दण्ड देने का अधिकारी राजा कौन? भाग-3

  • 2016-09-03 08:45:50.0
  • राकेश कुमार आर्य

दण्ड देने का अधिकारी राजा कौन? भाग-3

'होती है राजा की यशवृद्घि'

न्यायानुसार राज्य चलाने वाले और दण्डादि देने वाले राजा की यशवृद्घि कैसे होती है? इसकी बहुत सुंदर उपमा मनुमहाराज ने दी है :-

'इस प्रकार न्यायपूर्वक दण्ड का व्यवहार करने वाले राजा का शिल-उञ्छ से निर्वाह करने वाले अर्थात निर्धन राजा का भी यश जैसे पानी पर डालने से तैल की बूंद चारों ओर फैल जाती है ऐसे संपूर्ण जगत में फैल जाता है।' (33/121)

यहां पर शिल खेत में गेंहू की फसल को काटने के उपरांत पड़ी रह गयी बालियों को तथा उञ्छ=पड़े रह गये दानों को कहा गया है। शिल को देहात में लोग 'शिला' भी कहते हैं। जिसे लोग उठाते या बीनते देखे जाते हैं। महर्षि कणाद के विषय में कहा जाता है कि वे अन्न कणों अर्थात दानों को बीन-बीनकर अपनी आजीविका चलाते थे। उनके इस पवित्र कार्य को अपनाने के कारण शिला बीनना कोई बुरा काम न मानकर व्यक्ति की ईमानदारी का सर्वोत्तम प्रमाण माना जाता है। इसलिए हमारे यहां एक मुहावरा भी चल गया कि-''शिल उञ्छ से जीना।''

'शिल उञ्छ' का उदाहरण देकर महर्षि मनु ने स्पष्ट किया है कि परिस्थितियां चाहे कितनी ही विषम और प्रतिकूल क्यों ना हों, न्यायशील राजा को अपना न्याय मार्ग नही छोडऩा चाहिए-'न्याय्यात्पथ: प्रविचलंति पदं न धीरा:।' इसी बात को रामचरित मानस में तुलसीदास ने कुछ इस प्रकार कहा है :-

धीरज धर्म मित्र अरू नारी।

आपतकाल परखिये चारी।।

राजा का धर्म न्याय देना है। इसलिए उसके धर्म की परीक्षा भी हर व्यक्ति के धर्म की भांति आपत्तिकाल में ही होती है। महर्षि मनु कहते हैं कि यदि आपत्तिकाल में भी राजा न्यायशील बना रहा तो उसका यश बड़ी तीव्रता से फैलता है।

.....हो जाता है यशनाश

महर्षि मनु का मत है कि-''इस व्यवहार से विपरीत चलने वाले अर्थात न्याय और सावधानी पूर्वक दण्ड का व्यवहार न करने वाले अजितेन्द्रिय राजा का यश जल में पड़े घी के समान लोक में (नित्यप्रति) कम होता जाता है।'' (34/122)

महर्षि मनु ने इस श्लोक में पुन: 'अजितेन्द्रिय' शब्द का प्रयोग किया है। इसका अभिप्राय है कि वह राजा से हर स्थिति- परिस्थिति में 'जितेन्द्रिय' बने रहने की अपेक्षा करते हैं।

आज के 'राजाओं' के लिए 'जितेन्द्रिय' शब्द किसी बाहरी लोक की वस्तु का नाम होकर रह गया है। वह इतने पथभ्रष्ट हो चुके हैं कि 'जितेन्द्रिय' होना उन्हें सर्वथा असंभव सा लगता है। भारत में भी कई लोग इस विषय पर बहस करते-करते इसी कुतर्क पर आ जाते हैं कि जो बात संभव ही नही, उसको चर्चा में क्यों लाया जाता है? ऐसा कहने वालों का हम कोई दोष नही मानते-दोष उन देशघातकों का है जिन्होंने मनु और मनुस्मृति को देश के विद्यालयों के पाठ्यक्रम से ही निकाल बाहर कर दिया है।

चाणक्य की दृष्टि में राजा की योग्यता

महर्षि मनु पर प्रतिपादित राज्य व्यवस्था पर ही चाणक्य ने आगे चलकर कार्य किया। चाणक्य हमारे इतिहास का एक ऐसा नायक है जिसका मार्गदर्शन आज का भी राजनीतिज्ञ लेना चाहता है, और जिस की बुद्घि पर हमें गर्व है। आचार्य चाणक्य भी राजा को बहुत ही गुण संपन्न व्यक्तित्व और सबकी आशाओं के केन्द्र के रूप में स्थापित करते हुए कहते हैं-

''मंत्रिपुरोहितादि भृत्यर्गमध्यक्षप्रचारं पुरूषद्रव्यप्रकृतिव्यसनप्रतीकारमेधनं च राजैव करोति, स्वामी च संपन्न: स्वससम्पद्घि: प्रकृतीस्सम्पादयति। स्वयं यच्छीलस्तच्छीला: प्रकृतयो भवंति, उत्थाने प्रमादे च तदायत्तत्वात्। तत्कूटस्थानीयो हिं स्वामीमि।'' (कौ. अर्थ 8/1)

अर्थात-''मंत्री पुरोहित आदि भृत्यवर्ग की और राज्य के विविध अध्यक्षों व अमात्यों की नियुक्ति राजा ही करता है। राजपुरूषों पर कोष व जनता पर यदि कोई विपत्ति आ जाए तो उसका प्रतिकार राजा द्वारा ही होता है। इनकी उन्नति भी राजा के ही हाथ में है। यदि अमात्य ठीक न हों तो राजा उन्हें हटाकर नये अमात्यों की नियुक्ति करता है। पूज्य लोगों की पूजा कर और दुष्ट लोगों का दमन कर राजा ही सबका कल्याण करता है यदि राजा संपन्न हो तो उसकी समृद्घि से प्रजा भी संपन्न होती है। राजा का जो शील हो, वही शील प्रजा का भी होता है। यदि राजा उद्यमी व उत्थानशील हो तो प्रजा भी उत्थानशील होती है, यदि राजा प्रमादी हो तो प्रजा भी वैसी ही हो जाती है। अत: राज्य में कूटस्थानीय (केन्द्रीभूत=सबकी आशाओं का केन्द्र) राजा ही है।''

मैं आचार्य चाणक्य 'कौटिलीय अर्थशास्त्र' (6/1) में राजा के विषय में बताते हैं कि वह कैसा होना चाहिए-

'राजा ऊंचे कुल का हो, उसमें दैवीय बुद्घि और दैवीय शक्ति हो, वह वृद्घजनों की बात को सुनने वाला हो, धार्मिक हो, सत्य भाषण करने वाला हो, परस्पर विरोधी बातें न करे, कृतज्ञ हो, उसका लक्ष्य बहुत ऊंचा हो, अर्थात वह राष्ट्र की उन्नति के बारे में और लोगों के सर्वांगीण विकास के बारे में सदैव चिंतनशील रहने वाला हो, उसमें उत्साह अत्यधिक हो, वह दीर्घसूत्री न हो, सामंत राजाओं को अपने वश में रखने में वह समर्थ हो, उसकी बुद्घि दृढ़ हो, उसकी परिषद छोटी न हो, और वह विनय (नियंत्रण) का पालन करने वाला हो।'

आचार्य चाणक्य हमारे जिस राजा की या राष्ट्रनायक की छवि हमारे सामने प्रस्तुत कर रहे हैं उसे देख व समझकर कहीं से भी ऐसा नही लगता कि राजतंत्र कोई बुरी शासन प्रणाली है। यदि राजा के अंदर ऐसे गुण हैं तो उसे आप चाहे किसी भी पदनाम से पुकार लें, वास्तविक अर्थों में तो वह हमारा राष्ट्रनायक ही कहा जाएगा। जिसके भीतर ऐसे गुण होते हैं वही राजा राज करने और दण्ड देने का अधिकारी होता है, क्योंकि उसका विवेक सदैव जागृत रहता है।

राकेश कुमार आर्य ( 1586 )

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