दण्ड देने का अधिकारी राजा कौन? भाग-2

  • 2016-09-02 06:00:52.0
  • राकेश कुमार आर्य

दण्ड देने का अधिकारी राजा कौन? भाग-2

जिन राजाओं, नवाबों, बादशाहों और सुल्तानों ने अपने-अपने काल में परद्रव्य को लूटना अपना अधिकार माना और लोगों को केवल इसलिए फांसी दी कि ऐसा करने से उसका धन मिल सकता था, बहुत से लोगों का सामूहिक नरसंहार किया, वे राजा, नवाब, बादशाह और सुल्तान सही अर्थों में राजा, नवाब, बादशाह और सुल्तान ही थे। कारण कि वे धर्म, अर्थ और काम के त्रिवर्ग को नही जानते थे और मोक्ष के सूर्य की ओर तो उनका

आंख उठाकर देखना भी वश की बात नही थी। अब ऐसे धर्मविहीन राजाओं, नवाबों, बादशाहों और सुल्तानों से आप ये कैसे अपेक्षा कर सकते हैं कि वे अपने लिए मनुस्मृति को अपना संविधान घोषित करें? वे तो इस पावन ग्रंथ को जितना शीघ्र हो सके उतना गहरा दबाना ही उत्तम मानते थे। यही कारण रहा कि मनुस्मृति जैसा पवित्र और अनुपम संविधान विस्मृतियों के गहन गहवर में फेंक दिया गया।

अन्यायकारी राजा का

विनाश होता है

मनु महाराज ने सबसे पहले यह बताया कि राजा कैसा हो, फिर यह बताया कि दण्ड देने का अधिकार किस राजा को है? और अब बता रहे हैं कि यदि राजा अन्यायकारी है, अपात्र को दण्ड देने का अभ्यासी है, तो उसका विनाश हो जाता है :-

''जो दण्ड को अच्छे प्रकार राजा चलाता है वह धर्म, अर्थ और काम की सिद्घि को बढ़ाता है, और जो विषय में लम्पट, टेढ़ा= ईष्र्या करने वाला क्षुद्रबुद्घि

न्यायाधीश राजा होता है, वह दण्ड से ही (उसका राज्य कोई और छीन लेता है और राज्य छीनने वाला व्यक्ति स्वयं राजा बनकर उसकी हत्या कर देता है) मारा जाता है।''

विधि में कहा जाता है कि 'चाहे अपराधी सौ छूट जाएं पर एक निरपराध को दण्ड ना मिल जाए', ऐसा कहने का आशय यही होता है कि यदि किसी एक निरपराधी को दण्ड दे दिया तो मानो धर्म को ही दण्ड दे दिया गया है। धर्म की रक्षा तभी होती है

जब वास्तविक अपराधी को ही दण्ड मिले। निरपराध को दण्ड देने से तो स्वयं धर्म की हत्या हो जाती है। धर्म के विषय में यह कहा जाता है कि जो व्यक्ति धर्म की रक्षा करता है, उसकी धर्म रक्षा करता है, और जो धर्म की हत्या करता है, उसकी हत्या धर्म कर देता है। इसलिए न्याय करते समय राजा की ओर से धर्म की रक्षा का विशेष ध्यान रखा जाना चाहिए। किसी भी निरपराधी धर्मपे्रमी की आत्मा का श्राप
उस राजा पर अवश्य पड़ता है जो उसे निरपराधी मानते हुए भी दण्ड दे देता है।

हमने लोक-व्यवहार में भी देखा है कि समाज के जो प्रमुख व्यक्ति न्याय करते समय पक्षपात कर गये या सब कुछ जानते हुए भी किसी निरपराधी को दण्ड दे गये-उनका विनाश हो गया, उनका वंश (अर्थात प्रजा विनाश=पूंजा छिपना) समाप्त हो गया।

मनु महाराज इस श्लोक में इसीलिए स्पष्ट कर रहे हैं कि राजा को न्याय करते समय टेढ़ा

अर्थात किसी से ईष्र्या-भाव करने वाला नही होना चाहिए। उसे न्याय में प्रतिशोध की भावना से काम नही लेना चाहिए। मनु महाराज 'टेढ़ी नजर' वाले राजा को विषम कह रहे हैं। उनका अभिप्राय है कि राजा को विषमदर्शी होकर न्याय करते समय समदर्शी होना चाहिए। मनु महाराज की इसी व्यवस्था से न्यायिक भाषा क्षेत्र में एक मुहावरा बन गया-'टेढ़ी नजर करना।' देखिये क्या कमाल है कि इन मुहावरों और मान्यताओं
के आधार पर हमारे माल को दूसरे लोग हमारे सामने परोस रहे हैं, और हम इसे उनका मानकर उन्हें धन्यवाद दे रहे हैं। शोक की बात है।

दण्ड बड़ा तेजोमय है

महर्षि मनु कहते हैं :-

दण्डोहि सुमहत्तेजो दुर्धरश्चाकृतात्मभि:

धर्माद्विचलितं हन्ति नृपमेव सबान्धवम्।।

अर्थात दण्ड बड़ा तेजोमय है, उसको कोई अविद्वान मूर्ख=पाखण्डी और धूत्र्त अधर्मात्मा राजा धारण नही कर सकता। तब वह दण्ड

धर्म से रहित राजा ही का नाश कर देता है।

इस श्लोक से मुहावरा बन गया-''जिसकी कार उसी को साजे, और करे तो जूता बाजे।'' अर्थात न्याय करने के लिए धर्मात्मा, न्यायशील और विद्वान होना आवश्यक है, किसी भी तेजोमय वस्तु के ज्ञान प्रकाश को कोई विद्वान तेजोमय पुरूष ही धारण कर सकता है, यदि उसके तेज को किसी मूर्ख ने धारण करने का प्रयास भी किया तो वह ऐसा कर नही पाएगा। फलस्वरूप उसकी अनाधिकार

चेष्टा उसके लिए आत्म विनाशकारी सिद्घ हो जाएगी। अपने मंतव्य को और भी स्पष्ट करते हुए महर्षि मनु कहते हैं :-

''जो राजा उत