सचिवालय का निर्माण और कर्मचारियों के आचरण का निरीक्षण,भाग-2

  • 2016-10-25 12:30:38.0
  • राकेश कुमार आर्य

सचिवालय का निर्माण और कर्मचारियों के आचरण का निरीक्षण,भाग-2

अब बात यह आती है कि जिन राजकर्मचारियों को सचिवालयों के कार्यों या उनकी गतिविधियों का निरीक्षण करने का दायित्व सौंपा जाएगा उनको कैसा होना चाहिए? इस पर महर्षि मनु का कथन है-
ये कार्यिकेभ्यो अर्थमेव गृहृीयु: पापचेतस:।
तेषां सर्वस्वमादाय राजा कुर्यात्प्रवासनम्।।
।। 124 ।। (96)

''पापी मनवाले जो रिश्वतखोर और ठग राजपुरूष यदि काम कराने वालों और मुकदमे वालों से फिर भी धन अर्थात रिश्वत ले ही लें तो उनका सब कुछ अपहरण करके राजा उन्हें देश निकाला दे दे।''
''जो राजपुरूष अन्याय से वादी प्रतिवादी से गुप्त धन लेने के पक्षपात से अन्याय करे, उसका सर्वस्व हरण करके, यथायोग्य दण्ड देकर ऐसे देश में रखे कि जहां से पुन: लौटकर न आ सके। क्योंकि यदि उसको दण्ड न दिया जाए तो उसको देख के अन्य राजपुरूष भी ऐसे दुष्ट काम करेंगे और दण्ड दिया जाये तो बचे रहेंगे।'' (स.प्र.156)

मनु की व्यवस्था सही ढंग से लागू नही की गयी
आजकल की व्यवस्था में मनु की इस व्यवस्था को पूर्ण ईमानदारी से लागू नहीं किया गया है। फलस्वरूप सरकारी कार्यालयों में ही नहीं न्यायालयों तक में भ्रष्टाचार का बोलबाला है। न्यायाधीश और सरकारी अधिकारी अपने आपको कानून से ऊपर मानते हैं। इसलिए जनता को वे इन सचिवालयों और न्यायालयों में बैठकर खुल्लम खुल्ला लूट रहे हैं। इतना ही नहीं कितने ही तो मुख्यमंत्री भी अपने कार्यालयों में बैठकर जनता से उनके कार्यों को कराने के बदले में रिश्वत लेते हैं। इन लोगों की इस कार्यशैली को देखकर तो यह लगता है कि देश से अंग्रेजी शासन अभी समाप्त नहीं हुआ है। क्योंकि भारत के लोगों को विदेशी मानकर उनसे जितना कमाया जा सके-उतना कमा लिया जाए, इस मानसिकता के साथ क्रूर व्यवहार करना तो ब्रिटिश लेागों का काम था, पर आज तो देश स्वतंत्र है। अत: ऐसी कार्यशैली हमारे अपने लोगों की हो-यह बात जंचती नहीं।

अपने शासकों के प्रति भी कठोर-मनु
जब महर्षि मनु इस श्लोक को लिख रहे थे-उस समय तो शासन अपने ही लोगों का था, उस समय तो किसी मुगल या ब्रिटिश शासक की कल्पना भी नहीं थी। स्पष्ट है कि इसके उपरांत भी महर्षि मनु अपने लोगों के (शासक वर्ग) प्रति भी कठोर रहे, उन्हेांने ऐसे लोगों को देश निकाला देने का विधान करते हुए यह नहीं लिखा कि यदि ऐसा भ्रष्ट आचरणशील व्यक्ति राजपरिवार का सदस्य है या किसी उच्च कुल या जाति में उत्पन्न हुआ है तो उसके लिए सजा कम हो और यदि किसी शूद्र कुल में उत्पन्न हुआ है तो उसके लिए सजा अधिक हो। इसके विपरीत महर्षि मनु ने न्याय करते समय अपराधी को केवल अपराधी माना है और अपराधी मानकर ही उसके साथ व्यवहार किया है। आजकल भ्रष्टाचार में आकण्ठ डूबे लोगों अधिकारियों या न्यायाधीशों के विरूद्घ कोई कार्यवाही, ऐसे स्तर की नहीं होती जिससे कि अन्य अधिकारियों या न्यायाधीशों को शिक्षा मिल सके। इसका अर्थ है कि व्यवस्था उनका बचाव कर रही है और व्यवस्था व्यवस्था को ही निगल रही है। इस दु:खद अवस्था से बचने के लिए सचमुच महर्षि मनु आज भी हमारा मार्गदर्शन कर सकते हैं।

राजा का सन्ध्योपासनादि कर्म
महर्षि दयानंद जी महाराज सत्यार्थप्रकाश (षष्ठम समुल्लास) में लिखते हैं :-
''राजा सर्वदा राजकार्य में प्रवृत्त रहे अर्थात यही राजा का संध्योपासनादि कर्म है जो रात दिन राजकार्य में प्रवृत्त रहना और कोई राजकाम बिगडऩे न देना।''
यहां महर्षि दयानंद ने राजा को सन्ध्योपासनादि कर्म से छूट दे दी है? ऐसा लगता है। पर महर्षि ने राजा को संध्योपासनादि कर्म से छूट न देकर पूरी तन्मयता और ईमानदारी से राजकार्यों में उसे लगे रहने की सीख देकर उसके इस पुण्य कार्य को उतना ही पवित्र माना है जितना कि संध्योपासनादि कर्म पवित्र होते हैं। यही बात राजा के सचिवों और न्यायाधीशों आदि पर भी लागू होती है। अत: उन्हें भी चाहिए कि वे अपने कार्य पूरी निष्ठा से करें।

अथर्ववेद (8/4/24) में कहा गया है कि-''हे अन्यायनाशक राजा! (राजा अन्यायनाशक है ना कि स्वेच्छाचारी, निरंकुश अन्यायी शासक) चालाकी से पीड़ा पहुंचाने वाले आततायी पुरूष और स्त्री को मार दे, अर्थात जनता को अपने कार्यों से उत्पीडि़त करने वाले नर नारियों पर तू किसी प्रकार की दयादृष्टि मत रख और ना ही उन्हें अपना संरक्षण दे। जिन लोगों ने जनता को कष्ट देना अपना व्यवसाय बना लिया है और आतंकवादी होकर जनशोषण करते हुए प्रजा का नाश कर रहे हैं या हिंसाचार कर रहे हैं ऐसे लोग ग्रीवारहित (तलवार से उनकी गर्दन उड़ा देने की ओर संकेत है) होकर नष्ट हों, ऐसे लोग उदय होते हुए सूर्य को भी न देख पावें, तेरा न्याय इतना शीघ्रगामी होना चाहिए।''
मनु महाराज ने भी इस मंत्र को अपने शब्दों में इस प्रकार कहा है :-
गुरू वा बालवृद्घौ वा ब्राह्मणं वा बहुश्रुतम्।
आततायिन मायान्तं हन्यादेवविचारयन्
।। 8 ।। 350 ।।
नाततायी वधे दोषो हन्तुर्भवति कश्चन।
प्रकाशं वाप्रकाशं वा मन्युस्तं मन्युमृच्छति
।। 8 ।। 351 ।।
क्रमश: