राजा युद्घ में स्वयं भाग ले, भाग-1

  • 2016-09-29 09:30:00.0
  • राकेश कुमार आर्य

राजा युद्घ में स्वयं भाग ले, भाग-1

राकेश कुमार आर्य
महर्षि मनु कहते हैं :-
समोत्तमा धर्मे राजा त्वाहूतं: पालयप्रजा:।
न विवत्र्तेत संग्रामात्क्षात्रं धर्म मनुस्मरन् ।। 87 ।।
अर्थात ''जब कभी प्रजा का पालन करने वाला राजा को अपने से तुल्य, उत्तम या छोटा संग्राम में आह्वान करे तो क्षत्रियों के धर्म का स्मरण करके संग्राम में जाने से कभी निवृत्त न हो, अर्थात बड़ी चतुराई के साथ उनसे युद्घ करे। जिससे अपनी ही विजय हो।'' (स.प्र. 150)

इस श्लोक में 'राजा' के लिए अपेक्षा कर रहे हैं कि वह शूरवीर हो, शस्त्र विद्या में निपुण हो और जब उसे कोई उसके समान स्तर का या उससे अधिक बलशाली या उससे कम बलशाली राजा युद्घक्षेत्र में चुनौती दे तो वह उसका सामना इस प्रकार की उत्तम युद्घ विद्या और युद्घनीति से करे कि हर स्थिति में उसी की विजय हो। जब तक भारत में क्षत्रिय बलशाली ऐसे राजाओं का प्रभाव रहा, तब तक यह देश निरंतर आगे बढ़ता रहा और हर क्षेत्र में उन्नति करता रहा। पर जब 'राजा' अपने क्षात्रधर्म से पतित होने लगे और युद्घ के लिए सन्नद्घ खड़ी शत्रु सेना का सामना करने से बचने लगे, तब से देश का पतन आरंभ हो गया। राजाओं ने अपनी कायरता को छिपाने के लिए भांति-भांति के बहाने बनाये। कई बार हमारी पराजय इसलिए हुई है कि शत्रु सेना का सामना किसी अकेले राजा को करना पड़ा अर्थात उसे विदेशी शत्रु सेना का सामना करने के लिए स्थानीय देशी राजाओं का अपेक्षित सहयोग नही मिला। इसे हमारी फूट ना कहकर राजाओं की युद्घ से बचने की प्रवृत्ति कहा जाए तो उचित रहेगा। इस श्लोक से यह भी स्पष्ट है कि राजा क्षत्रियों के धर्म=अन्याय को मिटाना और न्याय की रक्षा करना, को सदा स्मरण रखे और उसके लिए स्वयं हर प्रकार की शस्त्र विद्या में पारंगत हो।
आज का लोकतंत्र और किसी भी देश का लोकतांत्रिक संविधान 'राजा' की नियुक्ति के लिए उसका शस्त्र विद्या में पारंगत होना अनिवार्य घोषित नही करता, ना ही उसका क्षात्रधर्म कहीं स्पष्ट किया गया है कि उसे किस प्रकार अन्याय का प्रतिकार कर न्याय की रक्षा करनी है? मनु महाराज आगे कहते हैं :-
आहवेषु मिथे अन्योन्यं जिघांसंतो महीक्षित:।
युध्यामाना: परम शक्ल्या स्वर्गं पान्त्यपरामुखा: ।। 89।।
अर्थात ''जो संग्रामों में एक दूसरे का हनन करने की इच्छा करते हुए राजा लोग जितना सामथ्र्य हो बिना डरे, पीठ न दिखाकर युद्घ करते हैं वे स्वर्ग को अर्थात सुख को प्राप्त होते हैं।''
''इससे विमुख कभी न हो किंतु कभी-कभी शत्रु को जीतने के लिए उनके सामने छिप जाना उचित है। क्योंकि जिस प्रकार से शत्रु को जीत सके वैसे काम करें। जैसे सिंह क्रोधाग्नि में सामने आकर शस्त्राग्नि में शीघ्र भस्म हो जाता है वैसे मूर्खता से नष्ट-भ्रष्ट न हो जावे।''
(स.प्र. 150)

इस श्लोक में मनु राजा के परम शौर्यशाली होने की बात कह रहे हैं, वह निडर और निर्भीक हो, युद्घ से डरने वाला न हो। परंतु महर्षि दयानंद जी महाराज ऐसे शौर्यशाली राजा की निडरता और निर्भीकता पर एक व्यावहारिक नीतिगत प्रतिबंध सा लगा देते हैं कि यदि किन्ही कारणों से अगले राजा के सामने पराजय का होना निश्चित दिखाई दे रहा है तो ऐसे काल में राजा अपने आपको छिपा ले। 'छिपा ले' के दो अर्थ हैं एक तो है-उस समय अपनी सेना सहित छापामार युद्घ को करने लगे और दूसरा है समय और परिस्थिति को देखकर उस समय पीछे हट जाए और उचित अवसर पर दुगुणे वेग से शत्रु सेना पर हमला कर दे।

महाराणा प्रताप और छत्रपति शिवाजी जैसे हमारे अनेकों योद्घाओं ने इस नीति का अपने काल में अनेकों बार प्रयोग किया। राजा के ऐसे बौद्घिक चातुर्य से देश सुरक्षित रहता है देश की स्वतंत्रता और सम्मान सुरक्षित रहते हैं। राजा को अंधी वीरता दिखाते हुए केवल शत्रु के हाथों मरने के लिए युद्घ नही करना चाहिए अपितु शत्रु को परास्त कर अपनी प्रजा की सुरक्षा करने हेतु युद्घ करना चाहिए।

युद्घ में कौन-कौन अवध्य हैं
भारत इसलिए महान है कि इसकी परंपराएं महान हैं। सचमुच इतनी महान कि जो समस्त संसार को आज भी बहुत कुछ सिखाती हैं। युद्घ के क्षेत्र में भी मर्यादाएं केवल भारत ही सिखाता है, अन्यथा अन्य लोग तो कहते हैं कि प्यार में और वार (युद्घ) में सब कुछ जायज है।

अपनी इस मान्यता की आड़ में इन दुष्टाचारी लोगों ने क्या-क्या अत्याचार समाज के निरपराध लोगों पर नही किये। सभी कुछ तो किया। फिर भी इन्हें 'प्रगतिशील' माना जाता है, सचमुच खेद का विषय है यह।

वास्तव में प्रगतिशील तो वह होता है जो हर स्थिति में निरपराध और निर्दोष लोगों का सम्मान करता है और जो उन पर अत्याचार करता है उन्हें अपना शत्रु मानता है। निरपराध और निर्दोषों का कत्ल करने वालों को आप कैसे प्रगतिशील कह सकते हैं? भारत के धर्म की प्रगतिशीलता देखिए तो सही वह कितनी ऊंची आवाज में कह रहा है कि चाहे किसी व्यक्ति से, वर्ग से, या संप्रदाय से या किसी राज्य से आपकी कितनी ही शत्रुता क्यों न हो, और उनसे युद्घरत भी क्यों ना हों, पर आपको निर्दोष लोगों का वध नही करना है। महर्षि मनु ऐसे लोगों के विषय में हमें बताते हैं कि जो युद्घ में अवध्य होंगे। वह इस विषय में लिखते हैं :-
क्रमश:

राकेश कुमार आर्य ( 1580 )

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