राजा युद्घ में स्वयं भाग ले, भाग-2

  • 2016-09-30 09:30:43.0
  • राकेश कुमार आर्य

राजा युद्घ में स्वयं भाग ले, भाग-2

नच हन्यात्स्थलारूढ़ न क्लीव न कृतांजलिम्। न मुक्तेकेशं नासीन न तवास्मीति वादिनम्।। 91 ।।
न सुप्तं न विसन्नाहं न नग्नं न निरायुद्घम्। नायुध्यमानं पश्यन्तं न परेशा समागतम् ।। 92।।
नायुद्घ व्यसनप्राप्तं नात्र्तं नातिपरिन्क्षतम्। न भीतं न परावृतं सतां धर्म मनु स्मरन् ।। 93 ।।

मनु कह रहे हैं-''युद्घ समय में, न उधर-इधर खड़े (तमाशबीन=युद्घ का दृश्य देखने आने वाले लोग) न नपुंसक, न हाथ जोड़े हुए, न जिसके सिर के बाल खुल गये हों, न बैठे हुए, न 'मैं तेरी शरण हूं' ऐसे (व्यक्ति) को न सोते हुए (को) न मूर्छा को प्राप्त हुए, न नग्न हुए न आयुद्घ से रहित, न युद्घ न करते हुए देखने वाले को, न शत्रु के साथी, न आयुद्घ के प्रहार से पीड़ा को परास्त हुए न दुखी न अत्यंत घायल, न डरे हुए और न पलायन करते हुए पुरूष को, सत्पुरूषों के धर्म का स्मरण करते हुए को योद्घा लोग कभी न मारें।''

(वादिनम्) कहते हुए-
''किंतु उनको पकड़ के जो अच्छे हों, उन्हें बंदीगृह में रख दे और भोजन आच्छादन यथावत देवे और जो घायल हुए हों, उनकी औषध आदि विधि पूर्वक करे। न उनको चिढ़ावें, न दुख देवें-जो उनके योग्य काम हो वह करावे। विशेष इस पर ध्यान रखे कि स्त्री, बालक, वृद्घ और आतुर तथा शोकयुक्त पुरूषों पर शस्त्र कभी न चलावे। उनके लडक़ों को अपने संतानवत पाले तथा स्त्रियों को भी पाले, उनको अपनी बहन और कन्या के समान समझे, कभी विषया- सक्ति की दृष्टि से भी न देखें। जब राज्य अच्छे प्रकार जम जाए और जिनसे पुन: पुन: युद्घ करने की शंका न हो-उनको सत्कारपूर्वक छोडक़र अपने-अपने घर वा देश को भेज देवें और जिनसे भविष्यत काल में विघ्न होना संभव हो, उनको सदा कारागार में रखें।'' [(91, 92, 93) स.प्र. 150]

इस धरा पर कोई देश या कोई सभ्यता ऐसी नही होगी जो भारत के इस युद्घ धर्म का पालन करती हो या इसे अपनाने की बात सोचती हो। अपनाना तो दूर उनकी तो कल्पना भी नही होगा कि कोई युद्घ-धर्म भी होता है। कोई माने या न माने पर भारत आज भी 'विश्वगुरू' है। क्योंकि जो लोग या संप्रदाय आई.एस.आई.एस. या हिजबुल मुजाहिदीन के समर्थक हों, या उन जैसे आतंकी संगठनों की गतिविधियों को प्रोत्साहन देते हों, और जिनके संकेत से ये संगठन बच्चों, महिलाओं, वृद्घों, अपंगों, निरपराधों आदि पर समान रूप से अत्याचार कर रहे हों, उनके लिए आज भी भारत से बहुत कुछ सीखने को मिल सकता है।

भारत आज भी ऐसा है कि जिसके देहात में युद्घ में लोग बच्चों का महिलाओं का वृद्घों का और निरपराधों का सम्मान करते हैं। जिन लोगों को मनु की यह व्यवस्था काल्पनिक जान पड़ती है वे भारत के ग्रामीण आंचलों में चलने वाली किसी लड़ाई को देख सकते हैं या भारत के देहात पर सर्वेक्षण कर सकते हैं-कि वे लोग किन-किन लोगों को युद्घ में अवध्य मानते हैं। पता चलेगा कि वहां 'मनुवाद' का झण्डा बड़ी शान से फहरा रहा है और वहां आज भी मनुवादी (व्यवस्था) संविधान चलता है।

महर्षि मनु के जैसे महामानवों के कारण ही भारत में कबीलाई संस्कृति नही पनप सकी। कबीलों में होने वाले संघर्ष, पीढिय़ों तक चलते थे और कभी-कभी तो एक पूरा का पूरा कबीला ही ऐसे संघर्षों की भेंट चढ़ जाता था। भारत में कभी ऐसे कबीलाई संघर्ष की जानकारी नही मिलती। संघर्ष यहां भी चले हैं और आज भी होते हैं, परंतु ये संघर्ष किसी और प्रकृति के हैं। हमारा मानना है कि मनु की युद्घ काल में अवध्य लोगों की यह सूची ज्यों की त्यों विश्व के लोकतांत्रिक देशों के संविधानों में तथा संयुक्त राष्ट्र के संविधान में समाहित की जाए। जिस दिन इस धरा पर युद्घ धर्म और युद्घ के नियम लागू हो जाएंगे उस दिन विश्व से युद्घ और युद्घ की विभीषिकाएं-स्वयं ही समाप्त हो जाएंगी। संसार के लोग युद्घ से भयभीत हंै और कथित प्रगतिशील लोग नित्यप्रति ही युद्घ के लिए हथियार एकत्र कर रहे हैं।

युद्घ और भगौड़े
युद्घ से पलायन करना भारत में प्रारंभ से ही घृणा की दृष्टि से देखा जाता रहा है। महर्षि मनु लिखते हैं :-
यस्तुभीत: परावृत्त: संग्रामे हन्यते परै:।
भर्तुयद् दुष्कृतं किंचित्तत्सर्व प्रतिपद्यते।
।। 94।।

और ''जो युद्घ क्षेत्र में पीठ दिखाकर भाग जाए अथवा डरकर भागता हुआ शत्रुओं के द्वारा मारा जाए, उसे राजा की ओर से प्राप्त होने वाला जो कुछ भी दण्ड हो, अपराधीभाव व बुराई है, उस सबका पात्र बनकर वह दण्डनीय होता है अर्थात राजा के मन में उसकी श्रेष्ठता का प्रभाव समाप्त हो जाता है और राजा उसकी सुख सुविधा को छीनकर दण्ड देता है।''
''और जो पलायन अर्थात भागे और डरा हुआ भृत्य शत्रुओं द्वारा मारा जाए वह उस स्वामी के अपराध को प्राप्त होकर दण्डनीय होवे।''
(स.प्र. 150)

भारत में आज भी 'युद्घ से पीठ दिखाने' का एक मुहावरा प्रचलित है। 'पीठ दिखाने' को लोग बहुत ही अपमानजनक और कुल को कलंकित करने वाला मानते हैं। मध्यकाल में तुर्कों व मुगलों से युद्घ करने के लिए हमारी माताएं और बहनें स्वयं अपने हाथों से अपने पुत्र या पति का तिलक करके या किसी भी अन्य ऐसी रीति या परंपरा का अवलंब लेकर युद्घ के लिए भेजा करती थीं, जिससे वह युवा देश के प्रति भक्तिभावना से भर जाता था और युद्घ क्षेत्र से पलायन नही करता था। ऐसे भी कई गौरवपूर्ण उदाहरण हमें अपने इतिहास में देखने को मिलते हंत कि जब किसी हिंदू सैनिक (राजपूत) ने युद्घ से यदि किसी कारण से पलायन कर भी लिया तो उसे ऐसा करने पर उसकी माता या पत्नी ने ही धिक्कारा और पुन: युद्घ के लिए प्रेरित कर घर से भगा दिया।
क्रमश: