सचिवालय का निर्माण और कर्मचारियों के आचरण का निरीक्षण,भाग-4

  • 2016-10-28 13:30:05.0
  • राकेश कुमार आर्य

सचिवालय का निर्माण और कर्मचारियों के आचरण का निरीक्षण,भाग-4

पश्चिमी उत्तर प्रदेश के देहात में एक शब्द प्रचलित है-'धौण धै सेर'-यह द्रोण धान्य (64) सेर से ही बना है। इस शब्द के प्रचलन से आप अनुमान लगा सकते हैं कि मनुस्मृति की टूटी फूटी व्यवस्था किस प्रकार आज भी भारत के लोगों का मार्गदर्शन कर रही है, और यह कितने समय से भारत के लोगों का मार्गदर्शन करती आ रही है? यह भी अनुमान लगाना चाहिए। ये छोटी-छोटी बातें स्पष्ट करती हैं कि मनु की व्यवस्था कभी इस देश की सर्वस्वीकृत व्यवस्था रही है, जिसने इस देश के लोगों को अपने अनुसार चलाने का सराहनीय कार्य किया है। कितने युग बीत गये, परभारत के लोगों की जुबान पर शब्द आज भी चढ़ा है-'धौण धै सेर।'


कौटिल्य के अनुसार वेतन
चाणक्य अर्थात कौटिल्य भारत की राजनीति के लिए कोई अपरिचित नाम नहीं है। कौटिल्य भारतीय राजनीति को अथवा राज्य व्यवस्था को प्रारंभ से ही दिशा देते आये हैं, और आज भी भारत के इस महान राजनीति शास्त्री अथवा कूटनीति के महान विशेषज्ञ को लोग सम्मान से स्मरण करते हैं। कौटिल्य के अनुसार वेतन की व्यवस्था निम्न प्रकार की गयी है-

(1) ऋत्विक, आचार्य, मंत्री, पुरोहित, सेनापति, युवराज, राजमाता, रानी इनको प्रतिवर्ष 48 हजार पण दिये जाएं।
आज की व्यवस्था में ऋत्विक, आचार्य, की कोई व्यवस्था नही है। आजकल की राजनीति ने बेकार की और बोझ मारने वाली चीज समझकर छोड़ दिया गया है। इसके पीछे अंगेजों की चाल रही है, क्योंकि वे लोग भारत की संस्कृति से जुड़ी किन्हीं परंपराओं को आगे बढ़ाने के विरोधी थे। अंग्रेज नहीं चाहते थे कि भारतीय संस्कृति और धर्म को लोग समझते रहें और उनके अनुसार अपनी व्यवस्था को आगे बढ़ाते रहें। यही कारण रहा कि अंग्रेजों ने हमारी संस्कृति के मूल्यों को इस देश से विदा करने का हरसंभव प्रयास किया। उन्हें अपनी ईसाइयत की जड़ें जमाने के लिए यहां कार्य करना था। अंग्रेज अपनी ईसाइयत की शिक्षा देने वाले पादरियों की आवश्यकता अनुभव करते थे, इसलिए उन्होंने अपने पादरियों को इस देश ेंमें प्राथमिकता दी।

हम देशवासियों के लिए यह दुर्भाग्य का विषय है कि स्वतंत्र भारत में भी अन्य धर्मावलंबियों के धर्मगुरूओं को और प्रचारकों को तो धर्मनिरपेक्षता के नाम पर भारतवर्ष में राज्य की ओर से सुविधाएं दी जाती हैं, पर वैदिक धर्म के ऋत्विक, आचार्य व पुरोहित की व्यवस्था ऐसी नही की गयी है जिससे कि वह अपना सम्मानजनक जीवन यापन कर सकें और लोगों को नैतिक बनाने के लिए वेद धर्म का प्रचार कर सकें। ऐसी अव्यवस्था के कारण जो लोग वेदधर्म के सत्य से दूर हो गये हैं वे अपने इतिहास धर्म और संस्कृति से या तो दूर हो गये हैं, या उसे ना समझी के कारण दोषयुक्त और त्रुटिपूर्ण मानकर उसमें कमियां निकालने का काम करते रहते हैं।

भारत की वर्तमान राज्य व्यवस्था का यह आत्मघाती निर्णय है कि यहां पर आज भी अपनी धर्म संस्कृति और इतिहास से जुड़ी यादों को सहेजने में हम प्रमाद का प्रदर्शन करते हैं। इस प्रमाद प्रदर्शन के कारण स्वतंत्रता के दशकों के बीत जाने के उपरांत भी हमारे सांस्कृतिक उत्थान की दिशा में सरकारों द्वारा कोई कार्य नही किया गया है। जिससे सांस्कृतिक राष्ट्रवाद की बातें भारत में करना कुछ लोगों ने साम्प्रदायिकता के साथ जोडक़र देखना आरंभ कर दिया है।

(2) द्वारपाल, अंत:पुर का अधिकारी, आयुध्याध्यक्ष, समाहत्र्ता अर्थात कर संग्रह का अधिकारी, कोष्ठगाराध्यक्ष, इनको चौबीस हजार पण प्रतिवर्ष मिलने चाहिए।
ये सारे अधिकारी अत्यंत विश्वसनीय होते हैं। इनको आकर्षक वेतन से अपने साथ बांधे रखना राजा का कत्र्तव्य है। जितने भरोसे के पदों पर इनकी नियुक्ति होती है, उसी के अनुसार इनका वेतन होना ही चाहिए। आज भी हम देखते हैं कि अत्यंत संवेदनशील पदों पर नियुक्त अधिकारियों का वेतन और सुविधाएं कुछ अधिक ही रखी जाती हैं।

(3) राजकुमार के भाई, उपसेनापति, व्यापाराध्यक्ष, हस्ति, अश्व-रथ अध्यक्ष, दण्डाधिकारी 800 पण वेतन प्रतिवर्ष ।
इसी प्रकार अन्य भृत्यों के विषय में भी कौटिल्य ने व्यवस्था की है। कौटिल्य से पूर्ववर्ती मनु हैं, इसलिए मनुकालीन व्यवस्था को ही कौटिल्य ने अपने समय में देश, काल, परिस्थिति के अनुसार ढाल लिया था। कौटिल्य ने यदि ऐसा किया भी, तो उसे अनुचित नही कहा जा सकता। देश, काल और परिस्थिति के अनुसार हमें व्यवस्था में परिवर्तन कर भी लेना चाहिए। यह लोकतंत्र का तकाजा है।
अंग्रेजों ने हमारे देश में अपने कानूनों को लादकर इस देश का शोषण करने का हरसंभव प्रयास किया था। उनके कानूनों में शोषण की गंध आती थी, और आती है। क्योंकि वे लोग भारत पर उपनिवेशवादी व्यवस्था को थोपने वाले थे, और किसी भी उपनिवेशवादी शासक से अपनी जनता के प्रति सहृदयी होने की अपेक्षा नहीं की जा सकती। सहृदयता उसी शासन में होगी जो स्वराज्य और सुराज्य में विश्वास रखता हो। मनु की सारी व्यवस्था स्वराज्य और सुराज्य की संकल्पना को साकार करने पर टिकी है।
क्रमश: