मनु और वेद का राष्ट्र धर्म, भाग-7

  • 2016-12-18 11:30:37.0
  • राकेश कुमार आर्य

मनु और वेद का राष्ट्र धर्म, भाग-7

गतांक से आगे........
अर्थात 'विजित प्रदेश की इन सब प्रजाओं की इच्छा को संक्षेप से अर्थात सरसरी तौर पर जानकर कि वे किसे अपना राजा बनाना चाहती हैं या कोई और विशेष आकांक्षा हो उसे भी जानकर उस राजसिंहासन पर उस प्रदेश की प्रजाओं में से उन्हीं के वंश के किसी व्यक्ति को बिठा देवे और उससे शपथ पत्र लिखा लेवे कि अमुक कार्य तुम्हें स्वेच्छा से करना है और अमुक मेरी इच्छा से। इसी प्रकार अन्य कर अनुशासन तथा शांति बनाये रखने संबंधी प्राविधान भी उसमें हों।'


हमारे इतिहास में तुर्कों, मुगलों और अंग्रेजों से जब हमारे युद्घ हो रहे थे तो पराजित तुर्कों, मुगलों व अंग्रेजों से हमने कितनी ही बार शपथ पत्र लिये कि अब कुछ नहीं करेंगे और शांति से रहेंगे पर उन्होंने अपने वचन का बार-बार भंग किया। इस प्रकार नैतिकता का उल्लंघन करने वाले अपराधी बनकर बार-बार युद्घ करते रहे। इसके उपरांत भी इतिहास ने उनके पक्ष में निर्णय दिया। जबकि होना तो यह चाहिए था कि वचनभंग के अपराध में इतिहास उन्हें लताड़ता कि तुम्हारी जीत अनैतिक है। इतिहास की इस चूक का परिणाम ये हुआ है कि हम आजकल चुनावों के समय भी देखते हैं कि बाहुबली व्यक्ति अच्छे व्यक्ति को पराजित कर डालता है-इसके लिए चाहे उसे जनता से कितने ही झूठे वादे करने पड़ें, उसे वचनभंग की कोई चिंता नहीं होती। कितनी ही बार तो अधिकारियों से मिलीभगत करके कुछ बाहुबली लोगों द्वारा अपने विजयी होने की झूठी घोषणा भी करा ली जाती है, और हम देखते हैं कि ऐसे झूठे और मक्कार लोगों का विजय जुलूस निकलने लगता है। कहने का अभिप्राय है कि एक विधान को तोड़ा तो सारी व्यवस्था ही अस्त-व्यस्त हो गयी।
मनु के उपरोक्त विधिक प्राविधान में यह भी व्यवस्था है कि पराजित प्रदेश की जनता की राय से उनका राजा निर्वाचित किया जाए। बात साफ है कि तुम्हें जीतकर भी साम्राज्यवादी नहीं होना है, किसी के राज्य को आप हड़प नहीं सकते, अपितु जनमत का सम्मान आप जय के क्षणों में भी करेंगे।

कहना ना होगा कि मनु की इस विधिक व्यवस्था का भी लोगों ने उल्लंघन किया, और 'जो जीतेगा वही मुकद्दर का सिकंदर' कहलाएगा यह अतार्किक और अनैतिक व्यवस्था अपने लिए अपना ली। इसी अतार्किक और अनैतिक व्यवस्था ने देशों की संप्रभुता को हड़पने या नष्ट करने के लिए लोगों को प्रेरित किया। वर्तमान विश्व पूर्णत: अशांत है और किसी महाविस्फोट के मुहाने पर बैठा है-इसका एकमेव कारण है कि आपने अपने विजयी क्षणों में किसी की संप्रभुता का अपमान किया है, उससे बनी नकारात्मक ऊर्जा इस विश्व का विनाश करा देना चाहती है।
मनु की वैज्ञानिक बुद्घि को नमन है जिन्होंने इस विश्व को बहुत पहले यह संकेत दिया था कि विजय के क्षणों में इतराना नहीं, कोई गलती मत कर बैठना, उस समय भी नैतिक बने रहना, विवेक का पल्लू मत छोडऩा, न्याय करते रहना, अन्याय अनर्थ हो जाएगा। विश्व की वर्तमान राजनीतिक व्यवस्था से मनु की यह व्यवस्था पूर्णत: विलुप्त हो गयी है। आवश्यकता इस मनुवादी व्यवस्था का पुन: महिमामंडन करने की है, तभी यह विश्व बच सकता है।
क्रमश:

राकेश कुमार आर्य ( 1580 )

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