राजधर्म और महाभारत, भाग-3

  • 2016-10-14 11:00:22.0
  • राकेश कुमार आर्य

राजधर्म और महाभारत, भाग-3

उपरोक्त श्लोकों का अर्थ है कि-''राजा को राजोचित व्यवहारों का पालन, गुप्तचरों की नियुक्ति तथा सत्य प्रतिज्ञ होना, प्रमाद न करना, प्रसन्न रहना, कामकाज में अत्यंत कुपित न होना, भृत्यवर्ग का भरण और वाहनों का पोषण करना, योद्घाओं का सत्कार करना और किये हुए कार्य में सफलता प्राप्त करना यह सब राजाओं के इहलोक और परलोक हित के लिए श्रेयस्कर है।''

महाभारतकार भी महर्षि मनु की उसी राज्य व्यवस्था के पोषक हैं। जिसमें राजा हर स्थिति -परिस्थिति में एक जनसेवी दिखाई देता है। उसकी हर सांस अपनी प्रजा के लिए है, उसका हर कार्य ऐसा है-जिससे उसका इहलोक और परलोक बनता हो। इस प्रकार महाभारत के राजा से भी कोई ऐसी अपेक्षा नहीं की जा सकती जो जनहित की उपेक्षा करके उसे स्वेच्छाचारी और प्रमादी बनाता हो अथवा राजा 'लोक और तंत्र' के विरूद्घ कुछ भी कार्य करने का साहस कर सकता हो। महाभारतकार का भी मत है कि राजा धार्मिक हो और अपनी प्रजा को धर्म कार्य में लगे रहने का उपदेश करता हो, ऐसा कार्य कोई धर्म का मर्मज्ञ राजा ही कर सकता है। इसलिए महाभारतकार की दृष्टि में राजा का शास्त्रविद होना भी परमावश्यक है। कहा गया है :-
धर्मदण्डो न निर्दण्डो धर्मकार्यानुशासक:।
यन्त्रित: कार्यकरणै: षडभागकृतलक्षण:।।
(अ.143/38)

अर्थात ''राजा को चाहिए कि वह धर्मानुसार अपराधी को दण्ड दे, दण्ड का त्याग न करे। क्योंकि दण्ड ही धर्म की व्यवस्था को स्थापित करता है और लोगों को अनुशासन में रहना सिखाता है। राजा धर्म का शासन स्थापित किये रखने के लिए अपनी प्रजा को धर्म का उपदेश करे। राजकार्य करने के लिए नियम और विधान से स्वयं बंधा रहे, किसी भी स्थिति में स्वयं अपने द्वारा बनाये गये नियमों का उल्लंघन न करे। राजा स्वयं जितना नियमों और विधि-विधान का पालन करने वाला होगा उतने ही अनुपात में उसकी प्रजा नियम और विधि-विधान का पालन करने वाली होगी। राजा को अपनी धर्मानुसार चलने वाले राज की सफलता के लिए अपनी प्रजा से उसकी आय का छठा भाग ही आयकर के रूप में वसूलना चाहिए, इससे प्रजा को कर देने में किसी प्रकार की असुविधा नहीं होगी। कुल मिलाकर राजा को प्रजा के साथ वात्स्ल्य भाव ही प्रदर्शन करना चाहिए, यह वात्स्ल्य भाव ही राजा का प्रजा के प्रति पवित्र धर्म है।

सदाचारी राजा को जनता चुने
आजकल हम ऐसे हैकड़-मुठमर्द और सरकारी अधिकारियों के साथ मारपीट, गाली-गलौज या हाथापाई करके अपने काम कराने में कुशल व्यक्ति को अपना जनप्रतिनिधि बनाने में प्रसन्नता अनुभव करने लगे हैं। इसमें अधिकारियों का भी दोष है, ये लेाग बिना भ्रष्टाचार के जनता का कोई काम करने को तैयार नहीं होते, जबकि ये लोग जनता की सेवा के लिए और उसे सुविधा प्रदान कराने के लिए बैठाये जाते हैं। व्यवहार में राजकीय अधिकारी और कर्मचारी अपना राजधर्म भूलकर या तो पैसे वालों का कार्य करते हैं या फिर 'चांटा मारने वालों' का काम करते हैं।

प्रजा के लोगों को तो अपना काम चाहिए, अब यदि हमारा कोई हैकड़-मुठमर्द जनप्रतिनिधि इन अधिकारियों से लोगों के काम करा देता है तो वह जनता की दृष्टि में 'हीरो' बन ही जाता है। ऐसा व्यक्ति यद्यपि 'हीरो' नही होता पर हीरो बन जाता है। ऐसे जनप्रतिनिधियों के चयन की प्रक्रिया भी अलोकतांत्रिक होती है। जिसके लिए ऐसा जनप्रतिनिधि स्वयं, चयन करने वाली जनता और अधिकारी वर्ग तीनों ही जिम्मेदार हैं। यह प्रक्रिया अलोकतांत्रिक है और इससे लोकतंत्र व लोकतांत्रिक संस्थानों या संस्थाओं का हनन होता है। महाभारतकार ऐसी चुनावी प्रक्रिया का विरोधी है, वह सदाचारी शासक के चुनाव की अपेक्षा जनता से करते हुए कहते हैं :-
एष्टव्य: सततं देवि युक्ताचारो नराधिप:।
छिद्रज्ञश्चैव शत्रुणाम् प्रमत्त: प्रतापवान्।।
(अ.145/पृष्ठ 5952)

श्री महेश्वरजी उमा से कहते हैं :-''देवि! प्रजा को सदा ऐसे नरेश की इच्छा रखनी चाहिए जो सदाचारी तो हो ही साथ ही देश में सब ओर गुप्तचर नियुक्त करके शत्रुओं के छिद्रों की जानकारी रखता हो एवं सदा ही प्रमादशून्य और प्रतापी हो।''

इस श्लोक में महाभारतकार प्रजा से ऐसे राजा की इच्छा रखने की अपेक्षा कर रहा है जो सदाचारी हो। यहां पर इच्छा रखना लोकतंत्र की भावना का प्रतीक है, क्योंकि प्रजा की इच्छा का सम्मान केवल लोकतंत्र में ही संभव है, या यह कहिए कि प्रजा को कोई इच्छा रखने का अधिकार केवल लोकतंत्र शासन प्रणाली ही प्रदान करती है। शेष शासन प्रणालियां तो जनापेक्षाओं का, जनेच्छाओं का और जनमत का दमन करती है। इसीलिए लोकतंत्र सर्वश्रेष्ठ शासन प्रणाली है।

महाभारत में धृतराष्ट्र नामक राजा का सुयोधन नामक पुत्र दुराचारी, दुष्टाचारी तथा समाज और राष्ट्र के लिए दुखदायी था, इसलिए उसका नाम सुयोधन होते हुए भी दुर्योधन कर दिया गया और महाभारतकार ने उसे सर्वत्र इसी नाम से पुकारा है। राजा को शुभ का चिंतन करना चाहिए और शुभ का ही सेवन करना चाहिए। इसके लिए महाभारतकार का कथन है :-
चारैकम्रप्रवृत्या च तद्विज्ञाय विचारयेत्।
अशुभ निर्हरेत सद्योजोषयेच्छुभमात्मन:।।
(अ.145/पृष्ठ 5949)
क्रमश:

राकेश कुमार आर्य ( 1580 )

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