बिखरे मोती-भाग 44

कंगन शोभा न हाथ की, हाथ की शोभा दान व्यक्ति को जब ज्ञान, भक्ति और प्रेम की समन्वित पराकाष्ठा प्राप्त होती है तो देवत्व का जागरण होता है, जिससे भगवत्ता प्राप्त होती है। तब यह सात्विक तेज दिव्य आत्माओं के मुखमण्डल पर आभामण्डल (ORA) बनके छा जाता है। इसे ही सौम्यता कहते हैम, दिव्यता कहते […]

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बिखरे मोती भाग-52

चित चिंतन और चरित्र को, राखो सदा पुनीत भाव यह है कि प्रेम के बिना संसार के सारे रिश्ते ऐसे लगते हैं जैसे सूखा गन्ना। सूखा गन्ना शक्ल सूरत से तो बेशक गन्ना दिखाई देता है किंतु रस न होने के कारण वह अनुपयोगी हो जाता है। ठीक इसी प्रकार यदि सांसारिक रिश्तों में प्रेम […]

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बिखरे मोती – भाग 32

बुद्धिमान को चाहिए, छिपावै कुल का दोष जैसा लेकर भाग्य नर, आता इस संसार। सगे सहायक वैसे मिलें, जीविका कारोबार ॥467॥ कालचक्र तब भी चले, जब सोता इंसान। समा गए सब गर्भ में, काल बड़ा बलवान ॥468॥ जन्मांध और कामान्ध को, कुछ न दिखाई देय। भला बुरा दिखता नहीं, स्वार्थी को दीखै ध्येय ॥469।। कर्मों […]

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ओउम नाम की नाव से, तरे अनेकों संत

आधी बीती नींद में, कुछ रोग भोग में जाए। पुण्य किया नहीं हरी भजा, सारी बीती जाए ॥415॥ धर्म कर्म का उपार्जन, खोले सुखों के द्वार। इनमें मत प्रमाद कर, कल खड़यो है त्यार ॥416॥ रसों में रस है ब्रह्मा रस, रोज सवायो होय। जितना हो रसपान कर, सारे दुखड़ा खोय ॥417॥ पग-पग पर यहाँ […]

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बिखरे मोती भाग-54

ऐसे जीओ हर घड़ी, जैसे जीवै संतगतांक से आगे…. ऐसे जीओ हर घड़ी,जैसे जीवै संत।याद आवेगा तब वही,जब आवेगा अंत ।। 630 ।। प्रसंगवश कहना चाहता हूं कि ‘गीता’ के आठवें अध्याय के पांचवें श्लोक में भगवान कृष्ण अर्जुन को समझाते हुए कहते हैं, हे पार्थ!

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बिखरे मोती भाग-53

दिव्यता से सौम्यता मिलै, ये साथ चले श्रंगारगतांक से आगे….सजा सके तो मन सजा,तन का क्या श्रंगार।दिव्यता से सौम्यता मिलै,ये साथ चले श्रंगार ।। 628 ।। भावार्थ यह है कि अधिकांशत: लोग इस नश्वर शरीर को ही सजाने में लगे रहते हैं जबकि उनका मन छह विकारों काम, क्रोध, लोभ, मोह, अहंकार और ईष्र्या तथा […]

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बिखरे मोती भाग-51

चित चिंतन और चरित्र को, राखो सदा पुनीत गतांक से आगे….यदि गंभीरता से चिंतन किया जाए तो आप पाएंगे कि परमात्मा ने मनुष्य को ज्ञान और प्रेम से अलंकृत कर इस सृष्टि में अपने प्रतिनिधि के रूप में भेजा है। ज्ञान यदि इस समष्टि का मस्तिष्क है तो प्रेम इसका हृदय है। इन दोनों के […]

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बिखरे मोती भाग-50

कितने असली नकली हो, जानै जाननहार गतांक से आगे…. पश्चिम दिशा में अस्तांचल में अवसान के समय भी अपने यश की अरूणाई को, तेजस्विता को एक पल के लिए भी छोड़ता नही है। भाव यह है कि सूर्य अपने यश और तेज के साथ उत्पन्न होता है और यश और तेज के साथ ही शाम […]

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बिखरे मोती-भाग 49

महापुरूष संसार में, परमपिता के फूलगतांक से आगे….आप प्रसन्न हैं तो संसार का धन वैभव ऐश्वर्य तो स्वत: ही मेरे पीछे पीछे दौड़ा आएगा और यदि आप किसी बात पर नाराज हो गये तो सब कुछ मिल हुआ भी छिन जाएगा। जैसे कोई पिता अपने पुत्र के आचरण से प्रसन्न होता है तो वह सहज […]

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बिखरे मोती-भाग 48

प्रेम के कारण हरि सुनै,भक्तों की अरदासप्रेम ही श्रद्घा प्रेम समर्पण,पे्रम बसै विश्वास।प्रेम के कारण हरि सुनै,भक्तों की अरदास ।। 603।। रिश्ते प्रेम से ठहरते,बिना प्रेम कुम्हलाय।प्रेम नीर की बूंद तै,पुनि-पुनि ये मुस्काय ।। 604।। प्रेम जीवन का प्राण है,प्रेम में है आनंद।प्रेम तत्व से ही मिलै,पूरण परमानंद ।। 605।। प्रेम तत्व के सूत्र में,बंधा […]

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