राजधर्म और महाभारत, भाग-4

  • 2016-10-15 12:30:54.0
  • राकेश कुमार आर्य

राजधर्म और महाभारत, भाग-4

''गुप्तचरों द्वारा और कार्य की प्रवृत्ति से देश के शुभाशुभ वृतांत को जानकर उस पर विचार करे तत्पश्चात अशुभ का तत्काल निवारण करे और अपने राज्य के लिए शुभ का सेवन करे।''
इस श्लोक से भी यही प्रतिध्वनित होता है कि हमारे देश में प्राचीनकाल से ही प्रजातांत्रिक शासन प्रणाली ही कार्य करती रही है। कहीं पर भी राजा को स्वेच्छाचारी और प्रजा के हितों का दमन करने वाला क्रूर शासक सिद्घ करने का प्रयत्न नहीं किया गया है ना ही कोई ऐसा संकेत किया गया है। ऐसा लोकतंत्र विश्व में कहीं भी नहीं खोजा गया होगा जहां दण्ड में भी सजा न होकर सुधार हो। क्योंकि अव्यवस्था और अराजकता को दूर कर व्यवस्था को कायम करना ही तो दण्ड का उद्देश्य है। दण्ड के मूल में मर्यादा है। अव्यवस्था और अराजकता को दूर कर व्यवस्था स्थापित करने से मनुष्यों की स्वतंत्रता की रक्षा होती है इसलिए दण्ड का अंतिम उद्देश्य मनुष्यों की स्वतंत्रता की रक्षा करना सिद्घ होता है।

महाभारत के शांतिपर्व में कहा गया है कि-''दण्ड के द्वारा अदान्त (उद्घृत) लोगों का दमन किया जाता है। अत: दमन करने और दंडित करने के कारण दण्ड शब्द का प्रयोग विद्वानों द्वारा किया जाता है। मनुष्यों में कहीं असंमोह (अव्यवस्था) न मच जाए और अर्थ संरक्षण हो सके अत: मर्यादा की स्थापना की गयी, जिसे 'दण्ड' कहते हैं।''

दण्ड की इसी अवधारणा को मनु ने प्रतिपादित किया और इसी को महाभारतकार ने आगे बढ़ाया। महाभारत के उपरोक्त श्लोक में अशुभ का तत्काल निवारण करने की बात राजा के लिए कही गयी है। इसका अभिप्राय राजा से मर्यादा=धर्म=दण्ड की स्थापना की अपेक्षा करना है। उसका न्याय जब चांटे के अपराध के लिए चांटा और हत्या के अपराध के लिए फांसी तक सीमित रहता है-तब उसका दण्ड धर्म और मर्यादा के अनुसार स्थापित होता है, जो लोक को धारता है अथवा उसे साधता है। पर जब यह चांटे के अपराध पर चांटा न देकर फांसी की बात करने लगता है, अर्थात अपराध के अनुपात से अधिक सजा देने लगता है-तब राजा का दण्ड अमर्यादा और अधर्म फैलाकर स्वयं राजा के लिए ही विनाशकारी सिद्घ हो जाता है। आज के अधिकांश हमारे जनप्रतिनिधि अपने अमर्यादित दण्ड के लिए जाने जाते हैं, जो कि नितांत अनुचित है। राजा को इस स्थिति से बचने के लिए अपने योग्य मंत्रियों से विशेष मंत्रणा करते रहना चाहिए। जिससे कि उसे सही निष्कर्ष पर पहुंचने में सहायता मिलती रहे। महाभारत में कहा गया है :-
पंचापेक्षं सदामंत्रं कुर्याद्बुद्घियुतैर्नर:।
कुलवृत्त श्रुतोपेतैर्नित्यं मंत्रपरोभवेत्।।
(अ. 145/पृष्ठ 5949)

''अर्थात कम से कम पांच मंत्रियों के साथ बैठकर सदा ही राजकार्य के विषय में गुप्त मंत्रणा करे। जो बुद्घिमान, कुलीन, सदाचारी और शास्त्रज्ञान संपन्न हों, उन्हीं के साथ मंत्रणा करनी चाहिए।''
कम से कम पांच मंत्रियों के साथ मंत्रणा करने की अनिवार्यता को महाभारतकार ने राजा के राजधर्म का एक अनिवार्य अंग माना है। यह एक व्यवस्था है, जो राजा को मनमाना व्यवहार करने से रोकने में तथा उसे उचित निष्कर्ष पर पहुंचने में सहायता करती है। पर हमारी यह बात तभी पूर्ण होगी जब इस श्लोक की दूसरी अनिवार्यता या व्यवस्था पर विचार किया जाएगा। दूसरी अनिवार्यता है कि यह गुप्त मंत्रणा बुद्घिमान कुलीन, सदाचारी और शास्त्रज्ञान संपन्न व्यक्तियों अर्थात मंत्रियों के साथ ही होनी चाहिए। मूर्ख या अधकचरे ज्ञान से युक्त लोगों के साथ अथवा अविवेकी लोगों के साथ आपकी चर्चा निरर्थक ही रहती है, और कभी-कभी तो वह चर्चा विवाद का रूप भी ले लेती है। इसलिए न्यायपूर्ण निष्कर्ष पर पहुंचने के लिए चर्चा विद्वानों के मध्य ही होनी चाहिए। ऐसे लोग संकेतों से एक दूसरे की बात को समझने में समर्थ होते हैं, और उसे शीघ्र एक दूसरे की बात को समझकर जनहितों के अनुकूल एक उचित निष्कर्ष पर पहुंचा देते हैं।

राजा पक्षपाती ना हो और वह समाज के दलित, शोषित या अगड़ा-पिछड़ा समाज में बांटकर देखने की मूर्खता कदापि न करे, इसके लिए महाभारतकार ने अपने राजधर्म में विधिक व्यवस्था दी है :-
गहर्यान निगर्हयेदेव पूज्यान् सम्पूजयेत तथा।
दण्डयाँश्च दण्डयेद्देवि नात्र कार्याविचारणा।।
(अ. 145/पृष्ठ 5949)

महेश्वर उमा से कह रहे हैं कि-'देवि! शासक निंदनीय मनुष्यों की निंदा ही करे, (वह चाहे किसी भी परिवार का या कुल का क्यों न हो) पूजनीय पुरूषों का सत्कार करे (वह भी चाहे किसी भी जाति, बिरादरी, कुल-गोत्र आदि का क्यों न हो? ऐसी व्यवस्था के रहते राजा से रंग-रूप, जाति, संप्रदाय, वंश आदि के आधार पर मनुष्य -मनुष्य के मध्य अंतर करने की अमानवीय भावना की अपेक्षा नहीं की जा सकती) और दण्डनीय अपराधियों को दण्ड दे। इसमें कोई अन्यथा विचार नही करना चाहिए।'

ऐसी विधिक व्यवस्थाएं आज के कानून में नहीं है और यदि हैं भी तो उनको लागू कराने वाली संवैधानिक शास्ति का हमारे पास अभाव है।
भीष्म पितामह युधिष्ठिर को राजधर्म की शिक्षा प्रदान करते हुए कहते हैं :-
प्रजापालनयुक्तश्च न क्षति लभते क्वचित्।
युक्तिशास्त्रं च ते ज्ञेयं शब्दशास्त्रं च भारत।। 47 ।।
गांधर्व शास्त्रं च कला: परिज्ञेया नराधिप।
।। 47 ।। अ. 104

''जो राजा सदा प्रजा के पालन में तत्पर रहता है उसे कभी हानि नहीं उठानी पड़ती। भरतनंदन! तुम्हें तर्कशास्त्र और शब्दशास्त्र दोनों का ज्ञान प्राप्त करना चाहिए। गांधर्व शास्त्र अर्थात (संगीत) और समस्त कलाओं का ज्ञान प्राप्त करना आवश्यक है।''
क्रमश:

राकेश कुमार आर्य ( 1580 )

उगता भारत Contributors help bring you the latest news around you.