राजा द्वारा चिंतनीय बातें, भाग-6

  • 2016-10-10 09:30:05.0
  • राकेश कुमार आर्य

राजा द्वारा चिंतनीय बातें, भाग-6

मनु महाराज कहते हैं :-
मोहाद्राजा स्वराष्ट्रं य: कर्षयत्यनवेक्षया।
सोअचिराद् भ्रश्यते राज्याज्जीविताच्च सबान्धव:।। 111।। (85)
अर्थात ''जो राजा मोह से, अविचार से, अपने राज्य को निर्बल करता है, वह राज्य से और बंधु सहित जीने से पूर्व ही शीघ्र नष्टभ्रष्ट हो जाता है।'' (स.प्र. 153)
राजा को अपनी प्रजा की शुभकामनाएं लेनी चाहिएं और स्मरण रहे कि राजा को अपनी प्रजा की शुभकामनाएं तभी मिलती हैं जब राजा परम विवेकी होकर प्रजावत्सल भाव से जनता की सेवा करे। जो राजा अपने परिजनों के मोह में फंसकर उन्हें अपने राजकार्यों में हस्तक्षेप करने और भ्रष्टाचार से धन कमाने की छूट देता है उस राजा का विनाश (परिवार सहित) हो जाता है। क्योंकि ऐसे लुटेरे राजा को उसकी प्रजा शुभकामनाएं न देकर उसके विनाश की ही कामना किया करती है।

स्वतंत्रता के उपरांत के भारत में कई राजनेता पूर्व में हुए हैं, तो कई आज भी जीवित हैं, जिन्होंने अपने परिवार के लोगों को संविधानेत्तर कार्य करने की छूट दी, जिससे देश में समानांतर असंवैधानिक 'शक्ति केन्द्र' पनपे और उन्होंने भ्रष्टाचार की लूट मचाकर रख दी, सुरा-सुंदरी का इतना प्रयोग बढ़ा कि लज्जा भी लजा गयी। इस विषय में भारत की कोई भी राजनीतिक पार्टी दूध की धुली नही है। हम राजनीतिज्ञों की आलोचना के लिए यह लेखमाला नही लिख रहे हैं, इसलिए आगे कुछ लिखना उचित नही मानते, यद्यपि कई नेताओं के नाम मेरी नजरों में उभर रहे हैं, जिन्हें यहां प्रमाण के रूप में लिखा जा सकता है। संकेत केवल ये है कि जिन लोगों ने राजनीति में रहकर अपने पद और कद का दुरूपयोग करते हुए मद के वशीभूत होकर कार्य किया वे आज नामशेष रह गये हैं।
राजनीतिज्ञ लोग बड़ी-बड़ी कोठियां खड़ी करते हैं, जो कल परसों दो कमरों के मकान में रहते थे वे आज देखते ही देखते बड़े-बड़े भव्य भवनों के स्वामी हो गये, पर जनता ने उन्हें नकार दिया। अब उन्हें उनकी वही कार कोठियां काटने को आती हैं जो आड़े वक्त में आनंद देने के लिए खरीदी गयी थीं। इसीलिए हमारा मानना है कि राजनीतिज्ञों को राजनीति में आने से पूर्व यह शपथ उठानी चाहिए कि वह अपने सार्वजनिक जीवन में अपने किसी परिजन या प्रियजन का कोई अनुचित हस्तक्षेप सहन नही करेंगे और ना ही उनके द्वारा कोई ऐसा कार्य होने देंगे जो प्रजाशोषण की श्रेणी में आता हो।
इस श्लोक को राज्य व्यवस्था में व्याप्त आर्थिक अपराधों और भ्रष्टाचार को रोकने के लिए एक व्यवस्था के रूप में अपनाया जा सकता है। प्रजाशोषण के परिणामों पर विचार करते हुए महर्षि मनु ने ऐसे कृत्य की सजा की भी व्यवस्था दी है। वह कहते हैं-
शरीर कर्षणात्प्राणा: क्षीयन्ते प्राणिना यथा।
तथा राज्ञामपि प्राणा: क्षीयंते राष्ट्रकर्षणात्।।
।। 112।। (86)

''जैसे प्राणियों के प्राण शरीरों को कृषित करने से क्षीण हो जाते हैं, वैसे ही प्रजाओं को दुर्बल करने से राजाओं के प्राण अर्थात बलादि बन्धु सहित नष्ट हो जाते हैं।'' (स.प्र.153)
अंग्रेजों ने भारत में 'भारतीय दण्ड संहिता-1860' में लागू की उस संहिता में यदि पहली धारा में अपराध की प्रकृति का उल्लेख किया गया है तो अगली धारा में उसका दण्ड निर्धारित किया गया है। मनु की शैली भी यही है, वे पहले श्लोक में यदि अपराध की प्रकृति का उल्लेख करते हैं तो उससे अगले में उस अपराध का दण्ड निश्चित करते हैं। यह दुख की बात है कि भारत में 'राजनीतिक दण्ड संहिता' जैसी कोई संहिता नही है। यदि भारत में 'भारतीय राजनीतिक दण्ड संहिता' जैसी कोई दण्ड संहिता होती तो 1555 हजार करोड़ (जी. न्यूज चैनल पर बतायी गयी एक रिपोर्ट के अनुसार) के राजनीतिक घोटाले ना हुए होते। इतने बड़े घोटालों को करने वाले फिर भी 'जनसेवी' कहलाते हैं। उन्हें यदि मनुस्मृति की राज्य-व्यवस्था बतायी समझायी जाती है तो इन्हें पता चलता है कि प्रजाओं का धन हड़पने से राजाओं के प्राण अर्थात बलादि बंधु सहित नष्ट हो जाते हैं। जिस राज्य में प्रजा का शोषण-उत्पीडऩ बढ़ जाता है उस राजा का राज्य रूपी शरीर भी नष्ट हो जाता है। इस प्रकार राज्य रूपी शरीर का नष्ट हो जाना भी भ्रष्ट और निकृष्ट राजा के लिए एक दण्ड है। संसार में 'मर्यादा पुरूषोत्तम' ही पूजनीय होते हैं, मर्यादाहीन और अधर्माचरण करने वाले अविवेकी राजा तो नष्ट हो जाते हैं, यहां तक कि देर सवेर इतिहास के पन्नों से भी धकेल दिये जाते हैं। उनका अवसान हो जाता है।

इसलिए राजा का चिंतन सदा ही विवेकपूर्ण न्याय संगत और धर्मसंगत कार्य करने कराने में लगा रहे। मनु कहते हैं:-
राष्ट्रस्य संग्रहेनित्यंविधानमिदमाचरेत्।
सुसंगृहीतराष्ट्रो हि पार्थिव: सुखमेधते ।। 113।। (87) ''इसलिए राजा राष्ट्र की सुव्यवस्था, नियंत्रण एवं अभिवृद्घि के लिए सदैव इस निम्न वर्णित व्यवस्था को लागू करे, क्योंकि सुरक्षित, नियंत्रित तथा सुव्यवस्थित राष्ट्रवाला राजा ही सुखपूर्वक रहते हुए आगे बढ़ता है-उन्नति करता है।''


''इसलिए राजा और राजसभा राजकार्य की सिद्घि के लिए ऐसा प्रयत्न करें कि जिससे राजकार्य यथावत सिद्घ हो। जो राजा राज्य पालन में सब प्रकार तत्पर रहता है, उसको सदा सुख बढ़ता है।''(स.प्र. 163)

इस प्रकार हमने देखा कि मनु महाराज राजा के चिंतन की शुचिता, पवित्रता, उत्कृष्टता और प्रजावत्सल भावना को उसके राज्य के चिरस्थायित्व का आधार मानते हैं। राज्य-व्यवस्था के सुचारू रूप से संचालन के लिए राजा के भीतर जनसेवी होने का भाव होना चाहिए, उसे धनसेवी नही होना चाहिए। ऐसा करने से राजा को अपनी ही प्रजा की शुभकामनाएं सदा प्राप्त होती रहेंगी, जिससे उसकी 'यश बेल और वंश बेल' दोनों बढ़ती जाती हैं।

गांवों में आज भी वृद्घ महिलाएं किसी भी भले व्यक्ति के भले कार्य से प्रभावित होकर यही कहती हैं-'तेरी वंशबेल सदा हरी रहे और तेरी हजारी उमर हो।' इसका अभिप्राय यही है कि तेरी वंशबेल और यशबेल=शुभ कार्यों से व्यक्ति देर तक जाना जाता है-बढ़ती रहे। राजा को अपने लिए प्रजा का यह आशीर्वाद प्राप्त करने का हर संभव प्रयास करना चाहिए।
जिस राजा को ऐसी शुभकामनाएं अपनी प्रजा की ओर से प्राप्त होती रहती हैं-उसका यश सदियों तक और युग-युगों तक बना रहता है। भारत की राज्य व्यवस्था ऐसी शुभकर्म करने वाले राजाओं की यशगाथा गाने में आनंद अनुभव करती है।
क्रमश:

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