सचिवालय का निर्माण और कर्मचारियों के आचरण का निरीक्षण,भाग-3

  • 2016-10-28 09:00:43.0
  • राकेश कुमार आर्य

सचिवालय का निर्माण और कर्मचारियों के आचरण का निरीक्षण,भाग-3

अपराधी को बिना विचारे मार डालो
अर्थात अपराधी चाहे गुरू हो चाहे पुत्रादि बालक हो, चाहे पिता आदि वृद्घ और चाहे बहुत शास्त्र का श्रोता क्यों न हो, जो धर्म छोडक़र अधर्मरत होकर निरपराधियों की हत्यादि करने वाला आततायी है उसको बिना विचारे मार डाले अर्थात मारकर विचार करे, क्योंकि आततायी के मारने में कोई पाप नहीं होता। उसे चाहे प्रकट रूप में मारो चाहो तो गुप्त रूप से मारो। वह क्रोध का क्रोध को प्राप्त होना है।

इस श्लोक में 'बिना विचारे मारने' की सलाह दी गयी है कि राजा आततायी को (चाहे वह कोई भी हो) बिना विचारे मार डाले। इस बात को पढक़र लगता है कि मनु अविवेकी बात कह रहे हैं। यह कहां का न्याय है कि अपराधी को बिना विचारे मार डाले और पीछे विचार करे। इससे तो बेहतर आज की न्याय व्यवस्था है जो अपराधी को अपना पक्ष रखने का पूर्ण अवसर प्रदान करती है। इस श्लोक पर यदि गंभीरता से विचार करें तो बिना विचार मार डालने की बात उचित ही है। इसका अभिप्राय ये है कि जो व्यक्ति अपराधी सिद्घ हो चुका, अब वह चाहे जो कोई भी हो यहां तक कि राजा का अपने परिवार का व्यक्ति ही क्यों न हो, उसे यथाशीघ्र समाप्त कर दिया जाए। उससे किसी प्रकार का लगाव या अपनापन दिखाने की या किसी प्रकार के मोह के प्रदर्शन की आवश्यकता नहीं है। इस प्रकार की न्याय व्यवस्था का उद्देश्य समाज के दलित शोषित वर्ग के अधिकारों की रक्षा करना नहीं तो क्या है? मनु की हर व्यवस्था विकास की पंक्ति में सबसे पीछे खड़े व्यक्ति का साथ देने की है, अर्थात वे पूर्णत: अन्त्योदयवादी है।

राज्यकर्मियों के वेतन की व्यवस्था
अपनी व्यवस्था को सुचारू रूप से चलाने के लिए मनु कर्मचारियों के वेतन की बात भी कहते हैं कि राज्यकर्मियों को राजा के द्वारा वेतन भी दिया जाना चाहिए, जिससे कि उनका जीवन यापन हो सके। वेतन का अभिप्राय ये है कि जो लोग स्वयंसेवी होकर राज्यकार्यों के लिए अपना पूरा समय दे रहे हैं, उनके जीवन यापन के लिए राज्य भी ऐसी व्यवस्था करे कि उन्हें अपनी घर गृहस्थी की कोई चिंता ना रहे। मनु की इस वेतन व्यवस्था में और अंगेजों की वेतन व्यवस्था (क्कड्ड4द्वद्गठ्ठह्ल) में भारी अंतर है। पेमेंट का अभिप्राय तो भुगतान है। जिसका अर्थ हुआ कि तुम्हारी सेवाओं केा और तुम्हारी निष्ठा को हमने इतने रूपयों के बदले में खरीदा है-इसलिए उसका भुगतान ले लो। जबकि मनु की वेतन व्यवस्था राज्यकर्मियों की सेवाओं का राज्य की ओर से विनम्र प्रतिकर है। भुगतान कम हो तो उसके लिए संघर्ष हो सकता है, नारेबाजी हो सकती है क्योंकि उसमें अन्याय की पूरी-पूरी संभावना है, परंतु सेवा के प्रतिकर को लेकर कभी संघर्ष या नारेबाजी नहीं हो सकती है, क्योंकि उसमें एक ओर से कत्र्तव्य परायणता है तो दूसरी ओर से विनम्रता है, कहीं शत्रुभाव नहीं है।

विधवा/परिवार पेंशन, मृतकाश्रित नौकरी
मनु कहते हैं :-
राजा कर्मसु युक्तानां स्त्रीणां प्रेष्य जनस्य च।
प्रत्यहं कल्पयेदवृत्ति स्थानम् कर्मानुरूपत:
।। 125।। (97)

अर्थात ''जितने से उन राजपुरूषों का योगक्षेम भलीभांति हो और वे भलीभांति धनाढ्य भी हों, उतना धन वा भूमि राज्य की ओर से मासिक, वार्षिक अथवा एक बार मिला करे, और जो वृद्घ हों उनको भी आधा मिला करे, परंतु यह ध्यान में रखें कि जब तक वे जियें तब तक वह जीविका बनी रहे, पश्चात नहीं। परंतु इनके संतानों का सत्कार व नौकरी उनके गुण के अनुसार अवश्य देवें और जिसके बालक जब तक समर्थ हों और उनकी स्त्री जीती हो तो उन सबके निर्वाहार्थ राज की ओर से यथायोग्य धन मिला करे। परंतु जो उसकी स्त्री वा लडक़े कुकर्मी हो जाएं तो कुछ भी न मिले, ऐसी नीति राजा बराबर रखें।''
(स.प्र. 156)

इस श्लोक के भावार्थ में महर्षि ने विधवा पेंशन, परिवार पेंशन, मृतकाश्रित नौकरी आदि की वर्तमान व्यवस्था को मनु की प्राचीन व्यवस्था के साथ जोड़ दिया है। कहने का अभिप्राय है कि राज्य के ये सारे लोक कल्याणकारी कार्य मनु की व्यवस्था की देन हैं। जिन पर आज संपूर्ण विश्व को मनु का ऋणी होना चाहिए। बहुत से देशों में लोगों या राजकर्मियों को अपने इन अधिकारों की प्राप्ति के लिए बड़े-बड़े आंदोलन करने पड़े हैं, बलिदान देने पड़े हैं और संघर्षों से जूझना पड़ा है पर भारत में ऐसे आंदोलन कभी नहीं हुए क्योंकि यहां तो ये सारे राज्य कार्य भारतीय राज्यव्यवस्था के मौलिक संस्कार के रूप में उसमें पूर्व ही उल्लेखित रहे हैं।

वेतन कितना रखा जाए
मनु महाराज अपने अगले श्लोक में राज्य कर्मचारियों के वेतन की भी व्यवस्था करते हैं वह बताते हैं :-
पण्ये देयो अब कृष्टस्य षड़त्कृष्टस्य वेतनम्।
षाण्मासिक स्तथाच्छादो धान्य द्रोणस्तु मासिक:।।
।। 125।। (97)
''निम्न स्तर के भृत्य को कम से कम एक पण और ऊंचे स्तर के भृत्य को छह पण वेतन प्रतिदिन देना चाहिए तथा उन्हें प्रति छह माह पर ओढऩे पहनने के वस्त्र और एक महीने में एक द्रोण (64 सेर) धान्य=अन्न देना चाहिए।'' क्रमश:

राकेश कुमार आर्य ( 1580 )

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