राजा द्वारा चिंतनीय बातें, भाग-1

  • 2016-10-04 08:00:22.0
  • राकेश कुमार आर्य

राजा द्वारा चिंतनीय बातें, भाग-1

हमारे स्वराज्य और स्वाधीनता का लक्ष्य योगक्षेम की प्राप्ति और रक्षा करना है। जिस पर हम पूर्व में प्रकाश डाल चुके हैं। इसी बात को स्पष्ट करते हुए महर्षि मनु कहते हैं :-
अलब्धं चैव लिप्सेत लब्धं रक्षेत्प्रयत्नत:।
रक्षितं वर्धयेच्चैव वृद्घं पात्रेषु नि:क्षिपेत।। 99 ।।
''राजा और राजसभा अलब्ध (क्षेम) की प्राप्ति की इच्छा और प्राप्त (योग) की प्रयत्न से रक्षा करे। रक्षित को बढ़ावें, और बढ़े हुए धन को वेद विद्या, धर्म का प्रचार, विद्यार्थी, वेदमार्गोपदेशक तथा असमर्थ अनाथों के पालन में लगावें।'' (स.प्र.152)
इसका अभिप्राय है कि जनता के उत्थान और उद्घार के लिए राजा के पास जितने साधन उपलब्ध हैं, उनकी प्रयत्न से रक्षा और जो इस हेतु साधन अभी और जुटाने हैं, उनकी प्राप्ति की इच्छा को लेकर ही राजा का और राजसभा का चिंतन चलना चाहिए। राजा को चाहिए कि वह अपने चिंतन व अपने साधनों का प्रयोग वेद विद्या के प्रचार-प्रसार, धर्म के विस्तार और विद्यार्थियों को जनसेवी और राष्ट्रसेवी बनाने के लिए सत्यधर्म=वेद मार्ग के उपदेशकों के पालन में करे।
प्राचीनकाल में संसद
महाभारत के शांतिपर्व में 'जनसंसद' शब्द का प्रयोग किया गया है। कहा गया है :-
'इदमुक्तो मया कश्चिद्सर्वतो जनसंसादि।'
(म.शांति. 114/5)
युधिष्ठिर ने भीष्म से प्रश्न किया-''जब संसद में कोई मूढ़ व प्रगल्भ व्यक्ति किसी मृदु और विद्वान व्यक्ति पर तीक्ष्ण रूप से आक्षेप करे, तो उस समय उस मृदु और विद्वान व्यक्ति को क्या करना चाहिए?'' युधिष्ठिर के शब्द हैं :-
विद्वान मूढ़प्रगल्भेन मृदुस्तीक्ष्णेन भारत।
आक्रुश्यमान: सदिस कथं कुर्यादरिन्दम्।।
(महा.शांति. 114/1)

इस पर भीष्म ने कहा-''ऐसे गर्हित व्यक्ति के कथन की उसी ढंग से उपेक्षा करनी चाहिए, जैसे कि रोगी के प्रलाप की की जाती है। ऐसा व्यक्ति जनता में अपयश कमाता है, और उसके सारे प्रयत्न निष्फल जाते हैं। ऐसा अल्पमति व्यक्ति जो कुछ भी कहे उसे सहना ही ठीक है। उसके द्वारा की गयी प्रशंसा व निंदा से क्या बनता व बिगड़ता है। ऐसा प्रवचन वैसे ही निरर्थक होता है जैसे जंगल में कौए का बोलना निरर्थक होता है।''

भीष्म और युधिष्ठिर के इस संवाद में शब्द 'जनसंसद' विशेष रूप से ध्यान देने योग्य हैं। जिससे पता चलता है कि हमारी संसद में प्रारंभ से ही जनता की उपस्थिति या सहभागिता सुनिश्चित की गयी थी। इस 'जनसंसद' में कुछ 'उल्टी खोपड़ी' के लोग किसी भी कारण से चले जाएं तो उनकी बातों की उपेक्षा ही करना उचित होता है। इसी बात को हमारे समाज में सयाने लोग 'मूर्खों के मुंह नही लगा करते हैं'-इस मुहावरे से स्पष्ट किया करते हैं।

अब इस बात को आज के संदर्भ में देखें। हमारी संसद या राज्यों की विधानसभाओं की कार्यवाहियों को बार-बार स्थगित करना पड़ता है-कारण कि वहां बैठे हमारे जनप्रतिनिधि अप्रत्याशित शोर शराबा करते हैं। समाचार पत्रों या समाचार माध्यमों से जनता को पता चलता है कि शोर इतना अधिक था कि कुछ भी सुनाई नही पड़ रहा था। ऐसे समाचार हमारे विधानमंडलों के विषय में अक्सर बनते हैं।
यदि भीष्म से युधिष्ठिर आज भी वही प्रश्न करते तो आज भीष्म यही कहते कि-''हे तात! जब संसद कौओं की पंचायत में परिवर्तित होकर हंसों को उपेक्षित और अपमानित करने लगे तो समझना चाहिए कि व्यवस्था में भारी दोष है, जो लोग कौआ प्रवृत्ति से संसद का समय नष्ट करते हैं-उनके चयन की प्रक्रिया दोषपूर्ण है।'' मनु इस संसद को ऐसे लोगों की सभा बता रहे हैं जो 'अलब्ध की प्राप्ति' और 'लब्ध की रक्षा' कराने के उत्कृष्ट चिंतन में सर्वदा लगी रहे और राष्ट्र के कल्याण की योजनाओं को बनाती रहे। 'अलब्ध की प्राप्ति और लब्ध की रक्षा' कैसे होगी और कैसे संसद अपने इस मार्ग में सफल होगी? इस पर विचार करते हुए महर्षि मनु आगे कहते हैं-
अलब्धमिच्छेदण्डेन लब्धं रक्षेदवक्षया।
रक्षितं वर्धयेद् वृद्वयावृद्वं पात्रेषु नि:क्षिपेत।।
।। 101 ।। (76)
''दण्ड से अलब्ध=अप्राप्त की प्राप्ति की रक्षा नित्य देखने से प्राप्त की रक्षा, रक्षित की वृद्घि अर्थात ब्याजादि से बढ़ावे और बढ़े हुए धन को पूर्वोक्त मार्ग में नित्य व्यय करे।'' (स.प्र.152)
''अर्थात सुपात्रों एवं योग्य कर्मों में व्यय करे। राजाधिराज पुरूष अलब्ध राज्य की प्राप्ति की इच्छा दण्ड से और प्राप्त राज्य की रक्षा देखभाल करके, रक्षित राज्य और धन को व्यापार और ब्याज से बढ़ा और सुपात्रों के द्वारा सत्यविद्या और सत्यधर्म के प्रचार आदि उत्तम व्यवहारों में बढ़े हुए धन आदि पदार्थों का व्यय करके सबकी उन्नति सदा किया करें।''
(स.प्र.155)

महर्षि दयानंद जी महाराज ने इस श्लोक की उपरोक्त व्याख्या उस समय की थी जब देश पर ब्रिटिश सताधीशों का शासन था। इसमें महर्षि दयानंद अपने आर्य राजाओं को (देशी और स्वतंत्र शासकों को) यह बता रहे हैं कि देश के जिन क्षेत्रों पर अंग्रेजों ने बलात् अपना शासन स्थापित कर लिया है, उस अलब्ध को आप दण्ड=बल से प्राप्त करो और विदेशी शासकों को दण्ड देकर स्वदेश से बाहर का रास्ता दिखा दो। आज भी महर्षि दयानंद की यही व्यवस्था हमारे राजनीतिज्ञों का मार्गदर्शन कर सकती है।
आवश्यकता है कि हमारा राष्ट्रीय नेतृत्व अपने महान पूर्वजों के दिखाये रास्तों का अनुगमन करना सीखे। यदि हमारे राष्ट्रीय नेताओं के द्वारा ऐसा किया जाता है तो निश्चय ही उसके अच्छे और दूरगामी परिणाम निकलेंगे।
क्रमश:

Tags:    राजा