मनु और वेद का राष्ट्र धर्म, भाग-4

  • 2016-11-30 10:30:16.0
  • राकेश कुमार आर्य

मनु और वेद का राष्ट्र धर्म, भाग-4

गतांक से आगे........

मनु महाराज ने (अध्याय 7 श्लोक संख्या 181 में) कहा है कि ''राजा जब भी शत्रु के राज्य पर चढ़ाई करे तब इस निम्नलिखित विधि से सावधानीपूर्वक यानि बहुत सोच समझकर विवेकपूर्ण योजना बनाकर अर्थात व्यूह रचना करके शत्रु राष्ट्र पर चढ़ाई करे।''
व्यूह रचना के लिए सेनापति राज्य का मानचित्र फैला ले और राजा व उसके विश्वसनीय लोग व्यूह रचना के माध्यम से शत्रु को घेरकर समाप्त करें। मनु का यह भी कथन है कि ''जब राजा शत्रु देश के साथ युद्घ करने जावे तब अपने राज्य की रक्षा का प्रबंध और यात्रा की सब सामग्री यथाविधि करके सब सेना यान, वाहन, शस्त्र, अस्त्र आदि पूर्ण लेकर सर्वत्र दूतों अर्थात चारों ओर के समाचारों को देने वाले पुरूषों को गुप्त स्थापन करके शत्रुओं की ओर युद्घ करने को जावे।'' (स.प्र. 161)

जल, थल, नभ के त्रिविधि मार्ग
मनु की व्याख्या है :-
संशोध्य त्रिविधं मार्ग षडविधं च बलं स्वकम्।
सांपरायिक कल्पेन यायादरिपुरं शनै: ।। 185 ।।
''तीन प्रकार के मार्ग अर्थात एक स्थल=भूमि में, दूसरा-जल=समुद्र वा नदियों में, तीसरा-आकाश मार्गों को शुद्घ बनाकर भूमिमार्ग में रथ, अश्व, हाथी, जल में नौका और आकाश में विमान आदि यानों से जावे और पैदल, रथ, हाथी, घोड़े, शस्त्र और अस्त्र, खानपान आदि सामग्री को यथावत साथ ले, बलयुक्त पूर्ण किसी निमित्त को प्रसिद्घ करके शत्रु के नगर के समीप धीरे-धीरे जावे।'' (स.प्र. 161)
महर्षि दयानंद जी महाराज जिस समय इस श्लोक की व्याख्या या अर्थ कर रहे थे, उस समय आधुनिक विमान नहीं थे, परंतु महर्षि ने विमान शब्द का प्रयोग करके यह स्पष्ट किया है कि भारत के पास यह विद्या कितनी प्राचीन है? महर्षि ने विमानों की कल्पना जैसे उडऩखटोला आदि की या परियों के उडऩे के किस्से कहानी को वास्तविकता में दिखाने का कार्य किया। उनके पश्चात लोगों में उनकी व सत्यार्थप्रकाश की प्रेरणा से विमान बनाने की प्रेरणा उत्पन्न हुई, और एक दिन मुंबई निवासी बापूजी तलपदे ने यह कार्य करके दिखा दिया। जब यथार्थ ज्ञान यथार्थ ढंग से प्रस्तुत किया जाता है तो उसका लोगों पर प्रभाव पड़ता है। उडऩखटोला और परियों के उडऩे की कहानियां सुनने वाले को अच्छी तो लगती थीं पर वे कुछ नया करने की प्रेरणा नहीं देती थीं, पर जब महर्षि दयानंद जी महाराज जैसे वैदिक विद्वान ने यह स्पष्ट कर दिया कि विमान जैसी चीजें कभी रही हैं और उन्हें बनाया जाना भी संभव है -तो विमान बने। इस प्रकार आधुनिक काल में पूरे विश्व में विमानों का जितना जंजाल दिखता है-उसके पीछे महर्षि दयानंद की वैज्ञानिक बुद्घि का चमत्कार है।

युद्घरत राजा के लिए महर्षि मनु की आज्ञा है कि उसे युद्घ क्षेत्र में अपने लोगों पर भी तीव्र दृष्टि रखनी चाहिए। किसी भी प्रलोभन में आकर 'स्व'राजा के विरूद्घ विद्रोह कर बैठना या किसी प्रकार का विश्वासघात कर बैठना युद्घ के समय की ये मामूली घटनाएं होती हैं, इसलिए राजा को युद्घक्षेत्र में अति सावधान रहने की आवश्यकता है। हर व्यक्ति लोभ लालच में किसी न किसी सीमा तक बंधा हुआ है।

जैसे ही शत्रु पक्ष से साम, दाम, दण्ड और भेद की नीति में से कोई नीति अपनायी जाती है तो उससे किसी न किसी के नैतिक रूप से स्खलित होने की प्रबल संभावना रहती है। यही कारण है कि मनु का कथन है-''जो भीतर से शत्रु से मिला हो और अपने साथ भी ऊपर से मित्रता रखे, गुप्तता से शत्रु को भेद देवे, उसके आने-जाने में उससे बात करने में, अत्यंत सावधानी रखें, क्योंकि भीतर शत्रु ऊपर मित्र को बड़ा (कष्टकर) मित्र समझना चाहिए। (ऐसे लोगों पर युद्घ क्षेत्र में राजा को पैनी दृष्टि रखनी चाहिए।)'' (स.प्र. 161)
क्रमश:

राकेश कुमार आर्य ( 1582 )

उगता भारत Contributors help bring you the latest news around you.