राजा युद्घ में स्वयं भाग ले, भाग-3

  • 2016-10-01 07:30:59.0
  • राकेश कुमार आर्य

राजा युद्घ में स्वयं भाग ले, भाग-3

यहां पर यह ध्यान रखना चाहिए कि युद्घ से पलायन करना और युद्घक्षेत्र से पीछे हटने में अंतर है। हमारे देश में युद्घ से पीछे हटने का अभिप्राय है कि परिस्थितिवश और शत्रु को भ्रम में डालने के लिए पीछे हटा गया है, जैसे ही ऊर्जा मिल जाएगी, वैसे ही युद्घ का बिगुल पुन: फूंक दिया जाएगा, जबकि युद्घ से पीठ दिखाने का अभिप्राय है-युद्घ से भयभीत हो उठना और फिर कभी युद्घ के लिए तैयार न होना। निश्चय ही पहले ढंग के लोग दूसरे वालों से उत्तम होते हैं।


भारत की युद्घनीति में पीठ न दिखाना युग-युगों का एक आदर्श नियम है। मनु जी ने उक्त नियम स्वयं ही अधिकतम लोगों के कल्याण के लिए अपनाया और दयानंद जी महाराज ने उस नियम को अपने उपरोक्त श्लोक की व्याख्या में उड़ेल दिया हमारे समक्ष यह नियम जो कि वैज्ञानिक और न्यायसंगत है। देशों के सैन्य नियमों में इसे मान्यता मिलनी चाहिए।

युद्घ से पलायन करने को या पीठ दिखाने को इसलिए भी एक अपराध माना जाएगा कि जब कोई सैनिक युद्घ क्षेत्र में अपने देश की ओर से लड़ रहा होता है, तो उसके संपूर्ण देश का गौरव और प्रतिष्ठा भी उसके साथ आ जुड़ते हैं। अत: युद्घक्षेत्र में हर एक सैनिक मानो 'एक राष्ट्र' बन जाता है। उसका आगे बढऩा यदि राष्ट्र के लिए उत्साहवर्धक और गौरवप्रद होता है तो पीछे हटना उतना ही अपमानजनक और प्रतिष्ठा को चोट पहुंचाने वाला होता है। इसी प्रकार किसी सैनिक को युद्घ क्षेत्र में यदि वीरगति प्राप्त होती है तो उस पर संपूर्ण राष्ट्र को ही नाज होता है। अब यदि किसी सैनिक का आगे बढऩा और बढ़ते-बढ़ते वीरगति प्राप्त कर लेना उसके राष्ट्र के लिए गौरवप्रद है तो उसका पीछे हटना राष्ट्र के लिए अपमानजनक हो जाना स्वाभाविक ही है। युद्घ क्षेत्र में हम राष्ट्र होते हैं, हमारे प्राणों पर राष्ट्र का अधिकार होता है। हम जब समाज या राष्ट्र के अधिकारों की बात कहते हैं तो उसमें यह व्यवस्था भी सम्मिलित है कि अपने सैनिकों के शरीर, मन और प्राणों पर राष्ट्र का अधिकार होता है। सेना में सम्मिलित होने का अभिप्राय है अपने शरीर, मन और प्राणों को राष्ट्र को सौंप देना। शरीर, मन और प्राणों को राष्ट्र को सौंपने वाला कोई सैनिक यदि युद्घ क्षेत्र से भागता है तो उसका यह कार्य मनु ने राष्ट्रद्रोह इसीलिए घोषित किया कि उसने सेना में भर्ती होते समय राष्ट्र को जो वचन दिया था उसको उसने भंग किया है। इसलिए यह राष्ट्र के विरूद्घ अपराध है।

आप देखें एक अध्यापक राष्ट्र के लिए क्या देता है, उत्तर है-अपनी बौद्घिक क्षमताओं का दान। इसी प्रकार एक मजदूर अपनी शारीरिक क्षमताओं का दान राष्ट्र के लिए करता है। परंतु एक क्षत्रिय वीर सैनिक इन सबसे बढक़र अपना सर्वस्व अपने राष्ट्र के लिए समर्पित करता है। दिये हुए दान को वापिस लेना भारत की क्षत्रिय परंपरा के विरूद्घ है, एक पाप है। यही कारण है कि सेना में भर्ती होने वाला कोई सैनिक यदि युद्घ से भागता है तो वह एक पाप करता है। इसी मान्यता को दृष्टिगत रखते हुए मनु महाराज आगे कहते हैं-
यच्चास्य सुकृतं किंचिद मुत्रार्थमुपार्जितम्।
भर्ता तत्सर्वमादते परावृत्तहतस्यतु ।। 95।। (70)
''और जो उसकी (सैनिक की) प्रतिष्ठा है जिससे इस लोक और परलोक में सुख होने वाला था, उसको उसका स्वामी (राष्ट्र या राजा) ले लेता है, जो भागा हुआ मारा जाए उसको कुछ भी सुख नही होता, उसका पुण्यफल नष्ट हो जाता है और उस प्रतिष्ठाता को वह प्राप्त होता है जिसने धर्म से (अपने राष्ट्र के प्रति पूर्णनिष्ठा व्यक्त करते हुए) यथावत युद्घ किया हो।'' (स.प्र. 150)

जीते हुए धन पर अधिकार किसका
युद्घ में जब एक पक्ष जीतता है तो स्वाभाविकरूप से पराजित राजा से धनादि का उपहार लिया जाता है। इस उपहार को कौन रखे या युद्घ में प्राप्त धनादि पर किसका अधिकार हो इसे मनु स्पष्ट करते हुए लिखते हैं :-
रथाश्वं हस्तिने छत्रं धनं धान्यं प्रशून्स्त्रिय:।
सर्वद्रव्याणि कुप्यं च यो यज्जयति तस्य तत।।
अर्थात '' (राजा) इस व्यवस्था को कभी न तोड़े कि लड़ाई में जिस जिस अमात्य या अध्यक्ष ने रथ घोड़े, हाथी, छत्र, धन, धान्य, गाय आदि पशु तथा स्त्रियां तथा अन्य प्रकार के सब द्रव्य और घी तेल आदि के कुप्पे जीते हों, वही उस उसका ग्रहण करें।''
(स.प्र. 150)

तुर्क और मुगलादि जब भारत पर चढ़ाई करते थे तो उनकी चढ़ाई का एक महत्वपूर्ण कारण इस देश को लूटना भी होता था। इन विदेशियों ने ऐसे हमले बार-बार किये और इस देश के लोगों को इतना लूटा कि 'लूट का माल' नाम का एक मुहावरा ही बन गया। महर्षि मनु के उपरोक्त श्लोक भी कुछ ऐसा ही लगता है कि जैसे वह भी 'लूट का माल' मारने की खुली छूट अपने सैनिकों को दे रहे हैं। परंतु वास्तव में ऐसा नही है-तुर्क और मुगल या कोई भी विदेशी हमलावर जनसाधारण का नरसंहार करके लूट मचाता था पर मनु के इस श्लोक में ऐसे किसी नरसंहार की संस्तुति नही की गयी है। यहां तो युद्घ के लिए चढ़ आये राजा के धनादि के विषय में अथवा किसी दुष्ट राजा को दंडित करने के लिए निकली हमारी सेनाओं की विजय के क्षणों में दूसरे राजा के शिविर से मिले धन या दूसरे राजा द्वारा किये गये आत्मसमर्पण के संबंध में ही संकेत किया गया है, अथवा व्यवस्था दी गयी है। दूसरे स्त्रियों को यहां 'लूट का माल' नही माना गया है, तीसरे उनके साथ अपमानजनक व्यवहार का कोई संकेत नही किया गया है। बस, केवल इतना कहा गया है कि यदि किसी राजा की पराजय की स्थिति में उससे कोई धनादि या स्त्रियां प्राप्त होती हैं तो उन पर किसका अधिकार होगा?
क्रमश: