राजा द्वारा चिंतनीय बातें, भाग-5

  • 2016-10-08 11:30:27.0
  • राकेश कुमार आर्य

राजा द्वारा चिंतनीय बातें, भाग-5

यह प्रक्रिया प्राकृतिक नियमों और प्राकृतिक न्याय के भी विरूद्घ है। जहां माता-पिता या आचार्य हर बात पर बच्चे को दण्ड देना आरंभ कर देते हैं, वहां बच्चा बच्चा न रहकर भीतर ही भीतर बड़ा (अहंकारी) बन जाता है। उसका अहंकार ही उसे एक दिन माता-पिता या आचार्य के प्रति विद्रोही बना देता है। जब बच्चे को हम पहली गलती पर डांटते हैं तो वह भीतर ही भीतर हमारी डांट को नाप तौल कर देखता है। वह देखता है कि मुझसे तो यह गलती अनजाने में हो गयी इस पर इतनी डांट तो नही पडऩी चाहिए थी? बच्चा अपना न्यायाधीश और अपना वकील स्वयं ही बन जाता है और अपने पक्ष में निर्णय भी कर लेता है। उसका यह निर्णय कई बार ठीक भी होता है और हम देखते हैं कि यदि बच्चा के पास ऐसे दो-चार निर्णय एकत्र हो जाएं-जिनमें वह स्वयं को निर्दोष मानता था तो वह बच्चा अपने माता-पिता या आचार्य को 'अन्यायी' मानना आरंभ कर देता है। यह सोच एक दिन उसे माता-पिता और आचार्य के विरूद्घ विद्रोही बनाती है। यही कारण है कि बच्चों को सही रास्ते पर लाने के लिए मनु साम, दाम, और भेद की नीति को अपनाने की बात कह गये हैं। हां, जब इनसे काम न चले तो फिर उसे दण्ड देना चाहिए। दण्ड को अधम मानते हुए चौथे स्थान पर रखा गया है। इसका कारण यह है कि पहली तीन स्थितियों को अपने विरूद्घ अपनाते-अपनाते देखकर बच्चा माता पिता की या आचार्य की मजबूरी को समझ लेता है कि अब ये दण्ड देने की स्थिति में क्यों आ गये हैं?


इस समय एक बच्चा (जिन्हें लुटेरे या डकैत के संदर्भ में भी देख सकते हैं) की अंतरात्मा उसे यह बताने लगती है कि दोष तेरा है और अब तुझे दण्ड मिलना ही चाहिए। एक प्रकार से पूर्व में की गयी गलतियों पर आपसे दण्ड पाकर जो बच्चा आपसे विद्रोही हो रहा था अब वही आपसे दण्ड पाकर भी सहयोगी हो रहा है। यह मनोविज्ञान का प्रभाव है। इसी मनोविज्ञान को समझकर ही मनु महाराज ने हमारे लिए साम, दाम भेद और दण्ड की स्थितियों का वैदिक विधान किया।

साम, दाम, भेद और दण्ड की इस स्वाभाविक और प्राकृतिक व्यवस्था में जो लोग आस्था रखते हैं, उनसे उनके विद्रोही भी सहमत हो जाते हैं। इसका ज्वलंत उदाहरण कश्मीर के अलगाववादियों के प्रति अपनायी गयी वर्तमान सरकार की नीति है। साम-दाम के लिए हमारे नेताओं ने कश्मीरी आतंकियों के सामने प्रस्ताव रखे। हमारा सर्वदलीय प्रतिनिधिमंडल केन्द्रीय गृहमंत्री राजनाथसिंह के नेतृत्व में वहां गया जिससे कि शांति-व्यवस्था स्थापित हो सके। सरकार की नीयत दिख रही थी कि वह देश की संप्रभुता को नष्ट न होने देने के लिए कृतसंकल्प है, उससे नीचे ये कश्मीरी अलगाववादी जो चाहें सो ले लें। सरकार की इस सदिच्छा का सम्मान उसके विरोधियों ने भी किया और हमने देखा कि असहयोगी भी सहयोगी का काम करने लगे।

यह मनुवाद की जीत है और मनुवादी व्यवस्था की जीत है। आवश्यकता सकारात्मकता के साथ सोचने और समझने की है। 'राजा' को इन डाकू लुटेरों को या अलगाववादियों को समाप्त करने में अत्यंत सावधानी बरतनी चाहिए। मनु महाराज की व्यवस्था है :-
यथोद्वरति निर्दाता कक्षंधान्यं च रक्षति।
तथा रक्षेन्नृपो राष्ट्रं हन्याच्च परिपन्थिन:।।
।। 110 ।। (84)

अर्थात ''जैसे धान्य का निकालने वाला छिलकों को अलग कर धान्य की रक्षा करता और टूटने नही देता है वैसे राजा डाकू चोरों को मारे तथा राज्य की रक्षा करे। '' (स.प्र. 153)
इतनी सावधानी का प्रयोग करने की सलाह देने वाले मनु को वास्तविक लोकतांत्रिक सोच का महामानव माना जाना चाहिए। मनु इतनी सावधानी बरतने की सलाह क्यों दे रहे हैं? वह क्यों नही कह देते कि राजा को ऐसे डाकू-लुटेरों के निवासों को या आश्रम स्थलों को या ग्रामों को तोपों से उड़ा देना चाहिए। मनु ऐसा इसलिए नही कह रहे हैं कि ऐसा करने से निर्दोषों की हत्या हो सकती है। पर हमारे मनु विरोधी भाइयों को देखिए- वे मुगलों के और अंग्रेजों के भारतीय लोगों पर ढहाए जाने वाले अमानवीय अत्याचारों को तो लोकतांत्रिक मानते हैं, और एक भी निर्दोष की हत्या की अनुमति न देने वाले मनु को अलोकतांत्रिक मानते हैं? क्या कमाल है-अनोखे और बेमेल निष्कर्षों का?

मनु का मानना है कि राजा राज्य की अर्थात राष्ट्र की रक्षा करे और चोर डाकुओं का सफाया करे, पर सफाया करने में इतनी सावधानी का प्रदर्शन करे कि निर्दोष लोगों को कोई कष्ट ना हो जाए। इसके लिए मनु उदाहरण भी कितना अच्छा देते हैं कि जैसे धान्य का निकालने वाला छिलकों को अलग कर धान्य की रक्षा करता है और उन्हें टूटने नही देता है, वैसे ही राजा अलगाववादियों और व्यवस्था से विद्रोह करने वालों या चोर डाकुओं का दमन करने के लिए उनके विरूद्घ सरकारी नीति अपनाये। वह ध्यान रखे कि प्रजाशोषकों का अंत हो जाए, पर प्रजा को कष्ट ना हो। क्योंकि प्रजाशोषकों का सफाया करना राजा का धर्म है। जो राजा अपने राज्य में अपने इस धर्म का सत्यनिष्ठा से निर्वाह करता है उसका राज्य वास्तविक शांति का अनुभव करता है। ऐसे राज्य में ही लोग अमनचैन से रहते हैं और परस्पर भ्रातृभाव अपनाते हुए वास्तविक अपनत्व का प्रदर्शन करते हैं। क्रमश:

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राकेश कुमार आर्य ( 1586 )

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