सचिवालय का निर्माण और कर्मचारियों के आचरण का निरीक्षण

  • 2016-10-24 09:30:02.0
  • राकेश कुमार आर्य

सचिवालय का निर्माण और कर्मचारियों के आचरण का निरीक्षण

किसी भी महान व्यक्तित्व के संत पुरूष को यूं तो किसी प्रकार के ऐश्वर्य के प्रदर्शन की आवश्यकता नही होती है और ना ही वास्तविक ज्ञानी पुरूष अपने लिए महलों का निर्माण करते कराते हैं, वे तो बड़े आराम से झोंपड़ी में रह लेते हैं, परंतु संसार के लोग किसी राजा या उच्चाधिकारी को ऐश्वर्यपूर्ण राजभवनों में रहते देखकर ही प्रभावित होते हैं।

प्राचीनकाल से ही राजा या राजाधिकारियों को ऐश्वर्यशाली राजभवनों में देखने के लोग इच्छुक रहते आये हैं। यही कारण है कि आज भी हमारे राजभवन (संसद या विधानमंडल/सभा) ऐश्वर्यपूर्ण ढंग से बने होते हैं। मनुष्य के स्वभाव को महर्षि मनु ने बड़ी सूक्ष्मता से अध्ययन किया था। यह उनकी पारखी नजर का ही कमाल था कि उन्होंने नगरों में सचिवालयों को प्रभावोत्पादक ढंग से बनाने की योजना प्रस्तुत की थी। वह जानते थे कि राज सचिवालयों को वैभवपूर्ण और ऐश्वर्यपूर्ण ढंग से निर्मित होना ही जनता को प्रभावित करेगा। अत: महर्षि मनु ने व्यवस्था प्रतिपादित की थी कि-
नगरे नगरे चैकं कुर्यात्सर्वार्थचिंतकम्।
उच्चै:स्थानम् घोररूपं नक्षत्राणामिवग्रहम्।।
।। 121 ।। (21)

अर्थात ''राजा बड़े-बड़े प्रत्येक नगर में एक-एक जैसे नक्षत्रों के बीच में चंद्रमा है इस प्रकार विशाल और देखने में प्रभावकारी भयकारी अर्थात जिसे देखकर या जिसका ध्यान करके प्रजाओं में नियमों के विरूद्घ चलने में भय का अनुभव हो जिसमें सब राजकार्यों के चिंतन और प्रजाओं की व्यवस्था और कार्यों के संचालन का प्रबंध हो, ऐसा ऊंचा भवन अर्थात सचिवालय बनावें।'' ''बड़े-बड़े नगरों में एक-एक विचार करने वाली सभा का सुंदर उच्च और विशाल जैसा कि चंद्रमा है, वैसा एक-एक घर बनावे। उसमें बड़े-बड़े विद्यावृद्घ कि जिन्होंने विद्या से सब प्रकार की परीक्षा की हो वे बैठकर विचार किया करें। जिन नियमों से राजा और प्रजा की उन्नति हो वैसे वैसे नियम और विद्या प्रकाशित किया करें।''
(स.प्र. 155)

भारत ने राजभवनों और ऐतिहासिक स्थलों को विशेष रूप से आकर्षक बनाने की कला प्राचीनकाल से ही सीख ली थी। इस विद्या को सिखाने में महर्षि मनु के विधान के उपरोक्त श्लोक ने अपना विशेष योगदान दिया। जिस देश की राज्य व्यवस्था सीधे स्पष्ट शब्दों में राजभवनों को विशेष गौरवपूर्ण ढंग से बनाने की शिक्षा देती हो, उसमें कुशल कारीगरों का मिलना स्वाभाविक है, और साथ ही वहां उन्नत स्थापत्य कला का विकास होना भी अवश्यम्भावी है।

मनु की इस व्यवस्था के कारण ही प्राचीन भारत (आर्यावत्र्त) में जब विश्व की पहली राजधानी अर्थात अवधपुरी का निर्माण किया गया था तो उसको विशेष ढंग से गौरव प्रदान करते हुए बनाया गया था। इसके आठ चक्र तथा नौ द्वार बनाये गये थे और इसका वैभव इतना चकाचौंध करने वाला था कि विश्व के सभी नगर या महानगर इसकी शानोशौकत के सामने अपने आपको फीका अनुभव करते थे।
बारोन डेल्बर्ग अपने जीवन काल में जब भारत आया तो उसे द्वारका देखने का भी अवसर मिला था। इस प्राचीन नगरी की वास्तुकला को देखकर वह इतना आश्चर्यचकित हुआ था कि उसने श्रीकृष्ण जी की इस नगरी का नाम ही आश्चर्यजनक नगर रख दिया था। तब उसने कहा था-''उस देश (भारत अर्थात आर्यावत्र्त) के निवासियों ने खोदकर बनायी जाने वाली गुफा के निर्माण एवं उसे अलंकृत करने में अन्य देशवासियों की अपेक्षा बहुत उच्चपूर्ण एवं श्रेष्ठ दक्षता प्रदर्शित की है।''

महर्षि मनु ने भारत की स्थापत्य कला को राजाश्रय प्रदान करा दिया तो उसका परिणाम यह निकला कि भारत भवन निर्माण और स्थापत्य कला के क्षेत्र में विश्व में अग्रणी हो गया।
भारत की राज्य व्यवस्था कबीलों की व्यवस्था नही थी, जहां एक कबीले ने अन्य कबीलों पर विजय प्राप्त करके उन्हें अपने अधीनस्थ लाकर राज्य करना आरंभ किया था। इन कबीलों में रक्तिम संघर्ष चलते थे और उस संघर्ष में जो जीत जाता था उसे ही अन्य कबीलों पर अपना राज्य स्थापित करने और उन्हें अपना गुलाम बनाने का अवसर मिल जाता था। इन कबीलों के प्रमुखों ने अपने लिए बड़े भवन बनवाये थे। क्योंकि पापी पाप करके स्वयं भी डरता है। अत: मनु के राजा के हृदय में अपने लिए भवन बनवाकर जहां प्रसन्नता का सात्विक गुण या भाव मिलता है वहीं पश्चिम की कबीलाई संस्कृति में अपने लिए भवन बनवाकर भी भय मिलता है यह प्रवृत्ति तो पूर्णत: तामसिक है। परिणामस्वरूप पश्चिमी जगत अज्ञानांधकार में जहां भटकता रहा, वहीं भारत ज्ञान के सात्विक प्रकाश में सीना तानकर चलता रहा।

राजकर्मचारियों के आचरण का निरीक्षण
महर्षि मनु का कथन है :-
स ताननुपरिक्रामेत्सर्वानेव सदा स्वयम्।
तेषां वृत्तं परिणयेत्सम्यग्राष्ट्रेषु तत्च्चरै:।।
।। 122 ।। (94)

अर्थात ''वह सचिव=प्रमुख मंत्री उन निर्मित सब सचिवालयों का सदा स्वयं घूम फिर कर निरीक्षण करता रहे और देश में अपने दूतों के द्वारा वहां नियुक्त राजपुरूषों के आचरण की गुप्तरीति से जानकारी प्राप्त करता रहे।'' जो नित्य घूमने वाला सभापति हो उसके अधीन सब गुप्तचर और राजदूतों को रखे जो राजपुरूष और भिन्न भिन्न जाति के रहें, उनसे सब राज और प्रजा पुरूषों के सब दोष और गुण गुप्तरीति से जाना करे। जिनका अपराध हो उनको दण्ड और जिनका गुण हो उनकी प्रतिष्ठा सदा किया करे। (स.प्र. 155-156)
यहां इस श्लोक में महर्षि मनु सचिवालयों के कार्यों का निरीक्षण करने की बात कह रहे हैं। इसके लिए न केवल प्रमुख मंत्री ऐसा कार्य करता रहे अपितु उसे अपने अन्य लोगों से भी सचिवालयों के निरीक्षण का कार्य कराते रहना चाहिए। इससे यह लाभ होगा कि इन सचिवालयों का कार्य पूर्णत: पारदर्शी बना रहेगा और किसी प्रकार के भ्रष्टाचार की कोई संभावना नही होगी। प्रजा के प्रति जवाबदेह सरकार का उत्कृष्ट उदाहरण है यह व्यवस्था। इसे आजकल की सभी लोकतांत्रिक सरकारों ने अपना रखा है। क्रमश:

राकेश कुमार आर्य ( 1586 )

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