राजा द्वारा चिंतनीय बातें, भाग-4

  • 2016-10-07 09:30:34.0
  • राकेश कुमार आर्य

राजा द्वारा चिंतनीय बातें, भाग-4

राजा सिंहवत पराक्रमी हो
मनु कहते हैं :-
बकवच्चिन्तयेदर्थान्सिहवच्च पराक्रमेत।
वृकवच्चावलुक्पेत शशवच्च विनिष्पतेत् ।।107।।
''जैसे बगुला ध्यानावस्थित होकर मच्छी के पकडऩे को ताकता है वैसे अर्थ संग्रह का विचार किया करे, द्रव्यादि पदार्थ और बल की वृद्घि पर शत्रु को जीतने के लिए सिंह के समान पराक्रम करे, चीते के समान छिपकर शत्रुओं को पकड़े और समीप में आये बलवान शत्रुओं से सुस्से अर्थात खरगोश के समान दूर भाग जाए और पश्चात उनको छल से पकड़े।'' (स.प्र. 152)
इस श्लोक में कहा गया है कि राजा को बगुला की भांति ध्यान लगाकर अर्थ संग्रह पर विचार करना चाहिए। बगुला जब तक मछली को पकड़ नही लेता है तब तक ध्यानावस्थित रहता ही है। ऐसी ही मुद्रा में ध्यानावस्थित होकर राजा को भी जनकल्याण की योजनाओं की सफलता के लिए अर्थ संग्रह पर विचार करना चाहिए। राजा को निरंतर कर बढ़ाने की स्थिति उत्पन्न नहीं करनी चाहिए, अपितु यह चिंतन करना चाहिए कि ऐसे कौन से स्रोत हो सकते हैं जिनसे जनकल्याणकारी योजनाओं को पूर्ण किया जा सके और जनता पर कोई अतिरिक्त कर भी न लगाना पड़े?

राजा को सिंह के समान पराक्रमी होना चाहिए। राष्ट्र की एकता और अखण्डता को तार-तार करने वाली शक्तियां राज्य में उत्पात मचाती हैं, आतंकी घटनाएं करती हैं, बाहरी शत्रु हमेशा हमें तोडऩे और समाप्त करने की योजनाएं बनाता है, उनकी हवा निकालने के लिए राजा का पराक्रमी होना नितांत आवश्यक है। आतंकियों और देश की एकता और अखण्डता से खिलवाड़ करने वालों के विरूद्घ राजा को चीते के समान छिपकर उन्हें नष्ट करने की योजना बनानी चाहिए। हमें स्मरण रखना चाहिए कि आजकल भी सिंह के समान पराक्रमी को 'लायन' कहकर या 'शौर्य चक्र' देकर सम्मानित किया जाता है और अपने शत्रु पर छिपकर तीव्रता से हमला करने वाले सैनिक को सम्मानवश 'टाईगर' कह दिया जाता है। यह परंपरा हमारे वैदिक कालीन ऋषियों और मनु की देन नहीं है तो और किसकी देन है?

इस श्लोक में शत्रु को छल से पकडऩे की बात भी कही गयी है। इससे लगता है कि मनु ने इससे पूर्व जहां राजा की छल-कपट से दूर रहने की बात कही है वहीं इस श्लोक में उसे छली-कपटी बनने की बात कहकर विरोधाभास उत्पन्न कर दिया है। परंतु ऐसा नहीं है। शत्रु यदि शक्तिशाली है और उसका उद्देश्य आपको नष्ट करना है तो उसके प्रति छल-कपट भी न्याय संगत है। क्योंकि आप अपने देश का विनाश कराते रहें और धर्म व संस्कृति मिटवाते रहें-इससे उत्तम है कि अपने शत्रु को ही मिटा डालें।

डाकू लुटेरों के प्रति नीति
राजा की अपने राज्य में डाकू लुटेरों के प्रति कैसी नीति हो? इस पर भी मनु महाराज ने स्पष्ट किया है, वह लिखते हैं :-
एवं विजय मानस्य ये अस्य स्यु: परिपन्थिन:।
तानानयेद्वशं सर्वान्सामादिभिरूपक्रमै: ।। 107।।
''इस प्रकार विजय करने वाले सभापति के रूप में जो परिपंथी (राहजनी करने वाले) अर्थात डाकू लुटेरे हों उनकी साम=मिला लेना, दाम=कुछ देकर, भेद=तोडफ़ोड़ करके वश में करे।''
(स.प्र. 153)

परिपंथी शब्द से ही 'राहजनी' शब्द बन गया है। ऐसे लोग समाज में अशांति, उपद्रव और आतंक फैलाते हैं। लोगों का देर-सवेर अपने कार्यों के लिए निकलना तक दूभर कर देते हैं। इसलिए राजा इन्हें साम, दाम, दण्ड, भेद से किसी भी प्रकार से नियंत्रण में रखे और जनसामान्य के जीवन में किसी प्रकार का भय ना रहे-इस बात की पूर-पूरी व्यवस्था करे। स्वतंत्र भारत में ऐसे कितने ही लुटेरे व डाकू हुए हैं, जिन्हें सरकार ने साम-दाम से ही सही रास्ता दिखा दिया। वास्तव में साम दाम का प्रयोग इन लोगों के प्रति उचित है, क्योंकि इस रास्ते पर व्यक्ति को कई बार पारिवारिक तो कई बार सामाजिक परिस्थितियां भी धकेल देती है। 'साम-दाम' का प्रयोग करने की शिक्षा देकर मनु महाराज राजा या सरकार से यह अपेक्षा करते हैं कि किसी भी व्यक्ति की पारिवारिक और सामाजिक परिस्थितियों का पता लगाया जाए, और यदि उसकी पारिवारिक और सामाजिक परिस्थितियां प्रतिकूल हैं तो उसे सही रास्ते पर लाने का प्रयास किया जाए। आप फूलन देवी का उदाहरण ले सकते हैं -उनकी सामाजिक परिस्थितियां उनके विपरीत थीं तो बाल्मीकि जी की पारिवारिक परिस्थितियों ने उन्हें कुमार्ग पर धकेल दिया था। ऐसे लोगों को जीवन जीने का सम्मान मिलना ही चाहिए। आजकल भी हमारी सरकारें लुटेरों और डाकुओं को सामूहिक क्षमा देने की नीति अपनाती हैं। हां, जो इस प्रकार की नीति से भी सही रास्ते पर नहीं आता है उसके विरूद्घ भेद और दण्ड की नीति अपनायी जाती है। यदि इन उपायों से भी ये लुटेरे और डाकू वश में न आयें तो राजा को अत्यंत कठोर दण्ड के द्वारा इन्हें वश में करने की नीति अपनानी चाहिए। मनु की व्यवस्था है :-
यदि ते तु न तिष्ठेयुरूपायै:प्रथमैस्त्रिभि:।
दण्डेनैव प्रसहयैतांश्छनकैर्वश मानयेत्।।
।। 108।। (83)

''यदि वे शत्रु, डाकू, चोर आदि पूर्वोक्त साम,-दाम, भेद इन तीन उपायों से शांत न हों या वश में न आयें, तो राजा इन्हें दण्ड के द्वारा ही बलपूर्वक सावधानी पूर्वक वश में लायें।''
''और जो इनसे वश में न हों तो अतिकठिन दण्ड से वश में करें।'' (स.प्र. 153)
दण्ड को हमारे नीति शास्त्रज्ञों ने अंतिम उपाय माना है। आजकल घर-समाज और देश में इसलिए भी अशांति है कि हम साम, दाम, भेद को न अपनाकर सीधे चौथी सीढ़ी पर जा बैठते हैं और हर किसी को दंडित करने की ठान लेते हैं।
क्रमश:

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राकेश कुमार आर्य ( 1580 )

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