राजा द्वारा चिंतनीय बातें, भाग-2

  • 2016-10-05 12:30:51.0
  • राकेश कुमार आर्य

राजा द्वारा चिंतनीय बातें, भाग-2

विशेषत: पाक अधिकृत कश्मीर और चीन द्वारा पूर्वोत्तर की ओर बलात कब्जायी गयी हमारी भूमि के संदर्भ में यह व्यवस्था आज भी अक्षरश: लागू होती है। इस अलब्ध भूमि को दण्ड से अर्थात 'डण्डा' से प्राप्त करना हमारा राष्ट्रीय अधिकार भी है और राष्ट्रीय कत्र्तव्य भी है। कुल मिलाकर चाहे यह विचार महर्षि दयानंद से हमें मिला है-पर मूल रूप में तो यह विचार महर्षि मनु का है। स्पष्ट है कि देश की राज्य व्यवस्था के लिए ही नही मनु देश की सीमाओं की रक्षा के संदर्भ में भी प्रासंगिक हैंै। निश्चय ही देश की सीमाओं की रक्षा पराक्रम से ही संभव है। इसलिए राजा को पराक्रमी बनने का परामर्श देते हुए उसके लिए अनिवार्य व्यवस्था करते हुए महर्षि मनु लिखते हैं :-

नित्यमुद्यतदण्ड: स्यान्नित्यं विवृतपौरूष:।
नित्यं संवृत संवार्यो नित्यं छिद्रानुसार्यरे :।। 102 ।।
''राजा सदैव न्यायानुसार दण्ड का प्रयोग करने में तत्पर रहे, सदैव पराक्रम दिखाने के लिए तैयार रहे, सदैव राज्य के गोपनीय कार्यों को गुप्त रखे सदैव शत्रु के छिद्रों=कमियों को खोजता रहे और उन त्रुटियों को पाकर अवसर मिलते ही अपने हित को चतुराई से पूर्ण कर ले।''

राजा के न्यायानुसार दण्ड देने की व्यवस्था पर तो हम पूर्व में प्रकाश डाल चुके हैं। यहां शब्द 'पराक्रम' विशेष रूप से उल्लेखनीय है। देश की एकता और अखण्डता की रक्षार्थ देश के राजनीतिज्ञों की आचार संहिता में इस शब्द को स्थान देना आवश्यक है। क्योंकि किसी राज्य व्यवस्था को सुचारू रूप से चलाने के लिए 'राजा' का पराक्रमी होना आवश्यक है। पराक्रम का अर्थ है कि आपके शौर्य और वीरता के सामने अगला देश अपने सारे दांव भूल जाए। जैसे आजकल पाकिस्तान की स्थिति बन गयी है। भारत के पराक्रमी नेतृत्व के सामने पाकिस्तान इस समय असहाय है। कल तक वह हमारी कश्मीर को लेने की बातें करता था-पर आज उसे अपना बलूचिस्तान और सिंध अपने साथ लेकर चलना कठिन हो रहा है। शत्रु को अपने घर में उलझाकर रख दिया गया है। इधर भारत का सारा विपक्ष और जन-जन भारत सरकार के साथ खड़ा दिखाई दे रहा है। इससे भारत में एक 'सामूहिक पराक्रमी नेतृत्व' की बड़ी ही सुखद अनुभूति हो रही है। अलब्ध राज्य (पाक अधिकृत कश्मीर) की प्राप्त की इच्छा जितनी तीव्र आज है इतनी अब से पूर्व हमारे नेतृत्व में कभी नही थी। अलब्ध की प्राप्ति की इच्छा से सारा देश आज पराक्रमी हो उठा है। इसका अभिप्राय है कि अलब्ध की प्राप्ति की इच्छा राज्यव्यवस्था का एक अनिवार्य अंग है, जिसे वह अपने नेतृत्व पर आवश्यक रूप से अनिवार्य शर्त बनाकर आरोपित करती है। यह पराक्रमी नेतृत्व देश को विश्व में सम्मान दिलाता है।

मनु महाराज कहते हैं :-
नित्यमुद्यत दण्डस्य कृत्स्नमुद्विते जगत्।
तस्यात्सर्वाणि भूतानि दण्डेनैव प्रसाधयेत: ।। 103 ।।
''अर्थात जिस राजा के राज्य में सर्वदा दण्ड के प्रयोग का निश्चय रहता है तो उससे सारा जगत भयभीत रहता है। इसीलिए सब प्राणियों को दण्ड से साधे अर्थात दण्ड के भय से अनुशासन में रखो।''
अपनी बात के स्पष्टीकरण में हमें महाभारत के उस प्रसंग को स्मरण करना चाहिए जब दुर्योधन ने राजा विराट की गौओं का हरण जा किया था और उधर से हस्तिनापुर की सेना का सामना करने के लिए विराट राजा का लडक़ा उत्तर कुमार वृहन्नला बने अर्जुन के साथ युद्घ करने के लिए चल पड़ा था। तब हस्तिनापुर की विशाल सेना को देखकर उत्तर कुमार को तो पसीना आ गया था, परंतु अर्जुन को युद्घ करना पड़ गया था।

अर्जुन ने अपना 'वृहन्नला' स्वरूप समाप्त किया और विराट नगरी के बाहर एक वृक्ष पर रखे अपने गांडीव को लेकर वह कौरवों की सेना को भगाने के लिए चल दिया। अर्जुन कौरवों को मारना नही चाहता था, वह उन्हें केवल भगाना चाहता था, इसलिए उसने युद्घ क्षेत्र में जाकर एक ऐसा बाण छोड़ा जिससे सारी कौरव सेना मूच्र्छित हो गयी। पर अर्जुन यह जानता था कि उसके बाण का प्रभाव भीष्म पितामह पर नही होगा। इसलिए उसने जब उत्तर कुमार को सारे कौरवों के सिरों से उनका मुकुट उतार लाने की आज्ञा दी तो उसे यह भी बता दिया कि वह चाहे सबके शीशों से मुकुट उतार ले पर (भीष्म पितामह के ध्वज की ओर संकेत करते हुए) उस रथ पर आरूढ़ व्यक्ति का मुकुट ना उतारे। कारण कि भीष्म अर्जुन के इस तीर को निष्प्रभावी करना जानते थे।

अर्जुन जैसे पराक्रमी को पता था कि तुझसे भी बड़ा महापराक्रमी इस युद्घ क्षेत्र में भीष्म पितामह के रूप में विद्यमान हैं, इसलिए उसने अपने से बड़े पराक्रमी की ओर उत्तर कुमार को भेजा तक नही। बस, इस श्लोक का यही अर्थ है कि आपके राजा का या राजनीतिक नेतृत्व का पराक्रम ऐसा हो कि उससे सारा विश्व बचकर निकले या आंखें मिलाने का साहस न कर सके। राजा का ऐसा पराक्रमी होना मनु की दृष्टि में उसकी एक अनिवार्य योग्यता है। जिसे उपेक्षित नही किया जा सकता। उसके ऐसे पराक्रमी स्वभाव से उसके राज्य के सभी प्राणियों की रक्षा हो जाती है। कारण कि उत्पाती और उन्मादी लोग अपना उत्पात और उन्माद भुलाकर राजा के निर्देशानुसार नियमों का पालन करने लगते हैं।

इस श्लोक में राजा के पराक्रमी होने का अभिप्राय उसका क्रूर, निर्दयी और अत्याचारी या स्वेच्छाचारी हो जाना कदापि नही है। उसके पराक्रम की सीमाएं और मर्यादाएं हैं, जिन्हें स्पष्ट करते हुए महर्षि मनु अगले श्लोक में हमें बता रहे हैं :-
अमायमैव वत्र्तेत न कथंचन मायमा।
बुद्घयेतारि प्रयुक्तां च मायां नित्यं स्वसंवृत:।।

राजा को चाहिए कि-''कदापि किसी के साथ छल से न बरते, किंतु निष्कपट होकर सबसे बर्ताव रखे, और नित्यप्रति अपनी रक्षा करके शत्रु के किये हुए छल को जानके निवृत्त करें।''
(स.प्र. 152)
क्रमश:

राकेश कुमार आर्य ( 1580 )

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