दण्ड देने का अधिकारी राजा कौन

  • 2016-08-31 11:00:15.0
  • राकेश कुमार आर्य

दण्ड देने का अधिकारी राजा कौन

भारत में राजा को असीमित अधिकार देने का कहीं भी विधान नही किया गया है। भरत ने 'कानून के राज' से भी ऊपर 'धर्म के राज' को माना है। राजा भी धर्म के अनुसार कार्य करने में ही प्रसन्नता अनुभव करता है। यदि राजा धर्म विरूद्घ आचरण करता है तो मनु ऐसे राजा को 'धर्मभ्रष्ट' हो जाने के कारण उसे किसी अन्य को दण्ड देने का अधिकारी भी नही मानते।

देश में 'सैकुलरिस्टों' ने धर्म शब्द की बड़ी ही गलत व्याख्या की है। यहां संकेत में इतना कहना ही पर्याप्त होगा कि धर्म लौकिक अर्थों में मुस्लिम, ईसाई आदि नही है, ये सारे के सारे जिन्हें हम धर्म समझते हैं वास्तव में संप्रदाय हैं, मत हंै और पंथ हंै। धर्म तो ऐसा प्रत्येक सदाचरण, श्रेष्ठ विधान या समाज व्यवस्था या नैतिक नियमों का समुच्चय है जिसे अपनाकर हम मानव से महामानव बनते जाते हैं, हमारा पल प्रतिपल परिष्कार और उद्घार होता रहता है, उत्थान होता रहता है। हमारे यहां धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष के जिस 'पुरूषार्थचतुष्ट्य' की कल्पना की गयी है उसमें धर्म का स्थान सर्वप्रथम है। धर्म 'पुरूषार्थचतुष्ट्य' का मूलाधार है। सबका आश्रय है। सर्वोद्घारक है। 'पुरूषार्थ चतुष्ट्य' के महाविद्यालय में प्रवेश पाने का अर्थ कितना गहरा है कि हमारे मानव निर्माण की इस कार्यशाला में प्रारंभ ही धर्म जैसे गूढ़ विषय से होता है। जिसे पश्चिम के लेाग आज तक नही समझ पाये, हम उसे इतना सरल मानते हैं कि अपने जीवन की पाठशाला को ही धर्म से प्रारंभ करते हैं। धर्म का मोटा सा अर्थ यही है कि जिसके आचरण, करने से उत्तम सुख आत्मिक, मानसिक, शारीरिक त्रिविध उन्नति और मोक्षसुख की प्राप्ति हो उसे धर्म मानते हैं।

आत्मिक, मानसिक, शारीरिक त्रिविध उन्नति और उत्तम सुख हमें न्यायशील होने से मिलता है, दूसरों के साथ सहयोग, सदभाव, सम्मैत्री, सदभावना, सहृदयता, दयालुता, आदि-आदि उत्तम भावों के अपनाने से मिलता है। दूसरों को किसी भी प्रकार का कष्ट देने में हमें दुख होता है। इसका अभिप्राय है कि जिसके करने से हमारा चित्त (जो कि आत्मा के सर्वथा निकट है) प्रसन्न हो-वह कार्य धर्मानुकूल होता है और जिसके करने से चित्त अप्रसन्न या दुखी हो वह कार्य अधर्मानुकूल होता है।

महर्षि मनु की व्यवस्था है-

तस्याहु संप्रणेतारं राजानं सत्यवादिनम्।

समीक्ष्यकारिणम् प्राज्ञं धर्मकामार्थकोविद्।। (।। 26।। 16)

महर्षि दयानंद के श्लोक की व्याख्या करते हुए संस्कार विधि में लिखते हैं-''उस दण्ड को अच्छी प्रकार चलाने हारे उस राजा को कहते हैं कि जो सत्यवादी विचार ही करके कार्य का कर्ता, बुद्घिमान विद्वान, धर्म, काम और अर्थ का यथावत जानने हारा हो।''

''जो उस दण्ड का चलाने वाला सत्यवादी, विचार के करने हारा, बुद्घिमान, धर्म, अर्थ, काम की सिद्घि करने में पंडित राजा है, उसी को दंडत: चलाने हारा विद्वान लोग कहते हैं।'' (स.प्र. 142)

इसका अभिप्राय हुआ कि अपराध को देखकर उसका उचित दण्ड देना ही न्याय है। ऐसा न्याय जो न तो अपेक्षा से कम हो, और न अधिक हो। ऐसा न्याय निश्चय ही कोई विवेकशील राजा ही दे सकता है। इसलिए दण्ड देने वाले राजा के सत्यवादी, विचारपूर्वक कार्य करने वाला बुद्घिमान और विद्वान, धर्म, काम और अर्थ का जानने वाला, महर्षि मनु अनिवार्य घोषित करते हैं।

ऐसा राजा जो स्वयं सत्यवादी न हो, किसी मिथ्यावादी या असत्य बोलने वाले को दण्ड नही दे सकता। इसी को प्राकृतिक न्याय कहते हैं। प्रकृति स्वयं पवित्र है, और वह परकल्याण में लगी रहती है, उसका ऋतु चक्र देखिए, उसका कोई भी कार्य देखिए-सब जीवधारियों के कल्याणार्थ ही होता रहता है, उसकी दृष्टि और सृष्टि में कोई दोष नही है, इसलिए वह दण्ड देने के अधिकारी हैं। प्रकृति के अनुसार ही राजा को भी अपना हर कार्य लोकोपकार के लिए करना होता है, वह स्वयं लोकोपकार होता है। इसलिए वह हृदय से पवित्र होता है, विचारपूर्वक कार्य करने का अभ्यासी होता है। तभी तो महर्षि मनु ऐसे राजा को ही किसी प्रजाजन को दण्ड देने का अधिकारी राजा मानते हैं।

उपरोक्त श्लोक में दण्ड देने के अधिकारी राजा के लिए यह भी स्पष्ट किया गया है कि धर्म, अर्थ और काम के 'त्रिवर्ग' को जानने वाला हो। इसका अभिप्राय है कि दण्ड देने का अधिकारी राजा कामी, व्यभिचारी न हो, क्योंकि कामी और व्यभिचारी राजा तामसिक वृत्ति का होता है, इसे क्रोध अधिक आता है और क्रोधावेश में यदि वह न्याय करने लगे तो अन्याय ही अधिक होता देखा गया है। इसके अतिरिक्त क्रोध तब आता है जब कोई आपके मनोरथ को पूर्ण होने में बाधा पहुंचाता है। आपका स्वार्थ जब पूर्ण नही होता है तो भी क्रोध आता है, स्वार्थपूत्र्ति में बाधा डालने वाले व्यक्ति पर आपको क्रोध आता है।

यदि ये कामी 'राजा' किसी सुंदर महिला को देखे और उस पर आसक्त हो जाए और उस राजा की उस आसक्ति में उस महिला का पिता या भाई या समाज का कोई भी व्यक्ति या समाज का कोई नियम अथवा परंपरा बाधा डाले तो राजा उन सबको एक साथ बिना विचारे ही समाप्त कर डालेगा। अत: राजा का जितेन्द्रिय होना आवश्यक माना गया है। एक जितेन्द्रिय राजा धैर्यशील होता है। इसके सामने चाहे कितना ही सुंदर रूप क्यों न आ जाए, वह कभी भी स्वधर्म से विचलित नही हो सकता। फलस्वरूप उसकी प्रजा भी स्वधर्म में स्थिर रहती है। महर्षि मनु ऐसे राजा को ही दण्ड देने का अधिकारी मानते हैं।

राजा के लिए आवश्यक है कि वह धर्म की उच्चता और अर्थ की शुचिता को जानने हारा हो। अर्थ की शुचिता का अर्थ है कि वह अपने कोश को अनर्थकारी अर्थ से न भरता हो। दूसरों के काल को लूटने वाला राजा डकैत तो हो सकता है, पर कभी भी मनु की दृष्टि में एक राजा नही हो सकता। राजा वही होता है दूसरों के धन की रक्षा करने में समर्थ हो और अपने लिए धर्मानुसार कर ग्रहण कर उससे राजकाज चलाने का अभ्यासी हो। ऐसे राजा की वृत्ति पवित्र होती है, उसका चिंतन पवित्र होता है, उसकी सोच निश्छल होती है। जहां वृत्ति पवित्र हो, चिंतन पवित्र हो, सोच निश्छल हो, वही न्याय होने की आशा की जाती है।

राकेश कुमार आर्य ( 1580 )

उगता भारत Contributors help bring you the latest news around you.