राजा द्वारा चिंतनीय बातें, भाग-3

  • 2016-10-06 12:30:34.0
  • राकेश कुमार आर्य

राजा द्वारा चिंतनीय बातें, भाग-3

'राजधर्म' को लेकर मनु महाराज ने इस श्लोक में भी बड़े पते की बात कह दी है। उन्होंने कहा है कि 'राजा' स्वयं छली कपटी ना हो-वह दूसरों के साथ छल-कपट का व्यवहार करने वाला ना हो। निष्कपट रहकर सबके साथ व्यवहार करने वाला हो। परंतु इस निश्छलता और निष्कपटता का अभिप्राय यह भी नहीं कि वह दूसरों के छल-कपट को जानता ही ना हो, या जान ही न पावे या दूसरा छली-कपटी राजा यदि उसके एक गाल पर चांटा मारे तो वह 'प्यार' की चपत खाने के लिए सम्मान के साथ दूसरा गाल भी सामने कर दे। इसके विपरीत राजा दूसरे के छल-कपट को जानने वाला हो और उसके छल-कपट का जैसे को तैसा उत्तर देने वाला भी हो। मनु की यह व्यवस्था भी एक व्यावहारिक सत्य है। यदि राजा निष्कपट या निश्छल होकर राज करता रहेगा और दूसरों के छल-कपट का उत्तर उसी की भाषा में देने में असमर्थ और असफल होगा तो कोई लाभ उससे मिलने वाला नहीं है। राजा के ऐसे व्यवहार व आचरण से राष्ट्र की हानि ही अधिक होगी। राजा इतना चतुर और सूक्ष्म बुद्घि वाला हो कि छली-कपटी शत्रु और मित्र दोनों की चालों को समझने वाला हो।


राजनीति के लिए कहा जाता है कि इसमें कोई किसी का स्थायी मित्र या शत्रु नहीं होता। वास्तव में राजनीति में ना मित्रता की जाती है और ना ही किसी से शत्रुता की जाती है। राजनीति में सब अपने कूटनीतिक और गुप्त एजेंडा पर कार्य करते हैं, और उस एजेंडा को लागू करने के लिए तात्कालिक आधार पर कोई अपना मित्र ढूंढते हैं या समय के अनुसार कोई अपना शत्रु बना लेते हैं। राजा या राष्ट्र नायक को अपना कूटनीतिक गुप्त एजेंडा (अपने राष्ट्रहित) तैयार करके रखना चाहिए और अपने मित्रों के गुप्त एजेंडा को सदा खोजते रहना चाहिए कि वह किस गुप्त एजेंडा पर काम कर रहा है? ऐसी खोजी प्रवृत्ति के मेधा संपन्न राजा को कभी भी किसी प्रकार से कोई क्षति नहीं उठानी पड़ती है। इस विषय में महर्षि मनु का कथन है :-
नास्य छिद्रं परोविद्याद्विद्याच्छिद्रं परस्य तु।
गूहेत्कर्म इवांगानि रक्षेद्विरमात्मन:।।
।। 105 ।। (80)

''कोई शत्रु अपने छिद्र अर्थात निर्बलता को न जान सके और स्वयं शत्रु के छिद्रों को जानता रहे जैसे कछुआ अपने अंगों को गुप्त रखता है वैसे शत्रु के प्रवेश करने के छिद्र को गुप्त रखे।'' (स.प्र. 152)
राजा को स्वयं का छिद्रान्वेषी अर्थात अपनी त्रुटियों और दुर्बलताओं को जानने वाला होना ही चाहिए। जब हम अपनी त्रुटियों या दोषों को जानने की बात कहते हैं तो इसका अभिप्राय न केवल अपनी सैनिक त्रुटियों या दोषों को जानने से है-अपितु इसका अभिप्राय अपनी सामाजिक विसंगतियों को जानने से भी है। जैसे समाज में समान शिक्षा, समान स्वास्थ्य सेवाएं और सामाजिक आर्थिक एवं राजनीतिक न्याय प्राप्त करने के सबको समान अवसर उपलब्ध नहीं हैं तो अपने बीच से ही 'जयचंद और मीरजाफर' खड़े होने की प्रबल संभावना होती है। अत: राजा को अपने समाज में सर्वस्व समानता का भाव करते हुए समतामूलक समाज के निर्माण की दिशा में ठोस कार्य करना चाहिए।

राजा यदि यह जानता भी है कि मेरे निर्णय से अमुक संप्रदाय या वर्ग या जाति आदि के लोग तो असहमत ही होंगे तो भी उसे शत्रु राजा को यही अनुभूति करानी चाहिए कि सारा देश मेरे साथ है। जैसे मोदी प्रधानमंत्री के रूप में सदा यही कहते हैं कि-''मेरे 125 करोड़ देशवासी बहनों और भाईयों-.....।'' हर राष्ट्रनायक को ऐसी ही भाषा का प्रयोग करना चाहिए। पर वह शत्रु पर सदा दृष्टि गड़ाये रखे कि यह किधर से और कहां से मेरे देश को क्षति पहुंचा सकता है? इतना ही नहीं उसे युद्घ के लिए स्वयं उन्मादी ना होकर शत्रु की चालों को असफल करने के लिए युद्घ के लिए भी तैयार रहना चाहिए।
अपनी अग्रिम सैनिक चौकियों पर आधु निकटतम सुविधाएं हैं कि नहीं और यदि युद्घ होता है तो हमारे सैनिकों तक आधुनिकतम युद्घ सामग्री पहुंचने में कितना समय लगेगा? इत्यादि बातों को 'राजा' या राष्ट्रनायक समझने वाला हो।

हम मानते हैं कि एक राष्ट्रनायक के लिए ये सब बातें यद्यपि उसके देश के संविधान में लिखी नहीं जाती हैं पर हर सफल राजनेता इन सब बातों का ध्यान रखता है। इस पर भी हमारा यही मानना है कि प्रथम तो ये सारी बातें संविधान द्वारा घोषित राजधर्म में लिखित होनी चाहिएं, दूसरे आज की विश्व राजनीति के सफलतम राजनीतिज्ञों को मनुवादी घोषित करना चाहिए। कारण कि उनकी सफल नीतियों के पीछे हमारे मनु की सफल राज्यव्यवस्था के सफल सूत्र ही उसका मार्गदर्शन करते रहे हैं। यह अलग बात है कि वह सफल राजनेता हमारे मनु को अपनी नीतियों में कहीं खोज नहीं पाया। पर क्या उसकी अज्ञानता या भाषायी सीमाओं के कारण या मजहबी पूर्वाग्रहों के कारण यदि उसे सही जानकारी मनु के विषय में नहीं मिल पायी तो इसे हम अंतिम सत्य भी तो नहीं मान सकते कि वह सफल तो हो गया पर मनु के कारण नहीं-किसी अन्य के कारण सफल हुआ? गणित का सूत्र तो एक ही होता है, उसे प्रयोग करके विश्व के हर कोने का व्यक्ति प्रश्नों के उत्तर खोज लेता है।

यह अलग बात है कि उसे उस सूत्र के जन्मदाता किसी वैज्ञानिक गणितज्ञ या ऋषि का ज्ञान नही है। इसके उपरांत भी उस सूत्र से प्रश्नों के उत्तर खोजने वाला हर व्यक्ति उस सूत्र से प्रश्नों के उत्तर खोजने वाला हर व्यक्ति उस सूत्र के जन्मदाता का ही अनुयायी कहा जाएगा। कहने का अभिप्राय है कि मनु के सिद्घांतों को अपनाकर सफल होने वाला व्यक्ति भी उसी प्रकार मनु का अनुयायी है जिस प्रकार गणित के प्रश्नों का उत्तर किसी सूत्र से खोजने वाला विद्यार्थी स्वयं ही उस सूत्र के जनक का अनुयायी घोषित हो जाता है।
क्रमश:

राकेश कुमार आर्य ( 1582 )

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