राजधर्म और महाभारत, भाग-1

  • 2016-10-12 03:00:47.0
  • राकेश कुमार आर्य

राजधर्म और महाभारत, भाग-1

महाभारत को पांचवां वेद कहा जाता है। इसमें हमें सामाजिक, राजनीतिक और आर्थिक न्याय प्राप्त कर आत्मोन्नति के विशेष अवसरों पर चिंतन करने का अवसर मिलता है, साथ ही यह भी जानने में सहायता मिलती है कि यदि हमने किसी के अधिकारों का अतिक्रमण किया तो उसका परिणाम विनाश के रूप में हर धृतराष्ट्र को देखना और झेलना ही पड़ता है। महाभारत से धृतराष्ट्र अपने अन्यायपूर्ण फैसलों के परिणाम भोगने के लिए बच जाते हैं, तो गांधारी माता अपने विवेकपूर्ण निर्णयों के लिए सदा जानी जाती रहीं, यदि वे भी महाभारत के युद्घ के पश्चात बचीं तो हमें उनसे भी शिक्षा लेनी चाहिए कि वे कितनी स्थितिप्रज्ञा थीं। वर्तमान में जीकर माता गांधारी सदा प्रसन्न रहती थीं। वह समय पर बोलना जानती थीं और इसलिए अपने ही पुत्र दुर्योधन को भी उसके अनैतिक कार्यों के लिए रोकने में उन्हें कोई कष्ट नही होता था।


उनकी न्यायपूर्ण भूमिका ही उन्हें महाभारत के एक अमर पात्र की श्रेणी में ले गयी। माता गांधारी से भी उच्च और पवित्र आत्मा महात्मा विदुर थे, जिन्होंने एक सुयोग्य महामंत्री की भूमिका का न्यायपूर्ण निर्वाह किया और समय मिलने पर राजा धृतराष्ट्र को भी यह बताने में कोई देरी नहीं की कि महाराज अब आपकी भूमिका न्यायपूर्ण नही रही है।

राजा की न्यायपूर्ण भूमिका से ही राष्ट्र रक्षित होता है। राजा यदि न्याय करते समय अपना-पराया नही देखता है और निष्पक्ष होकर न्याय करता है तो उसका राज्य चिरस्थायी होता है। महाभारत में कहा गया है :-
'तस्ताद्यत्नेन् कत्र्तव्यं स्वराष्ट्रपरिपालनम्।'
'इसलिए राजा को यत्नपूर्वक अपने राष्ट्र की रक्षा करनी चाहिए।'

'यत्नपूर्वक' शब्द ध्यान देने योग्य है। यह शब्द हमें बता रहा है कि राजा को सदा ही अपनी भूमिका के प्रति, अपने कार्यों के प्रति और अपने शब्दों के प्रति सावधान रहना चाहिए। यदि वह इनके प्रति थोड़ा सा भी असावधान हो जाता है तो उसकी भूमिका असंतुलित हो सकती है, जिसका प्रभाव उसके राज्य पर पड़े बिना नही रह सकता। एक ऐसा ही उदाहरण महाभारत से ही दिया जा सकता है।
महाभारतकार कहता है :-
यो रक्षिभ्य: सम्प्रदाय राजा राष्ट्रं विलुम्पति।
यज्ञे राष्ट्राद्धनम् तस्मादानयध्वमितिबुवन्।।
(अ. 61/21)
यच्चादाय तदाज्ञप्तं भीतं दत्तं सुदारूणम्।
यज्ञेद् राजा न तं यज्ञं प्रशंसन्त्यस्य साधव:।।
(अ. 61/22)
''अर्थात जो राजा प्रजा से कर के रूप में प्राप्त हुए धन को कोष की रक्षा करने वाले कोषाध्यक्ष आदि को देकर खजाने में रखवा देता है और अपने कर्मचारियों को यह आज्ञा देता है कि 'तुम लोग यज्ञ के लिए अर्थात अत्यंत परोपकारी कार्य के लिए राज्य से और धन वसूलकर लाओ' इस प्रकार यज्ञ के नाम पर जो राजा राज्य की प्रजा को लूटता है तथा उसकी आज्ञा के अनुसार लोगों को डरा धमकाकर निष्ठुरतापूर्वक लाये हुए धन को लेकर जो यज्ञ होता है उस राजा के ऐसे यज्ञ की श्रेष्ठ पुरूष प्रशंसा नहीं करते।''

कहने का अभिप्राय है कि राजा को श्रेष्ठ से श्रेष्ठ कार्य भी प्रजा का उत्पीडऩ करके नहीं करने चाहिएं। यदि ऐसा करता है तो लोक में उसकी श्रेष्ठ पुरूष निंदा करते हैं, जिससे वह अपयश का भागी बनता है।

महाभारतकार कहता है :-
अपीडि़ता: सुसंवृद्घा ये ददत्यनुकूलत:।
तादृशेनाप्युपायेन यष्टव्यं नोद्यमाहतै: ।।
(अ. 61/23)

इसलिए जो लोग बहुत धनी हों और जनोद्वार या जनकल्याण के कार्यों के लिए स्वेच्छा से दान देने की क्षमता रखते हों, अथवा राजा की ओर से बिना पीड़ा दिये अनुकूलतापूर्वक कर दे सकें, उसके द्वारा प्रजोपकार का कार्य करना चाहिए, प्रजोत्पीडऩरूप कठोर प्रयत्न से लाए हुए कर द्वारा नही। महाभारत के ये श्लोक हमें बता रहे हैं कि उस समय तक मनुस्मृति की कर वसूली की प्रणाली जीवित थी और उसी के अनुसार राजा राज्य करने का प्रयास करता था। प्रजोपकार के लिए कर की आवश्यकता पड़ती है, पर कर वसूली से प्राप्त धनराशि को राजा अपनी बपौती नही मानता था। उसे वह जनता की धरोहर मानता था। ऐसी भावना ही वास्तविक लोकतंत्र की भावना की प्रतीक हुआ करती है। इस कर वसूली की लोकतांत्रिक प्रणाली का आजकल सर्वथा अभाव सा दिखाई देता है।
महाभारतकालीन राज्य व्यवस्था की मान्यता थी कि-
ह्तं कृपणवित्तं हि राष्ट्रं हन्ति नृपश्रियम्।
दद्याच्च महतो भोगान क्षुद्रभयं प्रणुदेत सताम्।।
(अ. 61/26)
''अर्थात यदि किसी दरिद्र का धन छीन लिया जाए तो वह राजा के राज्य का और लक्ष्मी का विनाश कर देता है। अत: राजा को चाहिए कि दोनों का धन न लेकर, उन्हें महान भोग अर्पित करे और श्रेष्ठ पुरूषों को भूख का कष्ट न होने दे।''

यदि देश में बड़े उद्योगपति अपनी कमाई का बड़ा हिस्सा देश के दीन-हीन दरिद्रों की सेवा कार्यों के लिए व्यय करने लगें और शासक वर्ग उस धन को राज्य के लोकोपकारी कार्यों में ईमानदारी से व्यय करने लगें तो उससे जो उत्तम परिवेश देश में बनेगा, कदाचित वही परिवेश वास्तविक लोकतंत्र कहलाएगा। हमें उसी परिवेश के लिए आज प्रयत्नशील रहना चाहिए, तभी हम अपनी विरासत के योग्य उत्तराधिकारी कहलाएंगे।
क्रमश:

राकेश कुमार आर्य ( 1586 )

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