राजधर्म और महाभारत, भाग-2

  • 2016-10-13 12:30:40.0
  • राकेश कुमार आर्य

राजधर्म और महाभारत, भाग-2

वृद्घो ज्ञातिस्तभा मित्रं दरिद्रो यो भवेदपि।
कुलीन: पंडित इति रक्ष्या नि: स्वा: स्वशक्तित:।
गृहे वासयितत्यास्ते धन्यमायुष्यमेव च।।
-अ. 104/112
''अर्थात बूढ़े, कुटुम्बी, दरिद्र, मित्र और कुलीन पंडित यदि निर्धन हों तो उनकी यथाशक्ति रक्षा करनी चाहिए। उन्हें अपने घर में ठहराना चाहिए। ऐसा करने से धन और आयु की वृद्घि होती है।''
आज हम दूसरों के अधिकारों का अतिक्रमण कर उनके अधिकारों का शोषण कर रहे हैं। एक व्यक्ति करोड़ों-अरबों का स्वामी होता जाता है तो इसका अभिप्राय है कि वह अनेकों लोगों के हिस्से से हड़प रहा है। उसकी ऐसी प्रवृत्ति से लोगों में दरिद्रता बढ़ती जाती है जो लोग विकास की गति में दो चार सीढ़ी ऊपर चढ़ आते हैं, उन्हें ऐसे लोग ऊपर से नीचे धकेल देेते हैं जो दूसरों के अधिकारों का और हिस्से का शोषण करने में विश्वास करते हैं। इस प्रकार की शोषणपूर्ण कार्यशैली से लोगों में धन का समान वितरण नही हो पा रहा है और समाज में दिन प्रतिदिन निर्धनों की संख्या बढ़ती ही जाती है।
रात को काले कारनामे करने वाले सुबह के सूर्य की पहली किरण तक कितने लोगों को विकास की सीढिय़ों से धकेल कर पीछे गिरा देते हैं। इसका उत्तर इस लोकतंत्र के पास है ही नहीं? इसका अभिप्राय है कि देश में उत्तरदायी शासन का अभाव है। उत्तरदायी शासन तभी आ सकता है जब दलित, शोषित, उपेक्षित और विकास की दौड़ में पीछे रह गये समाज के लोगों का हाथ पकडक़र उन्हें ऊपर उठाने के लिए लोगों के हाथ उठेंगे। अभी तो समाज में 'कुहनी मार' प्रतियोगिता हो रही है, जब यह प्रतियोगिता बंद होकर हाथ में हाथ डालने की प्रतियोगिता आरंभ हो जाएगी तब वास्तविक लोकतंत्र देश में आएगा। यह स्थिति इस भावना से तो आनी नहीं कि-'मेरा भी मेरे लिए और जो तेरा है वह भी मेरे लिए।' यह तो इसी भावना से आएगी कि-'जो मेरा है वह भी तेरे लिए और जो तेरा है वह भी तेरे लिए।' लोकतंत्र की इसी भावना को स्थापित करने के लिए महाभारतकार व्यवस्था करता है :-
सहस्रपरिवेष्टारस्तथैव च सहस्रदा:।
त्रातारश्च सहस्राणां ते नरा: स्वर्गगामिन:।।
(अ. 23/96)
अर्थात ''जो मनुष्य सहस्रों मनुष्यों को भोजन परोसते, सहस्रों को दान देते तथा सहस्रों की रक्षा करते हैं, वे अगले जन्म में सुख संपन्न होते हैं।''
भीष्म पितामह राजा के विषय में बताते हैं-
अथ येषां पुन: प्राज्ञो राजा भवति धार्मिक:।
सुखं ते प्रतिबुध्यन्ते सुसुखं प्रस्वपंति च।।
(अ. 62/42)
''जिनका राजा या शासक बुद्घिमान और धार्मिक होता है अपना हर कार्य विवेकपूर्ण ढंग से बुद्घिपूर्वक करता है और न्यायपूर्ण ढंग से लोगों के साथ वत्र्तता है ऐसे राजा के राज में (हे युधिष्ठिर) सभी लोग सुखपूर्वक सोते हैं।''

सदाचारी शासक के राज्य में रात्रि में सब लोग अपने घरों में होते हैं और कोई भी व्यक्ति पापकर्म नही करता, सबकी बुद्घि सात्विक और सदाचारी कार्यों में लगी रहती है। इसलिए लोगों को रात्रि में चोरों या डकैतों से कोई भय नही होता वे आराम से सोते हैं।

युधिष्ठिर को राजधर्म के विषय में समझाते हुए भीष्म पितामह अगले श्लोक में कहते हैं -
तस्य राज्ञ: शुभै राज्यै: कर्मभिर्निर्वृत्ता नरा।
योगक्षेमेण कृष्टाया च विवर्धन्ते स्वकर्मभि:।
(44/अ. 62)

''उस न्यायकारी और बुद्घिपूर्वक कार्य करने वाले राजा के शुभ राज्य और शुभ कर्मों से प्रजा वर्ग के लोग संतुष्ट रहते हैं। उस राज्य में सबके योगक्षेम का यथावत निर्वाह होता है, समय पर वर्षा होती है और प्रजा अपने शुभ कार्यों से समृद्घिशालिनी होती है।''

समय पर वर्षा तभी होती है जब लोग पर्यावरण संतुलन को बिगाडऩे वाले न होकर यज्ञप्रेमी होते हैं, पशु-पक्षी या अन्य प्राणियों से ही नहीं अपितु पेड़ पौधों तक से भी प्रेम करते हों, और उनकी रक्षा करना अपना धर्म मानते हों। जिस राज्य का राजा न्यायकारी अर्थात पर्यावरण संतुलन का ध्यान रखते हुए हर प्राणी के साथ न्यायपूर्ण व्यवहार करने वाला होता है, और प्रजाजन भी ऐसे ही होते हैं।
इस श्लोक से प्रतिध्वनित होता है कि राजा को पर्यावरण संतुलन को बनाये रखना भी अपना धर्म मानना चाहिए, जिससे कि देश में अच्छी बारिश हो, अच्छी बारिश से प्रजा का समृद्घिशालिनी होना तो स्वाभाविक ही है। इन सूक्ष्म बातों पर विचार करने से पता चलता है कि राजधर्म और प्रकृति का अर्थात पर्यावरण संतुलन का कितना गहरा संबंध है? इस चिंतन पर विचार करने से पता चलता है कि भारत का राजनीतिक चिंतन प्राचीनकाल से ही पर्यावरण प्रदूषण के प्रति सावधान रहा है।

राजधर्म पर महाभारतकार के विचार
महर्षि मनु की राज्यव्यवस्था की पुष्टि महाभारतकार ने की है। वह लिखते हैं-
व्यवहारश्चचारश्च सततं सत्यसंधत:।।
अप्रमाद: प्रमोदश्च व्यवसायेअप्यचण्डता।
भरणं चैव भृत्यानां वाहनानां च पोषणम्।।
योधाना चैव सत्कार: कृते कर्मण्यमोघता।
श्रेय एवं नरेन्द्राणामिह चवै परत्र च।।
(अ. 145 पृष्ठ 5954)
क्रमश: