज्जनो की कर संगति,दुष्टों का कर त्याग।पुण्य कमा हरि नाम ले,जाग सके तो जाग ।। 570।। औरों का दुख देखकै,पिघलै ज्यों नवनीत।उसके हृदय हरि बसें,करते उसे पुनीत ।। 571।। पग-पग पर कांटे बड़े,कैसे निकला जाए?या तो उनको त्याग दे,या मुंह कुचला जाए ।। 572।। कांटे […]

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बिखरे मोती-भाग 42

दिल में कोई बस गया, तो दूर रहत भी पासगतांक से आगे….संक्षेप में कहा जाए तो आदिकाल से आज तक संसार का जितना भी बहुमुखी विकास हुआ है यह उन अन्वेषकों, विचारकों, वैज्ञानिकों, समाज सुधारकों और तत्ववेत्ताओं की ही महान देन है जिनके हृदय और मस्तिष्क में मानवता के लिए, प्राणीमात्र के कल्याण के लिए […]

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बिखरे मोती-भाग 41

सौंदर्य अंदर बसै, मूरख ढूंढ़े जग मांहिगतांक से आगे….अन्न जल और मीठे वचन,रत्न धरा पर तीन।अन्य पदारथ विश्व में,लगते हैं कान्तिहीन ।। 552 ।। मित्र भार्या सम्पदा,मिल जायें कई बार।लेकिन मुश्किल से मिले,मानव तन एक बार ।। 553 ।। आंखों में जिसके शर्म हो,वाणी में होय मिठास।मन में होय उदारता,जीत लेय विश्वास ।। 554 ।।उदारता […]

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बिखरे मोती-भाग 40

वर्तमान अनुकूल कर, अपने हित में मोड़ गतांक से आगे….सहस्र गायों के बीच में,बछड़ा मां ढिंग जाए।जैसा जिसका कर्म है,उसी के पीछे आय ।। 540 ।। आयु एक मुहूर्त की,पुण्य तै करे निहाल।पापी की क्या जिंदगी,बेशक जीये सौ साल ।। 541 ।। मुहूर्त अर्थात-48 मिनट का जीवन मिले। बीते पर मत शोक कर,भविष्य की चिंता […]

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बिखरे मोती-भाग 39

पिता ज्ञान मां सत्य है, बहन दया, भाई धर्मगतांक से आगे….तीरथ का फल देर में,साधु का मिलै तुरंत।मन निर्मल हो जात है,सुधरे आदि अंत ।। 532 ।। पिता ज्ञान मां सत्य है,बहन दया, भाई धर्म।शांति पत्नी पुत्र क्षमा,जान गया वह मर्म ।। 533 ।। जिस प्रकार कोई भी व्यक्ति अपने बंधु बांधव अथवा परिवार से […]

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बिखरे मोती-भाग 38

जन्म से पहले अन्न को, भेज देय भगवानगतांक से आगे….नीम को सींचे ईख से,तो भी मिठास न पाय।कितना ही समझा दुष्ट को,सज्जनता नही आय ।। 522 ।।भाव यह है कि किसी के मूल स्वभाव को बदलना अत्यंत कठिन है।ऊपर से कोमल रहे,अंदर से हो क्रूर।ऐसे बगुला भगत से,रहो दूर ही दूर ।। 523 ।। दुर्जन […]

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बिखरे मोती-भाग 37

अंत:करण में मल भरा, और वासना है प्रधानगतांक से आगे….उस व्यक्ति पर प्रभु की विशेष कृपा है। क्योंकि उपरोक्त ऐसे गुण हैं जो अभ्यास से नही अपितु मनुष्य के जन्म लेते ही उसके स्वभाव में आ जाते हैं। हथौड़ी पाहन तोड़ दे,बेशक होय महान।एक तेज के कारनै,व्यक्ति हो बलवान ।। 518।। भाव यह है कि […]

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बिखरे मोती-भाग 36

रैन काट पक्षी उड़े, सूना रह जाए नीडभिखारी शत्रु लोभी का,मूरख का गुणगान।चोरों का शत्रु चंद्रमा,कुल्टा का पति जान ।। 508।। बुद्घिहीन को ज्ञान दे,वृथा ज्ञान को खोय।बांस बसे चंदन निकट,खुशबू न वैसी होय।। 509।। बुद्घिहीन को व्यर्थ है,चारों वेदों का सार।जैसे अंधे को आइना,लगता है बेकार ।। 510।। गुदा न कभी मुख हो सके,चाहे […]

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