राजा युद्घ में स्वयं भाग ले, भाग-4

  • 2016-10-03 10:30:52.0
  • राकेश कुमार आर्य

राजा युद्घ में स्वयं भाग ले, भाग-4

राकेश कुमार आर्य
इस अधिकार 'शब्द' को उसी पूर्ववत्र्ती व्यवस्था के आधीन रखकर ही समझाया जाना चाहिए जिसमें ऐसी स्त्रियों के प्रति बहन बेटी जैसा व्यवहार करने की बात कही गयी है। एक बात और कि जीते हुए धन को यदि 'राजा' ही अपने प्रयोग में लाएगा तो बहुत संभव है कि उसका लालच बढ़ता जाए और वह दूसरे राजाओं को लूटने के लिए ही अपनी ओर से उन पर हमला करने लगे। तब उस परिस्थिति में राजा केवल एक लुटेरा होकर रह जाएगा, और उसके इस प्रकार के कृत्यों से सर्वत्र अराजकता फैल जाएगी। लोगों में नियम और न्याय अथवा विधि व्यवस्था के प्रति विश्वास भंग हो जाएगा। हमने ऐसी स्थिति भारत में मुस्लिम आक्रमणों के समय और विदेशी शासकों के काल में देखी है। इस प्रकार की स्थिति उत्पन्न ना हो, इसके लिए मनु की व्यवस्था ही उत्तम है कि लड़ाई में मिले धनादि को 'राजा' स्वयं ग्रहण न करे।

अब एक बात और भी विचारणीय है कि यदि राजा उस धनादि को ग्रहण नही करे और उसको अमात्यादि ग्रहण करें, तो क्या उससे उन लोगों का लालच नही बढ़ेगा? इस पर भी महर्षि मनु ने सुंदर व्यवस्था दी है। उनका कहना है कि जीते हुए धन से राजा को 'उद्घार' दिया जाए। इस उद्घार शब्द को आजकल के उधार शब्द के रूप में समझने की आवश्यकता है। उद्घार का अर्थ है कल्याण, या भला करना। अत: जब कोई किसी को उद्घार देता है तो उसका अभिप्राय होता है कि तुम अपना कल्याण कर लो या भला कर लो और जब तुम्हारा काम हो जाए तो मुझे मेरी धनराशि या वस्तु मूलरूप में यथावत लौटा देना। यह उद्घार की धनराशि व्यक्ति की अपनी आर्थिक परिस्थितियों के ऊपर निर्भर करती थी, यदि व्यक्ति की आर्थिक परिस्थितियां प्रतिकूल ही बनी रहती थीं तो यह आवश्यक नही था कि उस उद्घार की धनराशि को वे लौटाई। यह भारत का वास्तविक समाजवाद है। प्राचीनकाल में उद्घार का अभिप्राय केवल यह था कि आपके पास यदि अपेक्षा से अधिक धन या कोई वस्तु है तो उसे दूसरों के कल्याण पर स्वेच्छा से व्यय कर देना। उसे वापस लेना नही है। इसी से आज का उधार शब्द प्रचलित हो गया है। आजकल उधार की धनराशि को ही लोग मांगते हैं और कभी-कभी इस पर ब्याज भी लगाकर लेते हैं। आज की यह मान्यता भारत की प्राचीन मान्यता के सर्वथा विपरीत है।

जब हमारे सैनिकों को किसी युद्घ में धनादि प्राप्त होते थे तो उसमें से भी वह राजा को 'उद्घार' देते थे। मनु की व्यवस्था है :-
राजश्च दद्युरूद्घारमित्येषा वैदिकी श्रुति:।
राजा च सर्वयोधेभ्यो दातव्यमपृथग्जिनम्।।
।। 97।। (72)
''परंतु सेनास्थ जन भी उन जीते हुए पदार्थों में से सोलहवां भाग राजा को देवें और राजा भी सेनास्थ योद्घाओं को उस धन में जो सब ने मिलकर जीता हो, सोलहवां भाग देवें।''
''और जो कोई युद्घ में मर गया हो उसकी स्त्री तथा संतान को उसका भाग देवें और उसकी स्त्री तथा असमर्थ लडक़ों का यथावत पालन करें। जब उसके लडक़े समर्थ हो जावें तब उनको यथायोग्य अधिकार देवें। जो कोई अपने राज्य की वृद्घि, प्रतिष्ठा विजय और आनंदवृद्घि की इच्छा रखता हो वह इस मर्यादा का उल्लंघन कभी न करें।'' (स.प्र.150)

भारत की विशेषता
भारत में मर्यादा की बातें बहुत होती हैं। वास्तव में मर्यादाएं हमारे सभी प्रकार के नैतिक और वैधानिक वे कत्र्तव्य कर्म हैं जो हमें दूसरों के प्रति विनम्र बनाते हैं, सहिष्णु और उदार बनाते हैं, इतना ही नही मर्यादाएं ही हैं जो हमारे जीवन को लोकोपयोगी बनाती हैं और हमें सब प्रकार की अनैतिकताओं और दुराचरणों की केंचुली से युक्त कर उत्तम जीवन जीने के लिए प्रेरित करती हैं। हमारे जीवन को उच्छ्रंखलताओं से मुक्त कर दूसरों के प्रति कत्र्तव्य परायण बनाती हैं। मर्यादा नैतिक नियमों या लिखित विद्या विधान का वह अलिखित स्वरूप है जिसे आचार्य लोग हमारे हृदय पटल पर अंकित कर देते हैं और हम फिर उन्हीं के आलोक में (मानो उनके इस प्रकार अंकित होते ही हमारी जीवन बैट्री चार्ज हो गयी है) यंत्रवत परंतु संतुलित होकर कार्य करने लगते हैं। इसी मर्यादा की बात महर्षि दयानंद जी द्वारा इस ऊपरिलिखित श्लोक में की गयी है।

सेना का कत्र्तव्य राष्ट्र रक्षा और अन्याय को मिटाना होता है। यदि सेना जनसाधारण का नरसंहार करने वाली हो जाएगी तो स्वयं ही अन्यायी हो जाएगी। सेना को इस अन्यायी स्थिति से दूर रखने के लिए ही मर्यादा का पाठ पढ़ाया जाता था। यही कारण है कि आज तक भी भारत की सेना विश्व की सभी सेनाओं से अधिक मर्यादित सेना है। हमारी सेना को सत्ता का मुंह लहू नही लगा है, वह अपने धर्म पर ध्यान रखती है। सेना के इस मर्यादित स्वरूप के पीछे हमारे मनु जैसे तपस्वियों के तप की साधना कार्य कर रही है।
सेना यदि मर्यादित रहेगी तो राज्य में मर्यादाओं का यथावत पालन होता रहेगा। किसी भी उपद्रवी या उग्रवादी व्यक्ति को अवैधानिक या अनैतिक कार्य करने का साहस नही होगा, यदि वे लोग ऐसा करेंगे तो सेना उन्हें समूल नष्ट कर देगी। राजा को अपने सैनिकों की प्रत्येक प्रकार की सुख सुविधा का ध्यान रखना चाहिए।
क्रमश:

राकेश कुमार आर्य ( 1586 )

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